कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 530, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४९२ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ४ भागसे बाहर निकलता है। उसके उत्क्रमण करनेपर उसके साथ ही प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रमण करनेपर सम्पूर्ण प्राण (इन्द्रियवर्ग) उत्क्रमण करते हैं। उस समय यह आत्मा विशेष विज्ञानवान् होता है और विज्ञानयुक्त प्रदेशको ही जाता है। उस समय उसके साथ-साथ ज्ञान, कर्म और पूर्वप्रज्ञा (अनुभूत विषयोंकी वासना) भी जाते हैं ॥ २ ॥ वह दृष्टान्त है—जिस प्रकार जोंक एक तृणके अन्तमें पहुँचकर दूसरे तृणरूप आश्रयको पकड़कर अपनेको सकोड़ लेती है,उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको मारकर— अविद्या (अचेतनावस्था) को प्राप्त कराकर दूसरे आधारका आश्रय ले अपना उपसंहार कर लेता है। उसमें दृष्टान्त— जिस प्रकार सुनार सुवर्णका भाग लेकर दूसरे नवीन और कल्याणतर (अधिक सुन्दर) रूपकी रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको नष्टकर—अचेतनावस्थाको प्राप्त करके दूसरे पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा अथवा अन्य भूतोंके नवीन और सुन्दर रूपकी रचना करता है॥ ३-४॥ वह यह आत्मा ब्रह्म है। वह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, जलमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोध- मय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय और सर्वमय है । जो कुछ इदमय (प्रत्यक्ष) और अदोमय (परोक्ष) है, वह वही है । वह जैसा करनेवाला और जैसे आचरणवाला होता है, वैसा ही हो जाता है । शुभ कर्म करनेवाला शुभ होता है और पापकर्मी पापी होता है । पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यात्मा होता है और पापकर्मसे पापी होता है । कोई-कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है; वह जैसी कामनावाला होता है वैसा ही सङ्कल्प करता है, जैसे सङ्कल्पवाला होता है वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ उस विषयमें यह मन्त्र है—इसका लिङ्ग अर्थात् मन जिसमें अत्यन्त आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित प्राप्त करता है । इस लोकमे यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल प्राप्तकर उस लोकसे कर्म करनेके लिये पुनः इस लोकमें आ जाता है; अवश्य ही कामना करने- वाला पुरुष ही ऐसा करता है । अब जो कामना न करनेवाला पुरुष है [उसके विषयमें कहते हैं]—जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता, वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ उसी अर्थमे यह मन्त्र है—जिस समय इसके हृदयमें आश्रित सम्पूर्ण कामनाओंका नाश हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमृत हो जाता है और यहीं (इसी शरीरमें) उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सर्पकी केंचुली बाँबीके ऊपर मृत और सर्पद्वारा परित्याग की हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार यह शरीर पड़ा रहता है और यह अशरीर अमृत प्राण तो ब्रह्म ही है—तेज ही है ।' तब विदेहराज जनकने कहा, 'वह मैं जनक श्रीमान्को सहस्र गौएँ देता हूँ' ॥ ७ ॥ उस विषयमें ये मन्त्र हैं—यह ज्ञानमार्ग सूक्ष्म, विस्तीर्ण और पुरातन है । वह मुझे स्पर्श किये हुए है और मैने ही उसका फलसाधक ज्ञान प्राप्त किया है । धीर ब्रह्मवेत्ता पुरुष इस लोकमें जीते-जी ही मुक्त होकर शरीर त्यागके बाद उसी मार्गसे स्वर्गलोक अर्थात् मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥ उस मार्गके विषयमें मतभेद है । कोई उसमे शुक्ल और कोई नीलवर्ण बतलाते हैं तथा कोई पिङ्गलवर्ण, कोई हरित और कोई लाल कहते हैं, किंतु यह मार्ग साक्षात् ब्रह्मद्वारा अनुभूत है। इस मार्गसे पुण्य करनेवाला परमात्मतेजःस्वरूप ब्रह्मवेत्ता ही जाता है ॥ ९ ॥ जो (भोगसक्त मनुष्य) अविद्या (भोगोंके साधनरूप कर्म) की उपासना करते हैं, वे अज्ञानस्वरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं और जो (मिथ्याज्ञानी) विद्या (कर्तव्य- कर्मका त्याग करके केवल ज्ञानके अभिमान) में रत हैं, वे उससे भी अधिकतर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं। वे आनन्द (असुख) नामके निकृष्ट योनि और नरकरूप लोक अज्ञान और दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे आच्छादित हैं; वे अविद्वान् और अज्ञानीलोग मरकर उन्हींको प्राप्त होते हैं। यदि पुरुष आत्माको 'मैं यह हूँ' इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके पीछे सन्तप्त हो ? जिस पुरुषको इस अनेकों अनर्थों- से पूर्ण और विवेक विज्ञानके विरोधी विषम शरीरमें प्रविष्ट हुआ आत्मा प्राप्त और ज्ञात हो गया है, वही कृतकृत्य है। वही सर्व [शुभों] का कर्ता है, उसीका लोक (मोक्षधाम) है और स्वयं वही लोक (मोक्षरूप) भी है। हम इस शरीरमें रहते हुए ही यदि उसे जान लेते हैं [तो कृतार्थ हो गये ], यदि उसे नहीं जाना तो बड़ी हानि है। जो उसे जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं; किंतु दूसरे लोग तो दुःखको ही प्राप्त होते हैं। जब भूत और भविष्यत्के स्वामी इस