कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 531, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४९३ प्रकाशमान अथवा कर्म-फलदाता आत्माको मनुष्य साक्षात् जान लेता है तो वह उससे अपनी रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता *॥ १०-१५ ॥ जिसके नीचे संवत्सरचक्र अहोरात्रादि अवयवोंके सहित चक्कर लगाता रहता है, उस आदित्यादि ज्योतियोंके ज्योतिः- स्वरूप अमृतकी देवगण 'आयु' इस प्रकार उपासना करते हैं। जिसमें पाँच पञ्चजन और [ अव्याकृतसंज्ञक ] आकाश भी प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ । उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ ॥ १६-१७ ॥ जो उसे प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र तथा ' मनका मन जानते हैं, वे उस सनातन और मुख्य ब्रह्मको जानते हैं । ब्रह्मको आचार्योपदेशपूर्वक मनसे ही देखना चाहिये । इसमें नानात्व कुछ भी नहीं है। जो इसमें नानाके समान देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है। उस ब्रह्मको [ आचार्योपदेशके ] अनन्तर एक प्रकारसे ही देखना चाहिये। यह ब्रह्म अप्रमेय, ध्रुव, निर्मल, [ अव्याकृतरूप ] आकाशसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, आत्मा, महान् और अविनाशी है । बुद्धिमान् ब्राह्मणको उसे ही जानकर उसीमें प्रज्ञा करनी चाहिये । बहुत शब्दोंका अनुध्यान ( निरन्तर चिन्तन ) न करे; वह तो वाणीका श्रम ही है ॥ १८-२१ ॥ वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणोंमें विज्ञानमय है, जो यह हृदयमें आकाश है, उसमें शयन करता है । वह सबको वशमें रखनेवाला, सबका शासन करनेवाला
- अन्ध तम प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रता ॥ अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वा सोऽबुधो जना ॥ आत्मान चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुष । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसञ्जरेत् ॥ यस्यानुवित्त प्रतिबुद्ध आत्मास्मिन् संदेहे गहने प्रविष्ट । स विश्वकृत्स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोका सउ लोक एव ॥ इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वय न चेदवेदिर्महती विनष्टि । ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दु खमेवापियन्ति ॥ यदैतमनुपश्यत्यात्मान देवमञ्जसा । ईशान भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ (बृह० ४ । ४ । १०-१५) और सबका अधिपति है । वह शुभ कर्मसे बढ़ता नहीं और अशुभ कर्मसे छोटा नहीं होता । यह सर्वेश्वर है, यह भूतोंका अधिपति और भूतोंका पालन करनेवाला है । इन लोकोंकी मर्यादा भङ्ग न हो—इस प्रयोजनसे वह इनको धारण करनेवाला सेतु है । [ उपनिषदोंमें जिसके स्वरूपका दिग्दर्शन कराया गया है ] उस इस आत्माको ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्याय, यज्ञ, दान और निष्काम तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं । इसीको जानकर मुनि होता है । इस आत्मलोककी ही इच्छा करते हुए त्यागी पुरुष सब कुछ त्यागकर चले जाते ( सन्यासी हो जाते ) हैं। इस सन्यासमें कारण यह है— पूर्ववर्ती विद्वान् सन्तान [ तथा सकाम कर्म आदि ] की इच्छा नहीं करते थे । [ वे सोचते थे—] हमें सन्तानसे क्या लेना है, जिन हमको कि यह आत्मलोक अभीष्ट है । अतः वे पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे व्युत्थान कर फिर भिक्षाचर्या करते थे । जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही लोकैषणा है। ये दोनों एषणाएँ ही हैं । वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार-निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता; वह अशीर्य है, उसका नाश नहीं होता; वह असङ्ग है, कहीं आसक्त नहीं होता, बँधा नहीं है, इसलिये व्यथित नहीं होता तथा उसका क्षय नहीं होता । इस आत्मज्ञको ये दोनों ( पाप- पुण्यसम्बन्धी शोक-हर्ष ) प्राप्त नहीं होते । अतः इस निमित्तसे मैंने पाप किया है [ ऐसा पश्चात्ताप ] और इस निमित्तसे मैंने पुण्य किया है [ ऐसा हर्ष ] इन दोनोंको ही वह पार कर जाता है । इसे किया हुआ और न किया हुआ नित्यकर्म [ फलप्रदान और प्रत्यवायके द्वारा ] ताप नहीं देता ॥ २२ ॥ यही बात ऋचाद्वारा कही गयी है—यह ब्रह्मवेत्ताकी नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो बढ़ती है और न घटती ही है । उस महिमाके ही स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये, उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता । अतः इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है, सभीको आत्मा देखता है । उसे [ पुण्य-पापरूप ] पापकी प्राप्ति नहीं होती, वह सम्पूर्ण पापोंको पार कर जाता है । इसे पाप ताप नहीं पहुँचाता, यह सारे पापोंको सन्तप्त करता है। यह पापरहित, निष्काम, निःसंशय ब्राह्मण हो जाता है । सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है, तुम इसे पहुँचा दिये गये हो'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ।