कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
भृगुवल्ली
ॐ भृगुवल्ली * प्रथम अनुवाक भृगुर्वै वारुणिः वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवाच। अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति। तꣳहोवाच। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा। वै = यह प्रसिद्ध है कि; वारुणिः = वरुणका पुत्र, भृगुः = भृगु; पितरम् = अपने पिता, वरुणम् उपससार = वरुणके पास गया (और विनयपूर्वक बोला—); भगवन् = भगवन्; (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका उपदेश कीजिये; इति = इस प्रकार प्रार्थना करनेपर, तस्मै = उससे, (वरुणने) एतत् = यह, प्रोवाच = कहा; अन्नम् = अन्न; प्राणम् = प्राण, चक्षुः = नेत्र; श्रोत्रम् = श्रोत्र, मनः = मन, (और) वाचम् = वाणी, इति = इस प्रकार (ये सब ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं); तम् ह उवाच = पुनः (वरुणने) उससे कहा, वै = निश्चय ही, इमानि = ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले; भूतानि = प्राणी; यतः = जिससे; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, येन = जिसके सहारे, जीवन्ति = जीवित रहते हैं; (तथा) प्रयन्ति = (अन्तमें इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; यत् अभिसंविशन्ति = जिसमें प्रवेश करते हैं, तत् = उसको; विजिज्ञासस्व = तत्त्वसे जाननेकी इच्छा कर, तत् = वही, ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार (पिताकी बात सुनकर), सः = उसने; तपः अतप्यत = तप किया, सः = उसने, तपः तप्त्वा = तप करके— व्याख्या—भृगु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि थे, जो वरुणके पुत्र थे। उनके मनमें परमात्माको जानने और प्राप्त करनेकी उत्कट अभिलाषा हुई, तब वे अपने पिता वरुणके पास गये। उनके पिता वरुण वेदको जाननेवाले, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे, अतः भृगुको किसी दूसरे आचार्यके पास जानेकी आवश्यकता नहीं हुई। अपने पिताके पास जाकर भृगुने इस प्रकार प्रार्थना की—'भगवन् ! मैं ब्रह्मको जानना चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने भृगुसे कहा—'तात ! अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी—ये सभी ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं। इन सबमें ब्रह्मकी सत्ता स्फुरित हो रही है।' साथ ही यह भी कहा—'ये प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले सब प्राणी जिनसे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिनके सहयोगसे, जिनका बल पाकर ये सब जीते हैं—जीवनोपयोगी क्रिया करनेमें समर्थ होते हैं और महाप्रलयके समय जिनमें विलीन हो जाते हैं, उनको वास्तवमें जाननेकी (पानेकी) इच्छा कर। वे ही ब्रह्म हैं।' इस प्रकार पिताका उपदेश पाकर भृगु ऋषिने ब्रह्मचर्य और शम दम आदि नियमोंका पालन करते हुए तथा समस्त भोगोंके त्यागपूर्वक सयमसे रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। यही उनका तप था। इस प्रकार तप करके उन्होने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है। ॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय अनुवाक अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तꣳ होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।
- वरुणने अपने पुत्र भृगु ऋषिको जिस ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था, उसीका इस वल्लीमें वर्णन है, इस कारण इसका नाम भृगुवल्ली है।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५१ अन्नम् = अन्न; ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार, व्यजानात् = जाना, हि = क्योंकि, खलु = सचमुच, अन्नात् = अन्नसे, एव = ही; इमानि = ये सब, भूतानि = प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर; अन्नेन = अन्नसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, (और) प्रयन्ति = (अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए, अन्नम् अभिसंविशन्ति = अन्नमे ही प्रविष्ट होते हैं; इति = इस प्रकार, तत् = उसको, विज्ञाय = जानकर, (वह) पुनः = पुनः, पितरम् = अपने पिता; वरुणम् एव उपससार = वरुणके ही पास गया, (तथा अपनी समझी हुई बात उसने पिताको सुनायी, किंतु पिताने उसका समर्थन नहीं किया। तब वह बोला—) भगवः = भगवन्, (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका बोध कराइये, इति = तब, तम् ह उवाच = उससे सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिमे कहा, तपसा = तपसे, ब्रह्म = ब्रह्मको, विजिज्ञासस्व = तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर, तपः = तप ही; ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार (पिताकी आज्ञा पाकर), सः = उसने, तपः अतप्यत = (पुनः) तप किया, सः = उसने; तपः तप्त्वा = तप करके— व्याख्या—भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि अन्न ही ब्रह्म है, क्योंकि पिताजीने ब्रह्मके जो लक्षण बताये थे, वे सब अन्नमें पाये जाते हैं। समस्त प्राणी अन्नसे-अन्नके परिणामभूत वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही उनका जीवन सुरक्षित रहता है और मरनेके बाद अन्नस्वरूप इस पृथ्वीमे ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने सब बातें कहीं। पिताने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा—'इसने अभी ब्रह्मके स्थूल रूपको ही समझा है, वास्तविक रूपतक इसकी बुद्धि नहीं गयी, अतः इसे तपस्या करके अभी और विचार करनेकी आवश्यकता है। पर जो कुछ इसने समझा है, उसमें इसकी तुच्छबुद्धि कराकर अश्रद्धा उत्पन्न कर देनेमे भी इसका हित नहीं है, अतः इसकी बातका उत्तर न देना ही ठीक है।' पितासे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर प्रार्थना की—'भगवन् ! यदि मैने ठीक नहीं समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने कहा—'तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको समझनेकी कोशिश कर। यह तप ब्रह्मका ही स्वरूप है, अतः यह उनका बोध करानेमें सर्वथा समर्थ है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि पुनः पहलेकी भाँति तपोमय जीवन बिताते हुए, पितासे पहले सुने हुए उपदेशके अनुसार ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करनेके लिये विचार करते रहे। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमे कही गयी है। ॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अनुवाक प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तम् होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा। प्राणः = प्राण, ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार, व्यजानात् = जाना; हि = क्योकि, खलु = सचमुच, प्राणात् = प्राणसे; एव = ही, इमानि = ये समस्त, भूतानि = प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, प्राणेन = प्राणसे ही; जीवन्ति = जीते हैं, (और) प्रयन्ति = (अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए, प्राणम् अभिसंविशन्ति = प्राणमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं, इति = इस प्रकार, तत् = उसे, विज्ञाय = जानकर, पुनः = फिर; पितरम् वरुणम् एव उपससार = (अपने) पिता वरुणके ही पास गया (और वहाँ उसने अपना निश्चय सुनाया, जब पिताने उत्तर नहीं दिया, तब वह बोला—); भगवः = भगवन्, (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका उपदेश दीजिये, इति = इस प्रकार प्रार्थना करनेपर, ह तम् उवाच = सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिमे उससे कहा, ब्रह्म = ब्रह्मको, तपसा = तपसे, विजिज्ञासस्व = तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः = तप ही, ब्रह्म = ब्रह्म अर्थात् उनकी प्राप्तिका बड़ा साधन है, इति = इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर, सः = उसने; (पुनः) तपः अतप्यत = तप किया; सः = उसने, तपः तप्त्वा = तप करके—
३५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-भृगुने पिताके उपदेशानुसार तपके द्वारा यह निश्चय किया कि प्राण ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा, पिताजीद्वारा बताये हुए ब्रह्मके लक्षण प्राणमें पूर्णतया पाये जाते हैं। समस्त प्राणी प्राणसे उत्पन्न होते हैं, अर्थात् एक जीवित प्राणीसे उसीके सदृश दूसरा प्राणी उत्पन्न होता हुआ प्रत्यक्ष देखा जाता है, तथा सभी प्राणसे ही जीते हैं। यदि श्वासका आना-जाना बंद हो जाय, यदि प्राणद्वारा अन्न ग्रहण न किया जाय तथा अन्नका रस समस्त शरीरमें न पहुँचाया जाय, तो कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता। और मरनेके बाद सब प्राणमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मृत शरीरमें प्राण नहीं रहते, अतः निःसंदेह प्राण ही ब्रह्म है, यह निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास गये। पहलेकी भाँति अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने पुनः पितासे अपना अनुभव निवेदन किया। पिताने फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो कुछ सूक्ष्मतामें पहुँचा है, परन्तु अभी बहुत कुछ समझना शेष है, अतः उत्तर न देनेसे अपने-आप इसकी जिज्ञासामें बल आयेगा, अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पिताजीसे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर उनसे प्रार्थना की—'भगवन् ! यदि अब भी मैने ठीक न समझा हो तो आप ही कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने पुनः वही बात कही—'तू तपके द्वारा ब्रह्मको जाननेकी चेष्टा कर, यह तप ही ब्रह्म है, अर्थात् ब्रह्मके तत्त्वको जाननेका प्रधान साधन है।' इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि फिर उसी प्रकार तपस्या करते हुए पिताके उपदेशपर विचार करते रहे। तपस्या करके उन्होंने क्या किया, यह अगले अनुवाकमें बताया गया है। ॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ अनुवाक मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । मनसा जातानि जीवन्ति । मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । मनः=मन; ब्रह्म= ब्रह्म है, इति=इस प्रकार, व्यजानात्=समझा, हि=क्योंकि, खलु=सचमुच, मनसः=मनसे, एव=ही, इमानि=ये समस्त, भूतानि=प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, मनसा=मनसे ही, जीवन्ति=जीते हैं, (तथा) प्रयन्ति=(इस लोकसे) प्रयाण करते हुए, (अन्तमें) मनः अभिसंविशन्ति=मनमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं, इति = इस प्रकार, तत्=उस ब्रह्मको, विज्ञाय= जानकर, पुनः एव=फिर भी, पितरम्= अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और अपनी बातका कोई उत्तर न पाकर बोला—), भगवः =भगवन्; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये, इति= इस प्रकार (प्रार्थना करनेपर), ह तम् उवाच = सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म= ब्रह्मको, तपसा=तपसे, विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही, ब्रह्म= ब्रह्म है, इति=इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर, सः=उसने, तपः अतप्यत=तप किया, सः=उसने, तपः तप्त्वा=तप करके— व्याख्या—इस बार भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि मन ही ब्रह्म है, क्योंकि उन्होंने सोचा, पिताजीके बताये हुए ब्रह्मके सारे लक्षण मनमें पाये जाते हैं। मनसे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं—स्त्री और पुरुषके मानसिक प्रेमपूर्ण सम्बन्धसे ही प्राणी बीजरूपसे माताके गर्भमें आकर उत्पन्न होते हैं; उत्पन्न होकर मनसे ही इन्द्रियोंद्वारा समस्त जीवनोपयोगी वस्तुओंका उपभोग करके जीवित रहते हैं और मरनेके बाद मनमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं—मरनेके बाद इस शरीरमें प्राण और इन्द्रियाँ नहीं रहतीं, इसलिये मन ही ब्रह्म है। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास गये और अपने अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पितासे कोई उत्तर नहीं मिला। पिताने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो गहराईमें उतरा है, परंतु अभी इसे और भी तपस्या करनी चाहिये, अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पितासे अपनी बातका उत्तर न पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति प्रार्थना की—'भगवन् ! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो कृपया आप ही मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने पुनः वही उत्तर दिया—'तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५३ इच्छा कर। अर्थात् तपस्या करते हुए मेरे उपदेशपर पुनः विचार कर। यह तपरूप साधन ही ब्रह्म है। ब्रह्मको जानने- का इससे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नही है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहकर पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमे कही गयी है। ॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम अनुवाक विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । विज्ञानेन जातानि जीवन्ति । विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । विज्ञानम् = विज्ञान; ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार, व्यजानात् = जाना; हि = क्योकि, खलु = सचमुच; विज्ञानात् = विज्ञानसे, एव = ही, इमानि = ये समस्त, भूतानि = प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, विज्ञानेन = विज्ञानसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, (और) प्रयन्ति = अन्तमें यहाँसे प्रयाण करते हुए, विज्ञानम् अभिसंविशन्ति = विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं, इति = इस प्रकार; तत् = ब्रह्मको, विज्ञाय = जानकर, पुनः एव = (वह) पुनः उसी प्रकार; पितरम् = अपने पिता; वरुणम् उपससार = वरुणके पास गया, (और अपनी बातका उत्तर न मिलनेपर बोला-) भगवः = भगवन् !, (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति = इस प्रकार कहनेपर, ह तम् उवाच = सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिणे उससे कहा, ब्रह्म = ब्रह्मको, तपसा = (तू) तपके द्वारा; विजिज्ञासस्व = तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर, तपः = तप ही, ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर; सः = उसने, तपः अतप्यत = पुनः तप किया; सः = उसने; तपः तप्त्वा = तप करके- व्याख्या-इस बार उन्होंने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि यह विज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है; क्योंकि उन्होंने सोचा-पिताजीने जो ब्रह्मके लक्षण बताये थे, वे सब-के-सब पूर्णतया इसमें पाये जाते हैं। ये समस्त प्राणी जीवात्मासे ही उत्पन्न होते हैं, सजीव चेतन प्राणियोंसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। उत्पन्न होकर इस विज्ञान- स्वरूप जीवात्मासे ही जीते हैं, यदि जीवात्मा न रहे तो ये मन, इन्द्रियाँ, प्राण आदि कोई भी नहीं रह सकते और कोई भी अपना-अपना काम नहीं कर सकते। तथा मरनेके बाद ये मन आदि सब जीवात्मामें ही प्रविष्ट हो जाते हैं-जीवके निकल जानेपर मृत शरीरमें ये सब देखनेमें नहीं आते। अतः विज्ञानस्वरूप जीवात्मा ही ब्रह्म है। यह निश्चय करके वे पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चित अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पिताजीने कोई उत्तर नही दिया। पिताने सोचा-'इस बार यह बहुत कुछ ब्रह्मके निकट आ गया है, इसका विचार स्थूल और सूक्ष्म-दोनों प्रकारके जडतत्त्वोंसे ऊपर उठकर चेतन जीवात्मातक तो पहुँच गया है। परंतु ब्रह्मका स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है, वे तो नित्य आनन्दस्वरूप एक अद्वितीय परमात्मा हैं; इसे अभी और तपस्या करनेकी आवश्यकता है, अतः उत्तर न देना ही ठीक है।' इस प्रकार बार-बार पिताजीसे कोई उत्तर न मिलनेपर भी भृगु हतोत्साह या निराश नहीं हुए। उन्होंने पहलेकी भाँति पुनः पिताजीसे वही प्रार्थना की- 'भगवन् ! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका रहस्य बतलाइये।' तब वरुणने पुनः वही उत्तर दिया-'तू तपके द्वारा ही ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्यापूर्वक उसका पूर्व- कथनानुसार विचार कर। तप ही ब्रह्म है।' इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह आगे बताया गया है। ॥ अनुवाक ॥ ५ ॥ उ० सं० ४५-
३५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * षष्ठ अनुवाक आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । स य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या । आनन्दः = आनन्द ही; ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार; व्यजानात् = निश्चयपूर्वक जाना; हि = क्योंकि; खलु = सचमुच; आनन्दात् = आनन्दसे, एव = ही, इमानि = ये समस्त; भूतानि = प्राणी; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं; जातानि = उत्पन्न होकर, आनन्देन = आनन्दसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, (तथा) प्रयन्ति = इस लोकसे प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) आनन्दम् अभिसंविशन्ति = आनन्दमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति = इस प्रकार (जाननेपर उसे परब्रह्मका पूरा ज्ञान हो गया), सा = वह; एषा = यह, भार्गवी = भृगुकी जानी हुई; वारुणी = और वरुणद्वारा उपदेश की हुई; विद्या = विद्या. परमे व्योमन् = विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें, प्रतिष्ठिता = प्रतिष्ठित है अर्थात् पूर्णतः स्थित है; यः = जो कोई (दूसरा साधक) भी, एवम् = इस प्रकार (आनन्दस्वरूप ब्रह्मको), वेद = जानता है, सः = वह; (उस विशुद्ध आकाशस्वरूप परमानन्दमे) प्रतितिष्ठति = स्थित हो जाता है, (इतना ही नहीं, इस लोकमें लोगोंके देखनेमें भी वह) अन्नवान् = बहुत अन्नवाला, अन्नादः = और अन्नको भलीभाँति पचानेकी शक्तिवाला; भवति = हो जाता है, (तथा) प्रजया = सन्तानसे; पशुभिः = पशुओंसे, (तथा) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर, महान् = महान्; भवति = हो जाता है, कीर्त्या [अपि] = उत्तम कीर्तिके द्वारा भी, महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या-इस बार भृगुने पिताके उपदेशपर गहरा विचार करके यह निश्चय किया कि आनन्द ही ब्रह्म है। ये आनन्दमय परमात्मा ही अन्नमय आदि सबके अन्तरात्मा हैं। वे सब भी इन्हींके स्थूल रूप हैं। इसी कारण उनमें ब्रह्मबुद्धि होती है और ब्रह्मके आंशिक लक्षण पाये जाते हैं। परतु सर्वोत्तमे ब्रह्मके लक्षण आनन्दमें ही घटते हैं, क्योंकि ये समस्त प्राणी उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मासे ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न होते हैं- इन सबके आदि कारण तो वे ही हैं। तथा इन आनन्दमयके आनन्दका लेश पाकर ही ये सब प्राणी जी रहे हैं-कोई भी दुःखके साथ जीवित रहना नहीं चाहता। इतना ही नहीं, उन आनन्दमय सर्वान्तर्यामी परमात्माकी अचिन्त्यशक्तिकी प्रेरणासे ही इस जगत्के समस्त प्राणियोंकी सारी चेष्टाएँ हो रही हैं। उनके शासनमें रहनेवाले सूर्य आदि यदि अपना-अपना काम न करें तो एक क्षण भी कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता। सबके जीवनाधार सचमुच वे आनन्दस्वरूप परमात्मा ही हैं। तथा प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंसे भरा हुआ यह ब्रह्माण्ड उन्हींमें प्रविष्ट होता है-उन्हींमें विलीन होता है; वे ही सबके सब प्रकारसे सदा-सर्वदा आधार हैं। इस प्रकार अनुभव होते ही भृगुको परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान हो गया। फिर उन्हें किसी प्रकारकी जिज्ञासा नहीं रही। श्रुति स्वय उस विद्याकी महिमा बतलानेके लिये कहती है-वही यह वरुणद्वारा बतायी हुई और भृगुको प्राप्त हुई ब्रह्मविद्या (ब्रह्मका रहस्य बतानेवाली विद्या) है। यह विद्या विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें स्थित है। वे ही इस विद्याके भी आधार हैं। जो कोई मनुष्य भृगुकी भाँति तपस्यापूर्वक इसपर विचार करके परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह भी उन विशुद्ध परमानन्दस्वरूप परमात्मामे स्थित हो जाता है। इस प्रकार इस विद्याका वास्तविक फल बताकर मनुष्योंको उस साधनकी ओर लगानेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे अन्न, प्राण आदि समस्त तत्त्वोंके रहस्य विज्ञानपूर्वक ब्रह्मको जाननेवाले ज्ञानीके शरीर और अन्तःकरणमें जो स्वाभाविक विलक्षण शक्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, उनको भी श्रुति बतलाती है। वह अन्नवान् अर्थात् नाना प्रकारके जीवनयात्रोपयोगी भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है और उन सबको सेवन करनेकी सामर्थ्य भी उसमें आ जाती है। अर्थात् उसके मन, इन्द्रियों और शरीर सर्वथा निर्विकार और नीरोग हो जाते हैं। इतना ही नहीं, वह सन्तानसे, पशुओंसे, ब्रह्मतेजसे और बड़ी भारी कीर्तिसे समृद्ध होकर जगत्में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है। ॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥
ॐ तैत्तिरीयोपनिषद् ॐ ३५५ सप्तम अनुवाक सम्बन्ध—छठे अनुवाकमें ब्रह्मज्ञानीके अन्न और प्रजा आदिसे सम्पन्न होनेकी बात कही गयी, उसपर यह जिज्ञासा होती है कि ये सब सिद्धियाँ भी क्या ब्रह्माक्षात्कार होनेपर ही मिलती हैं, या इन्हें प्राप्त करनेका दूसरा उपाय भी है। इसपर उन सबकी प्राप्तिके दूसरे उपाय भी बताये जाते हैं— अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या । अन्नम् न निन्द्यात् = अन्नकी निन्दा न करे; तत् = वह; व्रतम् = व्रत है. प्राण.= प्राण, वै = ही; अन्नम् = अन्न है; (और) शरीरम् = शरीर; (उस प्राणरूप अन्नसे जीनेके कारण) अन्नादम् = अन्नका भोक्ता है; शरीरम् = शरीर; प्राणे = प्राणके आधारपर, प्रतिष्ठितम् = स्थित हो रहा है; (और) शरीरे = शरीरके आधारपर; प्राण.= प्राण. प्रतिष्ठितः = स्थित हो-रहे हैं; तत् = इस तरह, एतत् = यह, अन्ने = अन्नमें ही, अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = स्थित हो रहा है, यः = जो मनुष्य; अन्ने = अन्नमें ही; अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित हो रहा है; एतत् = इस रहस्यको, वेद = जानता है; सः = वह; प्रतितिष्ठति = उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है; (अतः) अन्नवान् = अन्नवाला, (और) अन्नादः = अन्नको खानेवाला, भवति = हो जाता है, प्रजया = प्रजासे, पशुभि.= पशुओंसे, ब्रह्मवर्चसेन = (और) ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर महान् = महान्; भवति = बन जाता है; (तथा) कीर्त्या = कीर्तिसे (सम्पन्न होकर भी); महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या—इस अनुवाकमें अन्नका महत्त्व बतलाकर उसे जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अन्नादिसे सम्पन्न होना चाहे, उसे सबसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये कि 'मैं कभी अन्नकी निन्दा नहीं करूँगा।' यह एक साधारण नियम है कि जिस किसी वस्तुको मनुष्य पाना चाहता है, उसके प्रति उसकी महत्त्वबुद्धि होनी चाहिये, तभी वह उसके लिये प्रयत्न करेगा। जिसकी चित्तमें हेयबुद्धि है, वह उसकी ओर आँख उठाकर देखेगा भी नहीं। अन्नकी निन्दा न करनेका व्रत लेकर अन्नके इस महत्त्वको समझना चाहिये कि अन्न ही प्राण है, और प्राण ही अन्न है, क्योंकि अन्नसे ही प्राणोंमें बल आता है और प्राणशक्तिसे ही अन्नमय शरीरमें जीवनी-शक्ति आती है। यहाँ प्राणको अन्न इसलिये भी कहा है कि यही शरीरमें अन्नके रसको सर्वत्र फैलाता है। शरीर प्राणके ही आधार टिका हुआ है, इसीलिये वह प्राणरूप अन्नका भोक्ता है। शरीर प्राणमें स्थित है अर्थात् शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन है और प्राण शरीरमें स्थित है—प्राणोंका आधार शरीर है, यह बात प्रत्यक्ष है ही। इस प्रकार यह अन्नमय शरीर भी अन्न है। यह अनुभवसिद्ध विषय है कि प्राणोंको आहार न मिलनेपर वे शरीरकी धातुओंको ही सोख लेते हैं। और शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन होनेसे प्राण भी अन्न ही हैं। अतः शरीर और प्राणका अन्योन्याश्रय सम्बन्ध होनेसे यह कहा गया है कि अन्नमे ही अन्न स्थित हो रहा है। यही इसका तत्त्व है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है, वही शरीर और प्राण—इन दोनोंका ठीक ठीक उपयोग कर सकता है। इसीलिये यह कहा गया है कि वह शरीर और प्राणके विज्ञानमें पारङ्गत हो जाता है। और इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह सब प्रकारकी भोगसामग्रीसे युक्त और उसे उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। और इसीलिये वह सन्तानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे भी सम्पन्न होकर महान् बन जाता है। उसकी कीर्ति, उसका यश जगत्में फैल जाता है और उसके द्वारा भी वह जगत्में महान् हो जाता है। ॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥ 🙞···🙜 अष्टम अनुवाक अन्नं न परिचक्षीत । तद्व्रतम् । आपो वा अन्नम् । ज्योतिरन्नादम् । अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम् ।
३५६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या । अन्नम् न परिचक्षीत = अन्नकी अवहेलना न करे; तत् = वह; व्रतम् = एक व्रत है, आपः = जल; वै = ही; अन्नम् = अन्न है, ( और ) ज्योतिः = तेज, अन्नादम् = ( रसस्वरूप ) अन्नका भोक्ता है; अप्सु = जलमें; ज्योतिः = तेज; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, ज्योतिषि = तेजमें, आपः = जल, प्रतिष्ठिताः = प्रतिष्ठित है, तत् = वही; एतत् = यह; अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, यः = जो मनुष्य, ( इस प्रकार ) अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है; एतत् = इस रहस्यको, वेद = भलीभाँति समझता है, सः = वह, ( अन्तमे ) प्रतितिष्ठति = ( उस रहस्यमे ) परिनिष्ठित हो जाता है, ( तथा ) अन्नवान् = अन्नवाला, ( और ) अन्नादः = अन्नको खानेवाला; भवति = हो जाता है; प्रजया = ( वह ) संतानसे; पशुभिः = पशुओंसे, ( और ) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे, महान् = महान्; भवति = बन जाता है, ( तथा ) कीर्त्या = कीर्तिसे ( समृद्ध होकर भी ); महान् = महान्, [ भवति = हो जाता है । ] व्याख्या - इस अनुवाकमें जल और ज्योति दोनोंको अन्नरूप बताकर उन्हें जाननेका फल बतलाया है । भाव यह है कि जिस मनुष्यकी अन्नादिसे सम्पन्न होनेकी इच्छा हो, उसे यह नियम ले लेना चाहिये कि 'मैं कभी अन्नकी अवहेलना नहीं करूँगा अर्थात् अन्नका उल्लङ्घन, दुरुपयोग और परित्याग नहीं करूँगा एव उसे जूठा नहीं छोड़ें गा ।' यह साधारण नियम है कि जो जिस वस्तुका अनादर करता है, उसके प्रति उपेक्षाबुद्धि रखता है, वह वस्तु उसका कभी वरण नहीं करती । किसी भी वस्तुको प्राप्त करनेके लिये उसके प्रति आदरबुद्धि रखना परमावश्यक है । जिसकी जिसमें आदरबुद्धि नहीं है, वह उसे पानेकी इच्छा अथवा चेष्टा क्यों करेगा । इस प्रकार अन्नकी अवहेलना न करनेका व्रत लेकर फिर अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि जल ही अन्न है; क्योंकि सब प्रकारके अन्न अर्थात् खाद्य वस्तुएँ जलसे ही उत्पन्न होती हैं। और ज्योति अर्थात् तेज ही इस जलरूप अन्नको भक्षण करनेवाला है । जिस प्रकार अग्नि एवं सूर्यरश्मियाँ आदि बाहरके जलका शोषण करती हैं, उसी प्रकार शरीरमें रहनेवाली जठराग्नि शरीरमें जानेवाले जलीय तत्त्वोंका शोषण करती है । जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है। यद्यपि जल स्वभावतः ठंडा है, अतएव उसमें उष्ण ज्योति कैसे स्थित है- यह बात समझमें नहीं आती, तथापि शास्त्रोंमें यह माना गया है कि समुद्रमे वडवानल रहता है तथा आजकलके वैज्ञानिक भी जलमेंसे बिजली-तत्त्वको निकालते हैं। इससे यह बात सिद्ध होती है कि जलमें तेज स्थित है । इसी प्रकार तेजमें जल स्थित है, यह तो प्रत्यक्ष देखनेमें आता ही है, क्योंकि सूर्यकी प्रखर किरणोंमें स्थित जल ही हमलोगोंके सामने वृष्टिके रूपमें प्रत्यक्ष होता है । इस प्रकार ये जल और तेज अन्योन्याश्रित होनेके कारण समस्त अन्नरूप खाद्य पदार्थोंके कारण हैं, अतः ये ही उनके रूपमें परिणत होते हैं, इसलिये दोनों अन्न ही हैं। इस प्रकार अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस तत्त्वको समझ लेता है, वह इन दोनोंके विज्ञानमें प्रतिष्ठित अर्थात् सिद्ध हो जाता है, क्योंकि वही इन दोनोंका ठीक उपयोग कर सकता है । और इसीके फलस्वरूप वह अन्नसे अर्थात् सब प्रकारकी भोग-सामग्रीसे सम्पन्न और उन सबको यथायोग्य उपभोगमें लानेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है। और इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो महान् हो जाता है। इतना ही नहीं, इस समृद्धिके कारण उसका यश सर्वत्र फैल जाता है, वह बड़ा भारी यशस्वी हो जाता है । और उस यशके कारण भी वह महान् हो जाता है । ॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥ नवम अनुवाक अन्नं बहु कुर्वीत । तद् व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या ।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५७
-अन्नम् = अन्नको; बहु कुर्वीत = बढ़ाये; तत् = वह; व्रतम् = एक व्रत है; पृथिवी = पृथ्वी; वै = ही; अन्नम् = अन्न है; आकाशः = आकाश; अन्नादः = पृथ्वीरूप अन्नका आधार होनेसे (मानो) अन्नाद है; पृथिव्याम् = पृथ्वीमें, आकाशः = आकाश; प्रतिष्ठितः = प्रतिष्ठित है; आकाशे = आकाशमे, पृथिवी = पृथ्वी; प्रतिष्ठिता = प्रतिष्ठित है; तत् = वही; एतत् = यह, अन्ने = अन्नमें; अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, यः = जो मनुष्य; (इस प्रकार) अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, एतत् = इस रहस्यको; वेद = भलीभाँति जान लेता है; सः = वह; (उस विषयमें) प्रतितिष्ठति = प्रतिष्ठित हो जाता है, अन्नवान् = अन्नवाला; (और) अन्नादः = अन्नको खानेवाला अर्थात् उसे पचानेकी शक्तिवाला, भवति = हो जाता है, प्रजया = (वह) प्रजासे; पशुभिः = पशुओंसे, (और) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे; महान् = महान्, भवति = बन जाता है; कीर्त्या = कीर्तिसे, [च = भी;] महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या—इस अनुवाकमें पृथ्वी और आकाश दोनोंको अन्नरूप बताकर उनके तत्त्वको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्यको अन्नादिसे समृद्ध होनेकी इच्छा हो, उसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये—यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि 'मैं अन्नको खूब बढ़ाऊँगा।' किसी वस्तुका अभ्युदय—उसका विस्तार चाहना ही उसे आकर्षित करनेका सबसे श्रेष्ठ उपाय है। जो जिस वस्तुको क्षीण करनेपर तुला हुआ है, वह वस्तु उसे कदापि नहीं मिल सकती और मिलनेपर टिकेगी नहीं। इसके बाद अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि पृथ्वी ही अन्न है—जितने भी अन्न है वे सब पृथ्वीसे ही उत्पन्न होते हैं। और पृथ्वीको अपनेमें विलीन कर लेनेवाला इसका आधारभूत आकाश ही अन्नाद अर्थात् इस अन्नका भोक्ता है। पृथ्वीमें आकाश स्थित है, क्योंकि वह सर्वव्यापी है, और आकाशमें पृथ्वी स्थित है—यह बात प्रत्यक्ष- सिद्ध है। ये दोनों ही एक दूसरेके आधार होनेके कारण अन्नस्वरूप हैं। पाँच भूतोंमें आकाश पहला तत्त्व है और पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है, बीचके तीनों तत्त्व इन्हींके अन्तर्गत हैं। समस्त भोग्यपदार्थरूप अन्न इन पाँच महाभूतोंके ही कार्य हैं; अतः ये ही अन्नके रूपमें स्थित हैं। इसलिये अन्नमें ही अन्न प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस बातको तत्त्वसे जानता है कि पृथ्वीरूप अन्नमें आकाशरूप अन्न और आकाशरूप अन्नमें पृथ्वीरूप अन्न प्रतिष्ठित है, वही सम्पूर्ण भूतोंका यथायोग्य उपयोग कर सकता है और इसीलिये वह इस विषयमें सिद्ध हो जाता है। इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह अन्नसे अर्थात् सब प्रकारके भोग्य पदार्थोंसे और उनको उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। और इसीलिये वह सन्तानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और विद्याके तेजसे समृद्ध हो महान् बन जाता है। उसका यश समस्त जगत्में फैल जाता है, अतः वह यशके द्वारा भी महान् हो जाता है। ॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ ९ ॥
दशम अनुवाक न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद् व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नꣳराद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वै मध्यतोऽ- न्नꣳराद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नꣳराद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । य एवं वेद । वसतौ = अपने घरपर (ठहरनेके लिये आये हुए); कंचन = किसी (भी अतिथि) को; न प्रत्याचक्षीत = प्रतिकूल उत्तर न दे, तत् = वह, व्रतम् = एक व्रत है, तस्मात् = इसलिये, (अतिथि-सत्कारके लिये) यया कया च विधया = जिस किसी भी प्रकारसे, बहु = बहुत-सा, अन्नम् = अन्न, प्राप्नुयात् = प्राप्त करना चाहिये, (क्योंकि सद्गृहस्थ) अस्मै = इस (घरपर आये हुए अतिथि) से, अन्नम् = भोजन, अराधि = तैयार है; इति = यों, आचक्षते = कहते हैं, (यदि यह अतिथिको) मुखतः = मुख्यवृत्तिसे अर्थात् अधिक श्रद्धा, प्रेम और सत्कारपूर्वक, एतत् = यह, राद्धम् = तैयार किया हुआ, 'अन्नम् = भोजन (देता है तो), वै = निश्चय ही, अस्मै = इस (दाता) को, मुखतः = अधिक आदर-सत्कारके साथ ही, अन्नम् =
३५८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
अन्नं, राध्यते= प्राप्त होता है; (यदि यह अतिथिको ) मध्यतः=मध्यम श्रेणीकी श्रद्धा और प्रेमसे; एतत् = यह; राद्धम् = तैयार किया हुआ; अन्नम् = भोजन (देता है तो); चै = निःसन्देह; अस्मै = इस (दाता) को; मध्यतः = मध्यम श्रद्धा और प्रेमसे ही, अन्नम् राध्यते=अन्न प्राप्त होता है; (और यदि यह अतिथिको) अन्ततः = निकृष्ट श्रद्धा-सत्कारसे, एतत् = यह; राद्धम् = तैयार किया हुआ; अन्नम् = भोजन (देता है तो), वै = अवश्य ही; अस्मै = इस (दाता) को, अन्ततः = निकृष्ट श्रद्धा आदिसे; अन्नम् = अन्न; राध्यते = मिलता है; यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद = इस रहस्यको जानता है (वह अतिथिके साथ बहुत उत्तम बर्ताव करता है)।
**व्याख्या—**दसवें अनुवाकके इस अंशमें अतिथि-सेवाका महत्त्व और फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अतिथि-सेवाका पूरा लाभ उठाना चाहे, उसको सबसे पहले तो यह नियम लेना चाहिये कि 'मेरे घरपर जो कोई अतिथि आश्रयकी आशासे पधारेगा, मैं कभी उसको सूखा जवाब देकर निराश नहीं लौटाऊँगा।' 'अतिथिदेवो भव'— अतिथिकी देवताबुद्धिसे सेवा करो—यह उपदेश गुरुके द्वारा स्नातक शिष्यको पहले ही दिया जा चुका है। इस प्रकारका नियम लेनेपर ही अतिथि-सेवा सम्भव है। यह व्रत लेकर इसका पालन करनेके लिये—केवल अपना तथा कुटुम्बका पोषण करनेके लिये ही नहीं—जिस किसी भी न्यायोचित उपायसे बहुत से अन्नका उपार्जन करे। धन-सम्पत्ति और अन्नादि, जो शरीरके पालन पोषणके लिये उपयोगी सामग्री हैं, उन्हें प्राप्त करनेके लिये जितने भी न्यायोचित उपाय बताये गये हैं तथा पूर्वके तीन अनुवाकोंमें भी जो-जो उपाय बताये गये हैं, उनमेंसे किसीके भी द्वारा बहुत-सा अन्न प्राप्त करना चाहिये। अर्थात् अतिथि-सेवाके लिये आवश्यक वस्तुओंका अधिक मात्रामे सङ्ग्रह करना चाहिये; क्योंकि अतिथि-सेवा गृहस्थोचित सदाचारका एक अत्यावश्यक अङ्ग है। अच्छे प्रतिश्रित मनुष्य घरपर आये हुए अतिथिसे यही कहते हैं—'आइये, बैठिये; भोजन तैयार है, भोजन कीजिये' इत्यादि। वे यह कदापि नहीं कहते कि हमारे यहाँ आपकी सेवाके लिये उपयुक्त वस्तुएँ अथवा रहनेका स्थान नहीं है। जो मनुष्य अपने घरपर आये हुए अतिथिकी अधिक आदर-सत्कारपूर्वक उत्तमभावसे विशुद्ध सामग्रियोंद्वारा सेवा करता है—उसे शुद्धतापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन देता है, उसको भी उत्तमभावसे ही अन्न प्राप्त होता है अर्थात् उसे भोग्य-पदार्थाके संग्रह करनेमें कठिनाईका सामना नहीं करना पड़ता। अतिथि-सेवाके प्रभावसे उसे किसी बातकी कमी नहीं रहती। अनायास उसकी सारी आवश्यकताएँ पूर्ण होती रहती हैं। यदि वह आये हुए अतिथिकी मध्यमभावसे सेवा करता है, साधारण रीतिसे भोजनादि तैयार करके विशेष आदर-सत्कारके बिना ही अतिथिको भोजन आदि कराके उसे सुख पहुँचाता है, तो उसे भी साधारण रीतिसे ही अन्न प्राप्त होता है। अर्थात् अन्न-वस्त्र आदि पदार्थोंका सङ्ग्रह करनेमें उसे साधारणतया आवश्यक परिश्रम करना पड़ता है। जिस भावसे वह अतिथिको देता है, उसी भावसे उतने ही आदर-सत्कारके साथ उसे वे वस्तुएँ मिलती हैं। इसी प्रकार यदि कोई अन्तिम वृत्तिसे अर्थात् बिना किसी प्रकारका आदर- सत्कार किये तुच्छ भावसे भाररूप समझकर अतिथिकी सेवा करता है—उसे निकृष्ट भावसे अश्रद्धापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन आदि पदार्थ देता है, तो उसे वे पदार्थ वैसे ही भावसे प्राप्त होते हैं। अर्थात् उनकी प्राप्तिके लिये उसे अधिक-से-अधिक परिश्रम करना पड़ता है, लोगोंकी खुशामद करनी पड़ती है। जो मनुष्य इस प्रकार इस रहस्यको जानता है, वह उत्तम रीतिसे और विशुद्धभावसे अतिथि सेवा करता है, अतः उसे सर्वोत्तम फल जो पहले तीन अनुवाकोंमें बताया गया है, वह मिलता है।
**सम्बन्ध—**अब परमात्माका विभूतिरूपसे सर्वत्र चिन्तन करनेका प्रकार बताया जाता है—
क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति दृष्टौ । बलमिति विद्युति । यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे ।
[ सः परमात्मा = वह परमात्मा, ] वाचि = वाणीमें; क्षेमः इति = रक्षाशक्तिके रूपसे है; प्राणापानयोः = प्राण और अपानमें, योगक्षेमः इति = प्राप्ति और रक्षा—दोनों शक्तियोंके रूपमें है, हस्तयोः = हाथोंमें; कर्म इति = कर्म करनेकी शक्तिके रूपमें है, पादयोः = पैरोंमें, गतिः इति = चलनेकी शक्तिके रूपमें स्थित है, पायौ = गुदामें, विमुक्तिः इति = मलत्यागकी शक्ति बनकर है, इति = इस प्रकार (ये), मानुषीः समाज्ञा = मानुषी समाज्ञा अर्थात् आध्यात्मिक उपासनाएँ हैं, अथ = अब;
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५९ दैवी = दैवी उपासनाओंका वर्णन करते हैं; (वह परमात्मा) वृष्टौ = वृष्टिमें; तृप्तिः इति = तृप्ति-शक्तिके रूपमें है; विद्युति = बिजलीमें; बलम् इति = बल (पावर) बनकर स्थित है; पशुषु = पशुओंमें, यशः इति = यशके रूपमें स्थित है; नक्षत्रेषु = ग्रहों और नक्षत्रोंमें; ज्योतिः इति = ज्योतिरूपसे स्थित है, उपस्थे = उपस्थमें; प्रजातिः = प्रजा उत्पन्न करनेकी शक्ति, अमृतम् = वीर्यरूप अमृत (और); आनन्दः = आनन्द देनेकी शक्ति, इति = बनकर स्थित है, आकाशे = (तथा) आकाशमें; सर्वम् इति = सबका आधार बनकर स्थित है । व्याख्या-दसवें अनुवाकके इस अंशमें परमेश्वरकी विभूतियोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया है । भाव यह है कि सत्यरूप वाणीमें आशीर्वादादिके द्वारा जो रक्षा करनेकी शक्ति प्रतीत होती है, उसके रूपमें वहाँ परमात्माकी ही स्थिति है । प्राण और अपानमें जो जीवनोपयोगी वस्तुओंको आकर्षण करनेकी और जीवन-रक्षाकी शक्ति है, वह भी परमात्माका ही अंश है । इसी प्रकार हाथोंमें काम करनेकी शक्ति, पैरोंमें चलनेकी शक्ति और गुदामें मलत्याग करनेकी शक्ति भी परमात्माकी ही हैं । ये सब शक्तियाँ उन परमेश्वरकी शक्तिका ही एक अंश हैं । यह देखकर मनुष्यको परमेश्वरकी सत्तापर विश्वास करना चाहिये । यह मानुषी समाज्ञा बतायी गयी है, अर्थात् मनुष्यके शरीरमें प्रतीत होनेवाली परमात्माकी शक्तियोंका संक्षेपमे दिग्दर्शन कराया गया है । इसीको आध्यात्मिक (शरीर-सम्बन्धी) उपासना भी कह सकते हैं । इसी प्रकार दैवी पदार्थोंमें अभिव्यक्त होनेवाली शक्तिका वर्णन करते हैं । यह दैवी अथवा आधिदैविक उपासना है। वृष्टिमें जो अन्नादिको उत्पन्न करने तथा जल-प्रदानके द्वारा सबको तृप्त करनेकी शक्ति है, बिजलीमें जो बल (पावर) है, पशुओमे जो स्वामीका यश बढानेकी शक्ति है, नक्षत्रोंमें अर्थात् सूर्य, चन्द्रमा और तारागणोंमें जो प्रकाश है, उपस्थमें जो संतानोत्पादनकी शक्ति, वीर्यरूप अमृत* और आनन्द देनेकी शक्ति है तथा आकाशमें जो सबको धारण करनेकी और सर्वव्यापकताकी एवं अन्य सब प्रकारकी शक्ति है—ये सब उन परमेश्वरकी अचिन्त्य एव अपार शक्तिके ही किसी एक अंशकी अभिव्यक्तियाँ हैं । गीतामे भी कहा है कि इस जगत्में जो कुछ भी विभूति, शक्ति और शोभासे युक्त है, वह मेरे ही तेजका एक अंश है (गीता १० । ४१) । इन सबको देखकर मनुष्यको सर्वत्र एक परमात्माकी व्यापकताका रहस्य समझना चाहिये । सम्बन्ध-अब विविध भावनासे की जानेवाली उपासनाका फलसहित वर्णन करते हैं— तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति । तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद् ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद् ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत । पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । तत् = वह (उपास्यदेव); प्रतिष्ठा = 'प्रतिष्ठा' (सबका आधार) है; इति = इस प्रकार, उपासीत = (उसकी) उपासना करे तो; प्रतिष्ठावान् भवति = साधक प्रतिष्ठावाला हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव); महः = सबमे महान् है, इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उपासना करे तो, महान् = महान्, भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), मनः = 'मन' है, इति = इस प्रकार समझकर; उपासीत = उसकी उपासना करे तो; (ऐसा उपासक) मानवान् = मनन- शक्तिसे सम्पन्न; भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), नमः = 'नमः' (नमस्कारके योग्य) है; इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, अस्मै = ऐसे उपासकके लिये, कामाः = समस्त काम—भोग पदार्थ; नम्यन्ते = विनीत हो जाते हैं, तत् = वह (उपास्यदेव); ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, (ऐसा उपासक) ब्रह्मवान् = ब्रह्मसे युक्त, भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), ब्रह्मणः = परमात्माका; परिमरः = सबको मारनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी है, इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, एनम् परि = ऐसे उपासकके प्रति, द्विषन्तः = द्वेष रखनेवाले; सपत्नाः = शत्रु, म्रियन्ते = मर जाते हैं;
- शरीरका रक्षक एव पोषक तथा जीवनका आधार होनेसे वीर्यको अमृत कहा गया है । इसकी सावधानीके साथ रक्षा करनेसे अमृतत्वकी प्राप्ति भी सम्भव है ।
३६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ये = जो, परि = (उसका) सब प्रकारसे, अप्रियाः भ्रातृव्याः = अनिष्ट चाहनेवाले अप्रिय बन्धुजन हैं, [ ते अपि म्रियन्ते = वे भी मर जाते हैं।] व्याख्या-इस मन्त्रमे सकाम उपासनाका भिन्न-भिन्न फल बताया गया है। भाव यह है कि प्रतिष्ठा चाहनेवाला पुरुष अपने उपास्यदेवकी प्रतिष्ठाके रूपमे उपासना करे, अर्थात् 'वे उपास्यदेव ही सब की प्रतिष्ठा-सबके आधार हैं' इस भावसे उनका चिन्तन करे। ऐसे उपासककी संसारमे प्रतिष्ठा होती है। महत्त्वकी प्राप्तिके लिये यदि अपने उपास्यदेवको 'महान्' समझकर उनकी उपासना करे तो वह महान् हो जाता है—महत्त्वको प्राप्त कर लेता है। यदि अपने उपास्यदेवको महान् मनस्वी समझकर मनन करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे तो वह साधक मनन करनेकी विशेष शक्ति प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार जो अपने उपास्यदेवको नमस्कार करनेयोग्य शक्तिशाली समझकर वैसी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे, वह स्वयं नमस्कार करनेयोग्य बन जाता है, समस्त कामनाएँ उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। समस्त भोग अपने-आप उसके चरणोंमें लोटने लगते हैं। अनायास ही उसे समस्त भोग-सामग्री प्राप्त हो जाती है। तथा जो अपने उपास्यदेवको सबसे बड़ा-सर्वाधार ब्रह्म समझकर उन्हींकी प्राप्तिके लिये उनकी उपासना करे, वह ब्रह्मवान् बन जाता है, अर्थात् सर्वशक्तिमान् परमेश्वर उसके अपने बन जाते हैं—उसके वशमे हो जाते हैं। जो अपने उपास्यदेवको ब्रह्मके द्वारा सबका सहार करनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी देवता समझकर उनकी उपासना करता है, उससे द्वेष करनेवाले शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं तथा जो उसके अपकारी एवं अप्रिय बन्धुजन होते हैं, वे भी मारे जाते हैं। वास्तवमे किसी भी रूपमें किसी भी उपास्यदेवकी उपासना की जाय, वह प्रकारान्तरसे उन परब्रह्म परमेश्वरकी ही उपासना है, परतु सकाम मनुष्य अज्ञानवश इस रहस्यको न जाननेके कारण भिन्न-भिन्न शक्तियोंसे युक्त भिन्न-भिन्न देवताओंकी भिन्न-भिन्न कामनाओंकी सिद्धिके लिये उपासना करते हैं, इसलिये वे वास्तविक लाभसे वञ्चित रह जाते हैं (गीता ७। २१, २२, २३, २४; ९। २२, २३)। अतः मनुष्यको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर सब देवोंके देव सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासना उन्हींकी प्राप्तिके लिये करे, उनसे और कुछ न चाहे। सम्बन्ध-सर्वत्र एक ही परमात्मा परिपूर्ण हैं, इस बातको समझकर उन्हें प्राप्त कर लेनेका फल और प्राप्त करनेवालेकी स्थितिका वर्णन करते हैं— स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। सय एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुप- संक्राम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं विज्ञानमयमात्मानमुप- संक्राम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्राम्य । इमाँल्लोकान्कामान्नी कामरूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते । सः = वह (परमात्मा); यः = जो; अयम् = यह; पुरुषे = इस मनुष्यमें है, च = तथा; यः = जो, असौ = वह; आदित्ये च = सूर्यमें भी है, सः = वह (दोनोंका अन्तर्यामी); एकः = एक ही है; यः = जो (मनुष्य), एवंवित् = इस प्रकार तत्त्वसे जाननेवाला है; सः = वह, अस्मात् = इस; लोकात् = लोक (शरीर) से; प्रेत्य = उत्क्रमण करके; एतम् = इस, अन्नमयम् = अन्नमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर, एतम् = इस, प्राणमयम् = प्राणमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; एतम् = इस, मनोमयम् = मनोमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर, एतम् = इस; विज्ञानमयम् = विज्ञानमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; एतम् = इस; आनन्दमयम् = आनन्दमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; कामान्नी = इच्छानुसार भोगवाला; (और) कामरूपी = इच्छानुसार रूपवाला हो जाता है, (तथा) इमान् = इन, लोकान् अनुसंचरन् = सब लोकोंमें विचरता हुआ; एतत् = इस (आगे बताये हुए ); साम गायन् = साम (समतायुक्त उद्गारों) का गायन करता; आस्ते = रहता है। —वे परमात्मा, जिनका वर्णन पहले सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण कहकर किया जा चुका
३ तैत्तिरीयोपनिषद् * ३६१ है और जो परमानन्दस्वरूप है, वे इस पुरुषमे अर्थात् मनुष्यमे और सूर्यमे एक ही है। अभिप्राय यह कि सम्पूर्ण प्राणियोंमे अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एक ही परमात्मा है। नाना रूपोंमे उन्हीकी अभिव्यक्ति हो रही है। जो मनुष्य इस तत्त्व- को जान लेता है, वह वर्तमान शरीरसे अलग होनेपर उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, जिनका वर्णन अन्नमय आत्मा, प्राणमय आत्मा, मनोमय आत्मा, विज्ञानमय आत्मा और आनन्दमय आत्माके नामसे पहले किया गया है। इन सबको पाकर अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म भेदसे जो एककी अपेक्षा एकके अन्तरात्मा होकर नाना रूपोंमे स्थित हे और सबके अन्तर्यामी परमानन्दस्वरूप हैं, उनको प्राप्त करके मनुष्य पर्याप्त भोग-सामग्रीसे युक्त और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। साथ ही वह इन लोकोमे विचरता हुआ आगे बताये जानेवाले साम ( समतायुक्त भावो ) का गान करता रहता है। सम्बन्ध-उसके आनन्दमग्न मनम जो समता और सर्वरूपताके भाव उठा करते हैं, उनका वर्णन करते हैं- हा३वु हा३वु हा३वु । अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादो३ऽहमन्नादो३ऽहमन्नादः । अहग्ँश्लोककृदहग्ँश्लोककृदहग्ँश्लोककृत् । अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य । पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भायि। यो मा ददाति स इदेव मा३वाः। अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म् । सुवर्णं ज्योतीः । य एवं वेद । इत्युपनिषत् । हावु हावु हावु = आश्चर्य ! आश्चर्य !! आश्चर्य !II; अहम् = मै, अन्नम् = अन्न हूँ, अहम् = मं; अन्नम् = अन्न हूँ; अहम् = मै; अन्नम् = अन्न हूँ; अहम् = मैं ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ; अहम् = मै ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ, अहम् = मैं ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ; अहम् = मैं, श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ; अहम् = मैं, श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ, अहम् = मैं; श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ, अहम् = मैं, ऋतस्य = सत्यका अर्थात् प्रत्यक्ष दीखने- वाले जगत्की अपेक्षासे, प्रथमजाः = सबमें प्रधान होकर उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ), [च = और,] देवेभ्यः = देवताओंसे भी; पूर्वम् = पहले विद्यमान, अमृतस्य = अमृतका, नाभायि (नाभिः) = केन्द्र, अस्मि = हूँ, यः = जो कोई, मा = मुझे; ददाति = देता है, सः = वह, इत् = इस कार्यसे, एव = ही, मा आवाः = मेरी रक्षा करता है, अहम् = मे, अन्नम् = अन्नस्वरूप होकर, अन्नम् = अन्न, अदन्तम् = खानेवालेको, अद्मि = निगल जाता हूँ, अहम् = मै, विश्वम् = समस्त; भुवनम् अभ्यभवाम् = ब्रह्माण्डका तिरस्कार करता हूँ, सुवः न ज्योतीः = मेरे प्रकाशकी एक झलक सूर्यके समान है, यः = जो, एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है (उसे भी यही स्थिति प्राप्त होती है), इति = इस प्रकार, उपनिषत् = यह उपनिषद्-ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । व्याख्या-उस महापुरुषकी स्थिति शरीरमे नहीं रहती । वह शरीरसे सर्वथा ऊपर उठकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है । यह बात पहले कहकर उसके बाद इस साम-गानका वर्णन किया गया है। इससे यह प्रकट होता है कि परमात्मा- के साथ एकताकी प्राप्ति कर लेनेवाले महापुरुषके ये पावन उद्गार उसके विशुद्ध अन्तःकरणसे निकले हैं और उसकी अलौकिक महिमा सूचित करते हे । 'हावु' पद आश्चर्यबोधक अव्यय है। वह महापुरुष कहता है-बड़े आश्चर्यकी बात है ! ये सम्पूर्ण भोग वस्तुएँ, इनको भोगनेवाला जीवात्मा और इन दोनोंका संयोग करानेवाला परमेश्वर एक मैं ही हूँ। मै ही इस प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्में समस्त देवताओंसे पहले सबमें प्रधान होकर प्रकट होनेवाला ब्रह्मा हूँ, और परमानन्दरूप अमृतके केन्द्र परब्रह्म परमेश्वर भी मुझसे अभिन्न है, अतः वे भी मै ही हूँ । जो कोई मनुष्य किसी भी वस्तुके रूपमे मुझे किसीको प्रदान करता है, वह मानो मुझे देकर मेरी रक्षा करता है । अर्थात् योग्य पात्रमें भोग्य पदार्थोंका दान ही उनकी रक्षाका सर्वोत्तम उपाय है । इसके विपरीत जो अपने ही लिये अन्नरूप समस्त भोगोंका उपभोग करता है, उस खानेवालेको मैं अन्नरूप होकर निगल जाता हूँ। अर्थात् उसका विनाश हो जाता है-उसकी भोग-सामग्री टिकती नही। मैं समस्त ब्रह्माण्डका तिरस्कार करनेवाला हूँ। मेरी महिमाकी तुलनामें यह सब तुच्छ है । मेरे प्रकाशकी एक झलक भी सूर्यके समान है। अर्थात् जगत्मे जितने भी प्रकाशयुक्त पदार्थ हैं, वे सब मेरे ही तेज- उ० अ० ४६-
॥ भृगुवल्ली समाप्त ॥ ३ ॥
३६२ ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ के अंश हैं। जो कोई इस प्रकार परमात्माके तत्त्वको जानता है, वह भी इसी स्थितिको प्राप्त कर लेता है। उपर्युक्त कथन परमात्मामे एकीभावसे स्थित होकर परमात्माकी दृष्टिसे है, यह समझना चाहिये । ॥ दशम अनुवाक समाप्त ॥ १० ॥ ॥ भृगुवल्ली समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् । तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् । आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ शिक्षावल्लीके द्वादश अनुवाकमे दिया गया है।
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कल्याण वरुण और भृगु [जगत्कारण-मीमांसा]
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्वे ाश्व रोपनि दू शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ कठोपनिषद्के आरम्भमें दिया गया है। प्रथम अध्याय हरिः ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति- किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १ ॥ 'हरिः ओम्' इस प्रकार परमात्माके नामका उच्चारण करके उस परब्रह्म परमेश्वरका स्मरण करते हुए यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है- ब्रह्मवादिनः = ब्रह्मविषयक चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु, वदन्ति = आपसमें कहते हैं; ब्रह्मविदः = हे वेदज्ञ महर्षियो; कारणम् = इस जगत्का मुख्य कारण, ब्रह्म = ब्रह्म, किम् = कौन है; कुतः = ( हमलोग ) किससे; जाताः स्म = उत्पन्न हुए हैं; केन = किससे; जीवाम = जी रहे हैं; च = और, क्व = किसमें, सम्प्रतिष्ठाः = हमारी सम्यक् प्रकारसे स्थिति है, ( तथा ) केन अधिष्ठिताः = किसके अधीन रहकर, [ वयम् = हमलोग, ] सुखेतरेषु = सुख और दुःखोंमें, व्यवस्थाम् = निश्चित व्यवस्थाके अनुसार; वर्तामहे = वर्त रहे हैं ॥ १ ॥ व्याख्या-परब्रह्म परमात्माको जानने और प्राप्त करनेके लिये उनकी चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु पुरुष आपसमें कहने लगे-'हे वेदज्ञ महर्षिगण ! हमने वेदोंमें पढ़ा है कि इस समस्त जगत्के कारण ब्रह्म हैं; सो वे ब्रह्म कौन हैं ? हम सब लोग किससे उत्पन्न हुए हैं-हमारा मूल क्या है ? किसके प्रभावसे हम जी रहे हैं-हमारे जीवनका आधार कौन है ? और हमारी पूर्णतया स्थिति किसमें है ? अर्थात् हम उत्पन्न होनेसे पहले-भूतकालमें, उत्पन्न होनेके बाद-वर्तमानकालमें और इसके पश्चात्-प्रलयकालमें किसमें स्थित रहते हैं ? हमारा परम आश्रय कौन है ? तथा हमारा अधिष्ठाता-हमलोगोंकी व्यवस्था करनेवाला कौन है ? जिसकी रची हुई व्यवस्थाके अनुसार हमलोग सुख-दुःख दोनों भोग रहे हैं, वह इस सम्पूर्ण जगत्की सुव्यवस्था करनेवाला इसका संचालक स्वामी कौन है ?'* ॥ १ ॥ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या । संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥
- इस प्रकार परब्रह्म परमात्माकी खोज करना, उन्हें जानने और पानेके लिये उत्कट अभिलाषाके साथ उत्साहपूर्वक आपसमें विचार करना, परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंसे उनके विषयमें विनयभाव और श्रद्धापूर्वक पूछना, उनकी बतायी हुई बातोंको ध्यानपूर्वक सुनकर काममें लाना-इसीका नाम 'सत्सङ्ग' है। इस उपनिषद्के प्रथम मन्त्रमें सत्सङ्गका ही वर्णन है। इससे सत्सङ्गकी अनादिता और अलौकिक महत्ता सूचित होती है।
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
३६५ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
(क्या) कालः = काल, स्वभावः = स्वभाव, नियतिः = निश्चित फल देनेवाला कर्म, यदृच्छा = आकस्मिक घटना;
भूतानि = पाँचों महाभूत, (या) पुरुषः = जीवात्मा योनिः = कारण हैं, इति चिन्त्या = इसपर विचार करना
चाहिये; एषाम् = इन काल आदिका, संयोगः = समुदाय, तु = भी, न = इस जगत्का कारण नहीं हो सकता;
आत्मभावात् = क्योंकि वे चेतन आत्माके अधीन हैं (जड होनेके कारण स्वतन्त्र नहीं हैं), आत्मा = जीवात्मा, अपि =
भी; [न=इस जगत्का कारण नहीं हो सकता,] सुखदुःखहेतोः = (क्योंकि वह) सुख-दुःखोंके हेतुभूत प्रारब्धके;
अनीशः = अधीन है ॥ २ ॥
व्याख्या—वे कहने लगे कि वेद-शास्त्रोंमें अनेक कारणोंका वर्णन आता है। कहीं तो कालको कारण बताया है;
क्योंकि किसी-न-किसी समयपर ही वस्तुओंकी उत्पत्ति देखी जाती है, जगत्की रचना और प्रलय भी कालके ही अधीन सुने
जाते हैं। कहीं स्वभावको कारण बताया जाता है, क्योंकि बीजके अनुरूप ही वृक्षकी उत्पत्ति होती है—जिस वस्तुमें जो
स्वाभाविक शक्ति है, उसीसे उसका कार्य उत्पन्न होता देखा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि वस्तुगत शक्तिरूप जो
स्वभाव है, वह कारण है। कहीं कर्मको कारण बताया है, क्योंकि कर्मानुसार ही जीव भिन्न-भिन्न योनियोंमें भिन्न-भिन्न
स्वभाव आदिसे युक्त होकर उत्पन्न होते हैं। कहीं आकस्मिक घटनाको अर्थात् होनहार (भवितव्यता) को कारण बताया
है। कहीं पाँचों महाभूतोंको और कहीं जीवात्माको जगत्का कारण बताया गया है। अतः हमलोगोंको विचार करना चाहिये
कि वास्तवमें कारण कौन है। विचार करनेसे समझमें आता है कि कालसे लेकर पाँच महाभूतोंतक बताये हुए जड
पदार्थोंमेंसे कोई भी जगत्का कारण नहीं है। वे अलग-अलग तो क्या सब मिलकर भी जगत्के कारण नहीं हो सकते;
क्योंकि ये सब जड होनेके कारण चेतनके अधीन हैं। इनमें स्वतन्त्र कार्य करनेकी शक्ति नहीं है। जिन जड वस्तुओंके मेलसे
कोई नयी चीज उत्पन्न होती है, वह उनके संचालक चेतन आत्माके ही अधीन और उसीके भोगार्थ होती है। इनके सिवा,
पुरुष अर्थात् जीवात्मा भी जगत्का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह सुख-दुःखके हेतुभूत प्रारब्धके अधीन है, वह भी
स्वतन्त्ररूपसे कुछ नहीं कर सकता। अतः कारण तत्त्व कुछ और ही है ॥ २ ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार विचार करके उन्होंने क्या निर्णय किया-इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।
यः कारणानि निखिलाने तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३ ॥
ते = उन्होंने, ध्यानयोगानुगताः = ध्यानयोगमें स्थित होकर स्वगुणैः = अपने गुणोंसे; निगूढाम् = ढकी हुई,
देवात्मशक्तिम् अपश्यन् = (उन) परमात्मदेवकी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिका साक्षात्कार किया, यः = जो (परमात्मदेव);
एकः = अकेला ही, तानि = उन, कालात्मयुक्तानि = कालसे लेकर आत्मातक (पहले बताये हुए), निखिलानि =
सम्पूर्ण, कारणानि अधितिष्ठति = कारणोंपर शासन करता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—इस प्रकार आपसमें विचार करनेपर जब युक्तियोंद्वारा और अनुमानसे वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच
सके, तब वे सब ध्यानयोगमें स्थित हो गये अर्थात् अपने मन और इन्द्रियोंको बाहरके विषयोंसे हटाकर परब्रह्मको
जाननेके लिये उन्हींका चिन्तन करनेमें तत्पर हो गये। ध्यान करते-करते उन्हें परमात्माकी महिमाका अनुभव हुआ।
उन्होंने उन परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी स्वरूपभूत अचिन्त्य दिव्य शक्तिका साक्षात्कार किया, जो अपने ही गुणोंसे—
सत्त्व, रज, तमसे ढकी है, अर्थात् जो देखनेमें त्रिगुणमयी प्रतीत होती है, परंतु वास्तवमें तीनों गुणोंसे परे है। तब वे इस
निर्णयपर पहुँचे कि कालसे लेकर आत्मातक जितने कारण पहले बताये गये हैं, उन समस्त कारणोंके जो अधिष्ठाता—स्वामी
हैं, अर्थात् वे सब जिनकी आज्ञा और प्रेरणा पाकर, जिनकी उस शक्तिके किसी एक अंशको लेकर अपने-अपने कार्योंके करनेमें
समर्थ होते हैं, वे एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ही इस जगत्के वास्तविक कारण हैं; दूसरा कोई नहीं है ॥ ३ ॥
तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥
तम् = उस, एकनेमिम् = एक नेमिवाले, त्रिवृतम् = तीन घेरोवाले, षोडशान्तम् = सोलह सिरोंवाले, शतार्धारम् =
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३६५ पचास अरोंवाले; विंशतिप्रत्यराभिः = बीस सहायक अरोंसे, (तथा) षड्भिः अष्टकैः = छः अष्टकोंसे, [ युक्तम् = युक्त ;] विश्वरूपैकपाशम् = अनेक रूपोंवाले एक ही पाशसे युक्त; त्रिमार्गभेदम् = मार्गके तीन भेदोंवाले, (तथा) द्विनिमित्तैक- मोहम् = दो निमित्त और मोहरूपी एक नाभिवाले (चक्रको), [ अपश्यन् = उन्होंने देखा ] ॥ ४ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें विश्वका चक्रके रूपमें वर्णन किया गया है। भाव यह है कि परम देव परमेश्वरकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिका दर्शन करनेवाले वे ऋषिलोग कहते हैं—हमने एक ऐसे चक्रको देखा है, जिसमें एक नेमि है । नेमि उस गोल घेरेको कहते हैं, जो चक्रके अरों और नाभि आदि सब अवयवोंको वेष्टित किये रहती है तथा यथास्थान बनाये रखती है । यहाँ अव्याकृत प्रकृतिको ही 'नेमि' कहा गया है; क्योंकि वही इस व्यक्त जगत्का मूल अथवा आधार है । जिस प्रकार चक्केकी रक्षाके लिये उस नेमिके ऊपर लोहेका घेरा (हाल) चढा रहता है, उसी प्रकार इस संसार-चक्रकी अव्याकृत प्रकृतिरूप नेमिके ऊपर सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही तीन घेरे हैं। यह पहले ही कह आये हैं कि भगवान्की वह अचिन्त्यशक्ति तीन गुणोंसे ढकी है। जिस प्रकार चक्केकी नेमि अलग-अलग सिरोंके जोड़से बनती है, उसी प्रकार इस संसाररूप चक्रकी प्रकृतिरूप नेमिके मन, बुद्धि और अहङ्कार तथा आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये आठ सूक्ष्म तत्त्व और इनके ही आठ स्थूल रूप—इस प्रकार सोलह सिरे हैं। जिस प्रकार चक्रमें अरे लगे रहते हैं, जो एक ओरसे नेमिके टुकड़ोंमें जुड़े रहते हैं और दूसरी ओरसे चक्केकी नाभिमें जुड़े होते हैं, उसी प्रकार इस संसार-चक्रमें अन्तःकरणकी वृत्तियोंके पचास भेद तो पचास अरोंकी जगह हैं और पाँच महाभूतोंके कार्य— दस इन्द्रियाँ, पाँच विषय और पाँच प्राण—ये बीस सहायक अरोंकी जगह हैं। इस चक्रमें आठ-आठ चीजों* के छ. समूह अङ्गरूपमें विद्यमान हैं। इन्हींको छः अष्टकोंके नामसे कहा गया है। जीवोंको इस चक्रमें बाँधकर रखनेवाली अनेक रूपोंमें प्रकट आसक्तिरूप एक फाँसी है । देवयान, पितृयान और इसी लोकमें एक योनिसे दूसरी योनिमें जानेका मार्ग— इस प्रकार ये तीन मार्ग हैं। पुण्यकर्म और पापकर्म—ये दो इस जीवको इस चक्रके साथ-साथ घुमानेमें निमित्त हैं और जिसमें अरे टँगे रहते हैं, उस नाभिके स्थानमें अज्ञान है। जिस प्रकार नाभि ही चक्केका केन्द्र है, उसी प्रकार अज्ञान इस जगत्का केन्द्र है ॥ ४ ॥ पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्रां पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् । पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥ पञ्चस्रोतोऽम्बुम् = पाँच स्रोतोंसे आनेवाले विषयरूप जलसे युक्त; पञ्चयोन्युग्रवक्राम् = पाँच स्थानोंसे उत्पन्न होकर भयानक और टेढी-मेढी चालसे चलनेवाली; पञ्चप्राणोर्मिम् = पाँच प्राणरूप तरङ्गोंवाली, पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् = पाँच प्रकारके. ज्ञानके आदि कारण मन ही है मूल जिसका, पञ्चावर्ताम् = पाँच भँवरोंवाली, पञ्चदुःखौघवेगाम् = पाँच दुःख रूप प्रवाहके वेगसे युक्त, पञ्चपर्वाम् = पाँच पर्वोंवाली, (और) पञ्चाशद्भेदां = पचास भेदोंवाली (नदीको), अधीमः = हमलोग जानते हैं ॥ ५ ॥
- यहाँ 'अष्टक' शब्दसे क्या अभिप्राय है, ठीक-ठीक पता नहीं चलता । चक्रोंमें भी 'अष्टक' नामका कोई अङ्ग होता है या नहीं, और यदि होना है तो उसका क्या स्वरूप होता है तथा उसे अष्टक क्यों कहते हैं—इसका भी कोई पता नहीं चलता । शाङ्करभाष्यमें भी 'अष्टक' किसे कहते हैं—यह खोलकर नहीं बताया गया । इसीलिये 'षडष्टकम्' पदकी व्याख्या नहीं की जा सकी । शाङ्करभाष्यके अनुसार छ अष्टक इस प्रकार हैं— ( १ ) गीता ( ७ । ४ ) में उल्लिखित आठ प्रकारकी प्रकृति अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार, ( २ ) शरीरगत आठ धातुएँ अर्थात् त्वचा, चमड़ी, मांस, रक्त, मेद, हड्डी, मज्जा और वीर्य, ( ३ ) अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व—ये आठ प्रकारके ऐश्वर्य, ( ४ ) धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य ( राग ) और अनैश्वर्य—ये आठ भाव, ( ५ ) ब्रह्मा, प्रजापति, देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर और पिशाच—ये आठ प्रकारकी देवयोनियाँ, और ( ६ ) समस्त प्राणियोंके प्रति दया, क्षमा, अनसूया ( निन्दा न करना ), शौच ( बाहर-भीतरकी पवित्रता ), अनायास, मङ्गल, अकृपणता ( उदारता ) और अस्पृहा—ये आत्माके आठ गुण ।
३६६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—इस मन्त्रमें संसारका नदीके रूपमें वर्णन किया गया है। वे ब्रह्मज्ञ ऋषि कहते हैं—हम एक ऐसी नदीको देख रहे हैं, जिसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही पाँच स्रोत हैं। संसारका ज्ञान हमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा ही होता है, इन्हींमेंसे होकर संसारका प्रवाह बहता है। इसीलिये इन्द्रियोंको यहाँ स्रोत कहा गया है। ये इन्द्रियाँ पञ्च सूक्ष्मभूतों (तन्मात्रों) से उत्पन्न हुई हैं, इसीलिये इस नदीके पाँच उद्गमस्थान माने गये हैं। इस नदीका प्रवाह बड़ा ही भयंकर है। इसमें गिर जानेसे बार-बार जन्म-मृत्युका क्लेश उठाना पड़ता है। संसारकी चाल बड़ी टेढ़ी है, कपटसे भरी है। इसमेंसे निकलना कठिन है। इसीलिये इस संसाररूप नदीको वक्र कहा गया है। जगत्के जीवोंमें जो कुछ भी चेष्टा--हलचल होती है, वह प्राणोंके द्वारा ही होती है। इसीलिये प्राणोंको इस भव-सरिताकी तरङ्गमाला कहा गया है। नदीमे हलचल तरङ्गोंसे ही होती है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा होनेवाले चाक्षुष आदि पाँच प्रकारके ज्ञानोंका आदि कारण मन है, जितने भी ज्ञान हैं, सब मनकी ही तो वृत्तियाँ हैं। मन न हो तो इन्द्रियोंके सचेष्ट रहनेपर भी किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होता। यह मन ही संसाररूप नदीका मूल है। मनसे ही संसारकी सृष्टि होती है। सारा जगत् मनकी ही कल्पना है। मनके अमन हो जानेपर— नाश हो जानेपर जगत्का अस्तित्व ही नहीं रहता। जबतक मन है; तभीतक संसार है। इन्द्रियोंके शब्द-स्पर्श आदि पाँच विषय ही इस संसाररूप नदीमे आवर्त अर्थात् भँवर हैं। इन्हींमें फँसकर जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ जाता है। गर्भका दुःख, जन्मका दुःख, बुढ़ापेका दुःख, रोगका दुःख और मृत्युका दुःख—ये पाँच प्रकारके दुःख ही इस नदीके प्रवाहमें वेगरूप हैं। इन्हींके थपेड़ोंसे जीव व्याकुल रहता है और इस योनिसे उस योनिमें भटकता रहता है। अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहङ्कार), राग (प्रियबुद्धि), द्वेष (अप्रियबुद्धि) और अभिनिवेश (मृत्युभय)—ये पञ्चविध क्लेश ही इस संसाररूप नदीके पाँच पर्व अर्थात् विभाग हैं। इन्हीं पाँच विभागोंमें यह जगत् बँटा हुआ है। इन पाँचोंका समुदाय ही संसारका स्वरूप है और अन्तःकरणकी पचास वृत्तियाँ ही इस नदीके पचास भेद अर्थात् भिन्न-भिन्न रूप हैं। अन्तः- करणकी वृत्तियोंको लेकर ही संसारमें भेदकी प्रतीति होती है॥ ५॥ सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे। पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६ ॥ अस्मिन्= इस; सर्वाजीवे= सबके जीविकारूप; सर्वसंस्थे=सबके आश्रयभूत; बृहन्ते=विस्तृत; ब्रह्मचक्रे=ब्रह्मचक्रमें; हंसः=जीवात्मा, भ्राम्यते=घुमाया जाता है; [ सः=वह; ] आत्मानम्=अपने आपको, च=और; प्रेरितारम्=सबके प्रेरक परमात्माको; पृथक्=अलग-अलग; मत्वा=जानकर, ततः=उसके बाद; तेन=उस परमात्मासे; जुष्टः=स्वीकृत होकर; अमृतत्वम्=अमृतभावको, एति=प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या—जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, जो सबके जीवननिर्वाहका हेतु है और जो समस्त प्राणियोंका आश्रय है, ऐसे इस जगद्रूप ब्रह्मचक्रमें अर्थात् परब्रह्म परमात्माद्वारा संचालित तथा परमात्माके ही विराट् शरीररूप संसारचक्रमें यह जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उन परमात्माद्वारा घुमाया जाता है। जबतक यह इसके सञ्चालकको जानकर उनका कृपापात्र नहीं बन जाता, अपनेको उनका प्रिय नहीं बना लेता, तबतक इसका इस चक्रसे छुटकारा नहीं हो सकता । जब यह अपनेको और सबके प्रेरक परमात्माको भलीभाँति पृथक्-पृथक् समझ लेता है कि उन्हींके घुमानेसे मैं इस संसार-चक्रमें घूम रहा हूँ और उन्हींकी कृपासे छूट सकता हूँ, तब वह उन परमेश्वरका प्रिय बनकर उनके द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है (कठ० २। २३; मुण्डक० ३।२।३)। और फिर तो वह अमृतभावको प्राप्त हो जाता है, जन्म-मरणरूप संसार-चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। परम शान्ति एव सनातन दिव्य परमधामको प्राप्त हो जाता है (गीता १८। ६१-६२)॥ ६॥ उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च। अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः॥७॥ एतत्= यह; उद्गीतम्=वेदवर्णित, परमम् ब्रह्म=परब्रह्म; तु=ही, सुप्रतिष्ठा=सर्वश्रेष्ठ आश्रय, च=और; अक्षरम्=अविनाशी है; तस्मिन्=उसमें; त्रयम्=तीनों लोक स्थित हैं; ब्रह्मविदः=वेदके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुष; अत्र=यहाँ (हृदयमें); अन्तरम्=अन्तर्यामीरूपसे स्थित उस ब्रह्मको; विदित्वा=जानकर; तत्पराः=उसीके परायण हो; ब्रह्मणि=उस परब्रह्ममें; लीनाः=लीन होकर; योनिमुक्ताः=सदाके लिये जन्म-मृत्युसे मुक्त हो गये॥ ७॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३६७ व्याख्या—जिनकी महिमाका वेदोंमें गान किया गया है, जो परब्रह्म परमात्मा सबके सर्वोत्तम आश्रय हैं, उन्हींमें तीनो लोकोंका समुदायरूप समस्त विश्व स्थित है। वे ही ऊपर बताये हुए सबके प्रेरक, कभी नाश न होनेवाले परम अक्षर, परम देव हैं। जिन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्माकी दिव्यशक्तिका दर्शन किया था, वे वेदके रहस्यको समझनेवाले ऋषिलोग उन सबके प्रेरक परमात्माको यहाँ—अपने हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान समझकर, उन्हींकेपरायण होकर अर्थात् सर्वतोभावसे उनकी शरणमे जाकर, उन्हींमें लीन हो गये और सदाके लिये जन्म मरणरूप योनिसे मुक्त हो गये। उनके मार्ग- का अनुसरण करके हम सब लोग भी उन्हींकी भाँति जन्म मरणसे छूटकर परमात्मामे लीन हो सकते है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—अब उन परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके उन्हें जाननेका फल बताया जाता है— संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः । अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावाज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ८॥ क्षरम् = विनाशशील जडवर्ग; च=एव; अक्षरम्=अविनाशी जीवात्मा; संयुक्तम्=(इन दोनोके) सयुक्त रूप; व्यक्ताव्यक्तम्=व्यक्त और अव्यक्तरूप; एतत् विश्वम्=इस विश्वका; ईशः=परमेश्वर ही; भरते=धारण और पोषण करता है; च=तथा; आत्मा=जीवात्मा; [भोक्तृभावात्=इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण; अनीशः=प्रकृतिके अधीन हो; बध्यते=इसमे बँध जाता है; (और) देवम्=उस परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशैः=सब प्रकारके बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ व्याख्या—विनाशशील जडवर्ग, जिसे भगवान्की अपरा प्रकृति तथा क्षर-तत्त्व कहा गया है और भगवान्की परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो अक्षरतत्त्वके नामसे पुकारा जाता है—इन दोनोंके सयोगसे बने हुए, प्रकट और अप्रकट रूपमें स्थित इस समस्त जगत्का वे परमपुरुष पुरुषोत्तम ही धारण-पोषण करते हैं, जो सबके स्वामी, सबके प्रेरक तथा सबका यथायोग्य सञ्चालन और नियमन करनेवाले परमेश्वर हीं। जीवात्मा इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण प्रकृतिके अधीन हो इसके मोहजालमे फँसा रहता है, उन परमदेव परमात्माकी ओर दृष्टिपात नहीं करता। जब कभी यह उन सर्व- सुहृद् परमात्माकी अहैतुकी दयासे महापुरुषोंका सग पाकर उनको जाननेका अभिलाषी होकर पूर्ण चेष्टा करता है, तब उन परमदेव परमेश्वरको जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—पुन जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति—इन तीनोके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन करके, इस तत्त्वको जानकर उपासना करनेका फल दो मन्त्रोंद्वारा बताया जाता है— ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ॥ ९ ॥ ज्ञाज्ञौ=सर्वज्ञ और अज्ञानी; ईशनीशौ=सर्वसमर्थ और असमर्थ; द्वौ=ये दो; अजौ=अजन्मा आत्मा हैं; (तथा) भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता=भोगनेवाले जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग्य सामग्रीसे युक्त; हि=तथा; अजा=अनादि प्रकृति; एका=एक तीसरी शक्ति है, (इन तीनोंमें जो ईश्वग्तत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है;) हि=क्योंकि, आत्मा=वह परमात्मा; अनन्तः=अनन्त; विश्वरूपः=सम्पूर्ण रूपोंवाला; च=और; अकर्ता=कर्तापनके अभिमानसे रहित है; यदा=जब; (मनुष्य इस प्रकार) एतत् त्रयम्= ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनोंको; ब्रह्मम्=ब्रह्मरूपमे; विन्दते= प्राप्त कर लेता है (तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है) ॥ ९॥ व्याख्या—ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, जीव अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है; ये दोनों ही अजन्मा हैं। इनके सिवा एक तीसरी शक्ति भी अजन्मा है, जिसे प्रकृति कहते ह, यह भोक्ता जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग-सामग्री प्रस्तुत करती है। यद्यपि ये तीनों ही अजन्मा हैं—अनादि है, फिर भी ईश्वर शेष दो तत्त्वोसे विलक्षण हैं; क्योकि वे परमात्मा हैं, अनन्त हैं। सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप—विराट् शरीर है। वे सब कुछ करते हुए—सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति, पालन और सहार करते हुए भी वास्तवमे कुछ नहीं करते; क्योंकि वे कर्त्तापनके अभिमानसे रहित हैं। मनुष्य जब इस प्रकार इन तीनोंकी विलक्षणता और