भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 538, कुल 832 में से

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पृष्ठ 538

५०० - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ ५ देहनी शस्त्रादिजनित क्षतसे रक्षा करता है। अनन्य-जन्य किसीसे त्राण न पानेवाले क्षत्र (प्राण) को प्राप्त होता है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको जीत (प्राप्त कर) लेना है ॥ १-४॥ चतुर्दश ब्राह्मण गायत्री-उपासना 'भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ'—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (प्रथम) पाद है। यह (भूमि आदि) ही इस गायत्रीका प्रथम पाद है। इस प्रकार इसके इस पदको जो जानता है वह इस त्रिलोकीमें जितना कुछ है, उस सबको जीत (प्राप्त कर) लेता है। 'ऋचः यजूंषि, सामानि'—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (द्वितीय) पाद है। यह (ऋक् आदि) ही इस गायत्रीका द्वितीय पाद है। जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है वह जितनी यह त्रयीविद्या है (अर्थात् त्रयीविद्या- का जितना फल है,) उस सभीको जीत लेता है। प्राण, अपान, व्यान—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाल ही गायत्रीका एक (तृतीय) पाद है। यह प्राणादि ही इस गायत्रीका 'तृतीय' पाद है। जो गायत्रीके इस पदको इस प्रकार जानता है, वह जितना यह प्राणिसमुदाय है, सबको जीत लेता है। और यह जो तप्ता (प्रकाशित होता) है वही इसका तुरीय, दर्शत, परोरजा पद है। जो चतुर्थ होता है, वही 'तुरीय कहलाता है। 'दर्शत पदम्' इसका अर्थ है-मानो [यह आदित्मण्डलस्थ पुरुष] दीखता है। 'परोरजा इसका अर्थ है-यह सभी रज (यानी लोको) के ऊपर-ऊपर रहकर प्रकाशित होता है। जो गायत्री- के इस चतुर्थ पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार शोभा और कीर्तिसे प्रकाशित होता है। वह यह गायत्री इस चतुर्थ दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है। वह पद सत्यमें प्रतिष्ठित है। चक्षु ही सत्य है चक्षु ही सत्य है—यह प्रसिद्ध है। इसीसे यदि दो पुरुष 'मैंने देखा है' 'मैंने सुना है' इस प्रकार विवाद करते हुए आयें तो जो यह कहता होगा कि 'मैंने देखा है' उसीका हमे विश्वास होगा। वह तुरीय पादका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है। प्राण ही बल है, वह सत्य प्राणमें प्रतिष्ठित है। इसीसे कहते हैं कि सत्यकी अपेक्षा बल ओजस्वी है। इस प्रकार यह गायत्री अध्यात्म प्राणमे प्रतिष्ठित है। इस पूर्वोक्त गायत्रीने गयोंका त्राण किया था। प्राण ही गय हैं, उन प्राणोंका इसने त्राण किया। इसने गयोंका त्राण किया था, इसीसे इसका 'गायत्री' नाम हुआ। आचार्यने आठ वर्षके बटुके प्रति उपनयनके समय जिस सावित्रीका उपदेश किया था, वह यही है। वह जिस जिस बटुको इसका उपदेश करता है वह उसके-उसके प्राणोंकी रक्षा करती है ॥ १-४ ॥ कोई शाखावाले इस पूर्वोक्त अनुष्टुप् छन्दवाली सावित्रीका उपदेश करते हैं (गायत्रीछन्दवाली सावित्रीका उपदेश न करके अनुष्टुप्छन्दकी सावित्रीका उपदेश करते हैं)। वे कहते हैं कि वाक् अनुष्टुप् है, इसलिये हम वाक्का ही उपदेश करते हैं। किंतु ऐसा नहीं करना चाहिये। गायत्रीछन्दवाली सावित्री- का ही उपदेश करे। ऐसा जाननेवाला जो बहुत सा भी प्रतिग्रह करे तो भी वह गायत्रीके एक पदके बराबर भी नहीं हो सकता ॥ ५ ॥ जो इन तीन पूर्ण लोकोंका प्रतिग्रह करता है, उसका वह (प्रतिग्रह) इस गायत्रीके इस प्रथम पादसे व्याप्त करता है। और जितनी यह त्रयीविद्या है, उसका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस द्वितीय पादने व्याप्त करता है। और जितने ये प्राणी हैं, उनका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस तृतीय पदको व्याप्त करता है। और यही इसका तुरीय दर्शत परोरजा पद है, जो कि यह तरता है; यह किसीके द्वारा प्राप्य नहीं है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कोई कहाँसे कर सकता है? ॥ ६ ॥ उस गायत्रीका उपस्थान— हे गायत्रि ! तू [ त्रैलोक्यरूप प्रथम पादसे ] एकपदी है, [ तीनों वेदरूप द्वितीय पादसे ] द्विपदी है, [ प्राण, अपान और व्यानरूप तीसरे पादसे ] त्रिपदी है [ और तुरीय पादसे ] चतुष्पदी है। [ इन सबसे परे निरुपाधिक स्वरूपसे तू ] अपद है, क्योकि तू जानी नहीं जाती। अतः व्यवहारके अविषयभूत एव समस्त लोकोंसे ऊपर विराज- मान तेरे दर्शनीय तुरीय पदको नमस्कार है। यह पादरूपी शत्रु १. अनुष्टुप्छन्द चार पादोंका होता है और गायत्रीछन्द तीन पादोंका। दोनोंके पाद आठ-आठ अक्षरके ही होते हैं। अनुष्टुप्छन्दमें जो मन्त्र उपलब्ध होता है, उसका भी देवता सविता ही है, इसलिये कुछ लोग उसे ही सावित्री कहते हैं। अनुष्टुप्छन्दवाला मन्त्र इस प्रकार है— 'तत्संवितुर्वृणीमहे वय देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठ सर्वधानम तुरं भाम धीमहि।'