कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५०४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ६ 'तो गौतम ! तुम शास्त्रोक्त विधिसे उसे पानेकी इच्छा करो।' [ गौतम— ] 'अच्छा, मैं आपके प्रति शिष्यभावसे उपसन्न ( प्राप्त ) होता हूँ। पहले ब्राह्मणलोग वाणीसे ही क्षत्रियादिके प्रति उपसन्न होते रहे हैं।' इस प्रकार उपसत्तिका वाणीसे कथनमात्र करके गौतम वहाँ रहने लगा [ सेवा आदिके द्वारा नहीं ]। उस राजाने कहा, 'गौतम ! जिस प्रकार तुम्हारे पितामहोंने हमारे पूर्वजोंका अपराध नहीं माना, उसी प्रकार तुम भी हमारा अपराध न मानना। इससे पूर्व यह विद्या किसी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही। उसे मैं तुम्हारे ही प्रति कहता हूँ। भला, इस प्रकार विनयपूर्वक बोलनेवाले तुमको निषेध करनेमें (विद्या देनेसे अस्वीकार करनेमें ) कौन समर्थ हो सकता है ?' ॥ ७-८ ॥ गौतम ! वह लोक ( द्युलोक ) ही अग्नि है। उसका आदित्य ही समिध् ( ईंधन ) है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गार हे, अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं। उस इस अग्निमे देवगण श्रद्धाको हवन करते हैं, उस आहुतिसे सोम राजा होता है। गौतम ! पर्जन्य- देवता ही अग्नि है। उसका संवत्सर ही समिध् है, बादल धूम हैं, विद्युत् ज्वाला है, अशनि ( इन्द्रका वज्र ) अङ्गार है, मेघ- गर्जन विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमें देवगण सोम राजाको हवन करते हैं। उस आहुतिसे वृष्टि होती है। गौतम ! यह लोक ही अग्नि है। इसकी पृथिवी ही समिध् है, अग्नि धूम है, रात्रि ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवता वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है। गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसका खुला हुआ मुख ही समिध् है, प्राण धूम है, वाक् ज्वाला है, नेत्र अङ्गार हैं, श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवगण अन्नको होमते हैं। उस आहुतिसे वीर्य होता है। गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उपस्थ ही उसकी समिध् है, लोम धूम हैं, योनि ज्वाला है, जो मैथुनव्यापार है वह अङ्गार है, आनन्दलेश विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमे देवगण वीर्य होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है। वह जीवित रहता है। जबतक कर्मशेष रहते हैं, वह जीवित रहता है, और जब मरता है, तब उसे अग्निके पास ले जाते हैं। उस ( आहुतिभूत पुरुष ) का अग्नि ही अग्नि होता है, समिध् समिध् होती है, धूम धूम होता है, ज्वाला ज्वाला होती है, अँगारे अङ्गार होते हैं और विस्फुलिङ्ग विस्फुलिङ्ग होते हैं। उस इस अग्निमे देवगण पुरुषको होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता है ॥ ९-१४ ॥ वे जो [ गृहस्थ ] इस प्रकार इस ( पञ्चाग्निविद्या ) को जानते है तथा जो [ सन्न्यासी या वानप्रस्थ ] वनमें श्रद्धायुक्त होकर सत्य ( सगुण ब्रह्म ) की उपासना करते हैं, वे ज्योतिके अभिमानी देवताओको प्राप्त होते हैं, ज्योतिके अभिमानी देवताओंसे दिनके अभिमानी देवताको, दिनके अभिमानी देवतासे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे जिन छः महीनोंमे सूर्य उत्तरकी ओर रहकर चलता है, उन उत्तरायणके छः महीनोंके अभिमानी देवताओंको [ प्राप्त होते हैं ]; पण्मासाभिमानी देवताओंसे देवलोकको, देवलोकसे आदित्यको और आदित्य- से विद्युत्सम्बन्धी देवताओंको प्राप्त होते हैं। उन वैद्युत देवोंके पास एक मानस पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकोंमें ले जाता है। वे उन ब्रह्मलोकोंमें अनन्त संवत्सरपर्यन्त रहकर [ भगवान्- को प्राप्त हो जाते ] हैं। उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती ॥१५॥ और जो [ सकाम ] यज्ञ, दान, तपके द्वारा लोकोंको जीतते हैं, वे धूम ( धूमाभिमानी देवता ) को प्राप्त होते हैं, धूमसे रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपक्षीयमाणपक्ष ( कृष्णपक्षाभिमानी देवता ) को, अपक्षीयमाणपक्षसे जिन छः महीनोमे सूर्य दक्षिणकी ओर होकर जाता है, उन छः मासके देवताओंको, छः मासके देवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। चन्द्रमामे पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। वहाँ जैसे ऋत्विक्गण सोम राजाको 'आप्यायस्व-अपक्षीयस्व' ऐसा कहकर चमसे भरकर पी जाते हैं, उसी प्रकार इन्हे देवगण भक्षण कर जाते हैं। जब उनके कर्म क्षीण हो जाते है तो वे इस आकाशको ही प्राप्त होते हैं। आकाशसे वायुको, वायुसे वृष्टिको और वृष्टिसे पृथिवीको प्राप्त होते हैं। पृथिवीको प्राप्त होकर वे अन्न हो जाते हैं। फिर वे पुरुषरूप अग्निमे हवन किये जाते हैं। उससे वे लोकके प्रति उत्थान करनेवाले होकर स्त्रीरूप अग्निमे उत्पन्न होते हैं। वे इसी प्रकार पुनः-पुनः परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन दोनों मागोंको नहीं जानते, वे कीट, पतग और डाँस मच्छर आदि होते हे ॥ १६ ॥