कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 546, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५०८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ६ प्रसिद्ध पण्डित, वेदवादियोंकी सभामें जानेवाला, सुन्दर वाणी — अनुसार घीका संस्कार ( शोधन ) करके और चरुपाक बना- बोलनेवाला, सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करनेवाला और पूर्ण कर 'अग्नये स्वाहा', 'अनुमतये स्वाहा' एव 'देवाय सवित्रे आयुष्मान् हो, वह उड़द-चावलकी खिचड़ी पकाकर उसमें सत्यप्रसवाय स्वाहा' इन मन्त्रोंसे अग्निमें आहुतियाँ देनी 'उक्षन्'* अथवा 'ऋषभ'† नामक बल-वीर्यवर्द्धक ओषधि चाहिये । होम समाप्त करके चरुमें बचा हुआ भोजन करके मिलाकर घृतसहित पति-पत्नी दोनों भोजन करें । शेष पत्नीको भोजन कराना चाहिये । फिर हाथ धोकर जलका गर्भाधान करनेवालेको प्रातःकाल ही स्थालीपाकविधिके कलश भरके 'उत्तिष्ठातोविश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सह' मन्त्रके द्वारा पत्नीका तीन बार अभ्युक्षण (अभिषेचन)
- 'उक्षन्' शब्दके कोषमें दो प्रकारके अर्थ मिलते हैं। कलकत्ते- करना चाहिये । से प्रकाशित 'वाचस्पत्य' नामक बृहत् संस्कृताभिधानमें उसे अष्ट- वर्गान्तर्गत 'ऋषभ' नामक ओषधिका पर्याय माना गया है— तदनन्तर पति अपनी कामनाके अनुसार पत्नीको भोजन 'ऋषभौषधौ च' । प्रसिद्ध अग्रेज विद्वान् सर मोनियर विलियम्सने कराके शयनके समय बुलाकर कहे कि "देखो, मैं अम ( प्राण ) अपने. बृहत् संस्कृत-अंग्रेजी कोषमें इसे 'सोम' नामक पौधेका हूँ और तुम प्राणरूप मेरे अधीन वाक् हो । मैं साम हूँ और पर्याय माना है । तुम सामका आधाररूप ऋक् हो, मैं आकाश हूँ और तुम पृथिवी † 'ऋषभ' नामक ओषधिका आयुर्वेदके अत्यन्त प्राचीन एव हो। अतएव आओ, तुम-हम दोनों मिलें, जिससे हमें पुत्र- प्रामाणिक ग्रन्थ 'सुश्रुत-संहिता' के 'सूत्रस्थान' नामक प्रथम खण्डके सन्तान और तदनुगत धनकी प्राप्ति हो । इसके पश्चात् 'द्यावा ३८ वें अध्यायमें (जो द्रव्यसङ्ग्रहणीयाध्याय भी कहलाता है) सैंतीस पृथिवी' इत्यादि मन्त्रसे सम्बोधन करके 'विष्णुर्योनि' इत्यादि द्रव्यगणोंके अन्तर्गत उल्लेख हुआ है। 'भावप्रकाश' नामक प्रसिद्ध मन्त्रके अनुसार प्रार्थना करे "भगवान् विष्णु तुम्हारी जनने- संग्रह-ग्रन्थमें उसका वर्णन इस रूपमें आया है— न्द्रियको पुत्रोत्पादनमें समर्थ करें, त्वष्टा सूर्य रूपोंको दर्शन- जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ । योग्य करें, विराट् पुरुष प्रजापति रेतस्सेचन करायें, सूत्रात्मा रसोतकन्दवत्कन्दौ नि सारौ सूक्ष्मपत्रकौ ॥ विधाता तुममे अभिन्नभावसे स्थित होकर गर्भ धारण करें। ऋषभो वृषभद्भवः । सिनीवाली नामकी अत्यन्त सुन्दर देवता तुममें अमेदरूपसे ॥ एवं पृथुष्टुका नामकी महान् स्तुतिशाली देवता भी तुममें हैं। ऋषभो वृषभो वीरो विषाणी शृङ्ग इत्यादि । मैं उनसे प्रार्थना करता हूँ कि 'हे सिनीवालि ! हे पृथुष्टुके ! तुम जीवकऋषभकौ वल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ । इस गर्भको धारण करो।' दोनों अश्विनीकुमार अथवा चन्द्र- मधुरौ पित्तदाहघ्नौ काशवातक्षयावहौ ॥ सूर्य तुम्हारे साथ रहकर इस गर्भको धारण करें।" 'जीवक और ऋषभक (ऋषभ) नामकी ओषधियाँ हिमालय- "दोनों अश्विनीकुमार हिरण्मय दो अरणियोंके द्वारा मन्थन के शिखरपर उत्पन्न होती हैं। उनकी जड़ लहसुनके सदृश होती करते हैं। मैं दसवें मासमें प्रसव होनेके लिये गर्भाधान करता है। दोनोंमें ही गूदरा नहीं होता, केवल त्वचा होती है, दोनोंमें हूँ । पृथ्वी जैसे अग्निगर्भा है, आकाश जैसे सूर्यके द्वारा गर्भ- छोटी-छोटी पत्तियाँ होती हैं। इनमेंसे ऋषभ बैलके सींगकी आकृति- वती है, दिशाएँ जैसे वायुके द्वारा गर्भवती हैं, मैं तुमको उसी का होता है। इसके दूसरे नाम हैं—वृषभ, वीर, विषाणी, शृङ्ग प्रकार गर्भ अर्पण करके गर्भवती करता हूँ।" यों कहकर आदि । जीवक और ऋषभ दोनों ही बलकारक, शीतवीर्य, गर्भाधान करे। वीर्य और कफ बढ़ानेवाले, मधुर, पित्त और दाहका शमन करने- तदनन्तर सुखपूर्वक प्रसव हो जाय, इसके लिये 'यथावायुः' वाले तथा खाँसी, वायु एव यक्ष्माको दूर करनेवाले हैं। इत्यादि मन्त्रके द्वारा आसन्नप्रसवा पत्नीका अभिषेचन करे और ऋषभकी प्रसिद्ध अष्टवर्ग नामक ओषधियोंमें गणना है। कहे—'जैसे वायु पुष्करिणीको सब ओरसे हिला देता है, वैसे भावप्रकाशकार लिखते हैं— ही तुम्हारा गर्भ भी अपने स्थानसे खिसककर जेरके साथ जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके । बाहर निकल आये। तुम्हारे तेजस्वी गर्भका मार्ग रुका हुआ अष्टवर्गोऽप्यभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ॥ है और चारों ओर जेरसे घिरा है। गर्भके साथ उस जेरको