भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 532

४९४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४ [ तब जनकने कहा—] 'वह मैं श्रीमान्‌को विदेह देश देता और कर्मफल देनेवाला है। जो ऐसा जानता है, उसे सम्पूर्ण हूँ, साथ ही आपकी दासता (सेवा) करनेके लिये अपने- कर्मोंका फल प्राप्त होता है। वही यह महान् अजन्मा आत्मा आपको भी समर्पण करता हूँ' ॥ २३ ॥ अजर, अमर, अमृत एव अभय ब्रह्म है। अभय ही ब्रह्म है; वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्न भक्षण करनेवाला जो ऐसा जानता है, वह अभय ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २४-२५ ॥

पञ्चम
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद
यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्यकी मैत्रेयी और कात्यायनी—ये   प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके
दो पत्नियां थीं। उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी   लिये क्षत्रिय प्रिय होता है, लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय
साधारण स्त्रियोंकी सी बुद्धिवाली ही थी। तब याज्ञवल्क्यने   नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते हैं;
दूसरे प्रकारकी चर्चाका आरम्भ करनेकी इच्छासे [कहा—]   देवोंके प्रयोजनके लिये देव प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके
'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा—'मैं इस स्थान   लिये देव प्रिय होते हैं, वेदोंके प्रयोजनके लिये वेद प्रिय नहीं
(गार्हस्थ्य-आश्रम) से अन्यत्र सब कुछ त्यागकर जानेवाला   होते, अपने ही प्रयोजनके लिये वेद प्रिय होते हैं, भूतोंके
हूँ, अर्थात् मेरा सन्यास लेनेका विचार है। इसलिये [मैं तेरी   प्रयोजनके लिये भूत प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये
अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ] इस कात्यायनीके साथ   भूत प्रिय होते हैं, सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते,
तेरा बँटवारा कर दूँ'। उस मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि   अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं, अतः अरी
यह धनसे सम्पन्न सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं   मैत्रेयि ! आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और
उससे अमर हो सकती हूँ, अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा,   निदिध्यासन (ध्यान) करनेयोग्य है। अरी मैत्रेयि ! निश्चय ही
'नहीं, भोग सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है,   आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर इस
वैसा ही तेरा भी जीवन हो जायगा, धनसे अमृतत्वकी तो आशा   सबका ज्ञान हो जाता है' ॥ ६ ॥
है ही नहीं।' उस मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो   ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको
सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्व-   आत्मासे भिन्न समझता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती
का साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें।' उन याज्ञवल्क्यजीने   है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। लोक उसे
कहा, 'निश्चय ही तू पहले भी मेरी प्रिया रही है और इस   परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न जानता है।
समय भी तूने मेरे प्रिय (प्रसन्नता) को बढ़ाया है। अतः   देवता उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे भिन्न
देवि ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तेरे प्रति इस (अमृतत्वके साधन)   समझता है। वेद उसे परास्त कर देते हैं, जो वेदोंको आत्मासे
की व्याख्या करूँगा। तू मेरे व्याख्या किये हुए विषयका   भिन्न जानता है। भूत उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको
चिन्तन करना' ॥ १-५ ॥                                आत्मासे भिन्न समझते हैं। सब उसे परास्त कर देते हैं, जो
उन्होंने कहा—'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके   सबको आत्मासे भिन्न जानता है। यह ब्राह्मणजाति, यह
प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके   क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये भूत और ये सब
लिये पति प्रिय होता है, स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं   जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है। वह दृष्टान्त ऐसा है
होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है, पुत्रोंके   कि जिसपर लकड़ी आदिसे आघात किया जाता है, उस
प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये   दुन्दुभि (नक्कारे) के बाह्य शब्दोंको जिस प्रकार कोई ग्रहण
पुत्र प्रिय होते हैं, धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता,   नहीं कर सकता, किन्तु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको
अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है, पशुओंके प्रयोजनके   ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी गृहीत हो जाता है। वह
लिये पशु प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पशु प्रिय   [दूसरा] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे मुँहसे फूँके जाते हुए
होते हैं, ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता,   शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें कोई समर्थ नहीं होता,
अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके   किन्तु शङ्ख या शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी