कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 545, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०७ शुक्र है। प्रसिद्ध प्रजापतिने विचार किया कि इस शुक्रकी मन्त्रोपासक अपनी पत्नीको कामनापरायण करना चाहे तो उस उपयुक्त प्रतिष्ठाके लिये कोई आधार चाहिये, इसलिये उसने समय वह 'अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे । स स्त्रीकी सृष्टि की और उसके अधोभाग-सेवनका विधान किया। त्वमङ्गकषायोसि दिग्धविद्धमिव मादयेमाममूं मयि ।' मन्त्र- ( यहाँ यदि यह कहा जाय कि इस पाशविक क्रियामें तो प्राणि- का जप करे । मात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, इसके लिये विधान क्यों किया यदि किसी कारणवश गर्भनिरोधकी आवश्यकता हो तो गया, तो इसका उत्तर यह है कि यह विधान इसीलिये बनाया उस समय 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' मन्त्रका जाप करे । गया कि जिसमें पुरुषोंकी स्वेच्छाचारिताका निरोध हो और ऐसा करनेपर पत्नी गर्भवती नहीं होगी *। और यदि यह इच्छा इस विज्ञानसे परिचित पुरुषोंके द्वारा केवल श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्तिके हो कि पत्नी गर्भधारण करे तो उस समय 'इन्द्रियेण ते रेतसा लिये ही इसका सेवन किया जाय।) इसके लिये प्रजापतिने रेत आदधामि' इस मन्त्रका पाठ करे; इससे वह निश्चय ही प्रजनननेन्द्रियको उत्पन्न किया । अतएव इस विषयसे घृणा नहीं गर्भवती हो जायगी । करनी चाहिये। अरुणके पुत्र विद्वान् उद्दालक और नाक- यदि कभी अपनी भार्याके साथ किसी जारका सम्बन्ध हो मौद्गल्य तथा कुमारहारीत ऋषिने भी कहा है कि बहुत-से ऐसे जाय और उसे दण्ड देना हो तो पहले कच्ची मिट्टीके बरतनमें अग्नि मरणधर्मा, नामके ब्राह्मण हैं जो निरिन्द्रिय, सुकृतहीन, मैथुन- स्थापन करके समस्त कर्मोंको विपरीत रीतिसे करे और कुछ सरके विज्ञानसे अपरिचित होकर भी मैथुन-कर्ममें आसक्त होते हैं, तिनकोंके अग्रभागको घीमें भिगोकर विपरीत क्रमसे ही उनका उनकी परलोकमें दुर्गति होती है। (इससे अशास्त्रीय तथा होम करे। आहुतिके पहले 'मम समिद्धेऽहौषी. प्राणापानौ त अंधाध मैथुन-कर्मका पापहेतुत्व सूचित किया गया है।) आददेऽसौ' आदि मन्त्रोंका पाठ करके अन्तमें प्रत्येक बार इस प्रकार मन्थ-कर्म करके ब्रह्मचर्यधारणपूर्वक पुरुषको 'असौ' बोलकर उसका नाम ले। इस प्रकार करनेसे वह पुण्य- पत्नीके ऋतुकालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। यदि इस बीचमें से स्खलित होकर मृत्युको प्राप्त हो जाता है। स्वप्नदोषादिके द्वारा शुक्र क्षरण हो जाय तो उसकी पुनः प्राप्ति ऋतुमती पत्नीका त्रिरात्र ब्रह्म (तीन रात्रियोंका पृथक् तथा वृद्धिके लिये 'यन्मेऽद्य रेत पृथिवीमस्कान्त्सीद्यदोषधी- निवासादि) समाप्त होनेपर स्नान करनेके बाद उसे धान रप्यसरद्यदपः, इदमह तद्रेत आददे ।' तथा 'पुनर्मा- कूटना आदि गृहस्थीका काम करना चाहिये। तीन दिनोंतक मैत्विन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः । पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं उसे अलग रहना चाहिये, किसीका स्पर्श नहीं करना चाहिये। कल्पन्ताम् ।' इन मन्त्रोंका पाठ करे। (इससे स्वप्नदोषादि जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र गौरवर्ण हो, एक वेदका व्याधियोंका नाश होता है।) अध्ययन करनेवाला हो और पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे, यदि कदाचित् जलमें अपनी छाया दीख जाय तो 'मयि उसको दूध-चावलकी खीर बनाकर उसमें घी मिलाकर पत्नी- तेज इन्द्रियं यशो द्रविणम् सुकृतम् ।' (मुझे तेज, इन्द्रिय- सहित खाना चाहिये । जो कपिलवर्ण, दो वेदोंका अध्ययन शक्ति, यश, धन और पुण्यकी प्राप्ति हो) इस मन्त्रको पढे। ऋतु- करनेवाला और पूर्णायु पुत्र चाहता हो, उसको दहींमें चावल कालकी तीन रात बीतनेपर जब पत्नी स्नान करके शुद्ध हो जाय, पकाकर पत्नीसहित खाना चाहिये। जो श्यामवर्ण, रक्तनेत्र, तब 'स्त्रियोंमें मेरी यह पत्नी लक्ष्मीके समान है, इसलिये निर्मल वस्त्र वेदत्रयीका अध्ययन करनेवाले, पूर्णायु पुत्रकी इच्छा करता हो, पहने हुए है' यह विचारकर उस यशस्विनी पत्नीके समीप जाकर उसे जलमें चावल (भात) पकाकर घी मिलाकर पत्नीसहित 'हम दोनों सन्तानोत्पादनके लिये क्रिया करेंगे' कहकर आमन्त्रण खाना चाहिये। जो चाहता हो कि मेरे पूर्ण आयुवाली करे । लज्जा अथवा हठवश स्त्री यदि मिथुन-धर्मके लिये विदुषी कन्या हो, उसे तिल-चावलकी खिचड़ी बनाकर पत्नी- अस्वीकार करे तो उसे आभरणादिद्वारा तथा अभिशापादि- सहित खाना चाहिये। और जो चाहता हो कि मेरा पुत्र द्वारा प्रेरित करे। पुरुषके 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आददे' इस मन्त्रयुक्त अभिशापसे स्त्री अयशस्विनी—वन्ध्या हो जाती है। * आजकल गर्भनिरोधके लिये कैसी-कैसी तामसी क्रियाएं की परन्तु यदि स्त्री अपने स्वामीकी अभिलाषा पूर्ण करती है तो स्वामीके जाती हैं, पर ये होती हैं प्राय असमयकी वृद्धिके लिये । और यह 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि' इस मन्त्रपाठपूर्वक वैदिक प्रक्रिया भी अपनी धर्मपत्नीको कभी गर्भधारण न कराना हो उपगत होनेसे पत्नी निश्चय ही यशस्विनी—पुत्रवती होती है।, तो उनके लिये । सयमी पुरुष ही ऐसा कर सकते थे ।