कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 379, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 379
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५३ इच्छा कर। अर्थात् तपस्या करते हुए मेरे उपदेशपर पुनः विचार कर। यह तपरूप साधन ही ब्रह्म है। ब्रह्मको जानने- का इससे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नही है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहकर पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमे कही गयी है। ॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम अनुवाक विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । विज्ञानेन जातानि जीवन्ति । विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । विज्ञानम् = विज्ञान; ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार, व्यजानात् = जाना; हि = क्योकि, खलु = सचमुच; विज्ञानात् = विज्ञानसे, एव = ही, इमानि = ये समस्त, भूतानि = प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, विज्ञानेन = विज्ञानसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, (और) प्रयन्ति = अन्तमें यहाँसे प्रयाण करते हुए, विज्ञानम् अभिसंविशन्ति = विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं, इति = इस प्रकार; तत् = ब्रह्मको, विज्ञाय = जानकर, पुनः एव = (वह) पुनः उसी प्रकार; पितरम् = अपने पिता; वरुणम् उपससार = वरुणके पास गया, (और अपनी बातका उत्तर न मिलनेपर बोला-) भगवः = भगवन् !, (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति = इस प्रकार कहनेपर, ह तम् उवाच = सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिणे उससे कहा, ब्रह्म = ब्रह्मको, तपसा = (तू) तपके द्वारा; विजिज्ञासस्व = तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर, तपः = तप ही, ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर; सः = उसने, तपः अतप्यत = पुनः तप किया; सः = उसने; तपः तप्त्वा = तप करके- व्याख्या-इस बार उन्होंने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि यह विज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है; क्योंकि उन्होंने सोचा-पिताजीने जो ब्रह्मके लक्षण बताये थे, वे सब-के-सब पूर्णतया इसमें पाये जाते हैं। ये समस्त प्राणी जीवात्मासे ही उत्पन्न होते हैं, सजीव चेतन प्राणियोंसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। उत्पन्न होकर इस विज्ञान- स्वरूप जीवात्मासे ही जीते हैं, यदि जीवात्मा न रहे तो ये मन, इन्द्रियाँ, प्राण आदि कोई भी नहीं रह सकते और कोई भी अपना-अपना काम नहीं कर सकते। तथा मरनेके बाद ये मन आदि सब जीवात्मामें ही प्रविष्ट हो जाते हैं-जीवके निकल जानेपर मृत शरीरमें ये सब देखनेमें नहीं आते। अतः विज्ञानस्वरूप जीवात्मा ही ब्रह्म है। यह निश्चय करके वे पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चित अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पिताजीने कोई उत्तर नही दिया। पिताने सोचा-'इस बार यह बहुत कुछ ब्रह्मके निकट आ गया है, इसका विचार स्थूल और सूक्ष्म-दोनों प्रकारके जडतत्त्वोंसे ऊपर उठकर चेतन जीवात्मातक तो पहुँच गया है। परंतु ब्रह्मका स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है, वे तो नित्य आनन्दस्वरूप एक अद्वितीय परमात्मा हैं; इसे अभी और तपस्या करनेकी आवश्यकता है, अतः उत्तर न देना ही ठीक है।' इस प्रकार बार-बार पिताजीसे कोई उत्तर न मिलनेपर भी भृगु हतोत्साह या निराश नहीं हुए। उन्होंने पहलेकी भाँति पुनः पिताजीसे वही प्रार्थना की- 'भगवन् ! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका रहस्य बतलाइये।' तब वरुणने पुनः वही उत्तर दिया-'तू तपके द्वारा ही ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्यापूर्वक उसका पूर्व- कथनानुसार विचार कर। तप ही ब्रह्म है।' इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह आगे बताया गया है। ॥ अनुवाक ॥ ५ ॥ उ० सं० ४५-