भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 832 में से

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पृष्ठ 380

३५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * षष्ठ अनुवाक आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । स य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या । आनन्दः = आनन्द ही; ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार; व्यजानात् = निश्चयपूर्वक जाना; हि = क्योंकि; खलु = सचमुच; आनन्दात् = आनन्दसे, एव = ही, इमानि = ये समस्त; भूतानि = प्राणी; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं; जातानि = उत्पन्न होकर, आनन्देन = आनन्दसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, (तथा) प्रयन्ति = इस लोकसे प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) आनन्दम् अभिसंविशन्ति = आनन्दमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति = इस प्रकार (जाननेपर उसे परब्रह्मका पूरा ज्ञान हो गया), सा = वह; एषा = यह, भार्गवी = भृगुकी जानी हुई; वारुणी = और वरुणद्वारा उपदेश की हुई; विद्या = विद्या. परमे व्योमन् = विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें, प्रतिष्ठिता = प्रतिष्ठित है अर्थात् पूर्णतः स्थित है; यः = जो कोई (दूसरा साधक) भी, एवम् = इस प्रकार (आनन्दस्वरूप ब्रह्मको), वेद = जानता है, सः = वह; (उस विशुद्ध आकाशस्वरूप परमानन्दमे) प्रतितिष्ठति = स्थित हो जाता है, (इतना ही नहीं, इस लोकमें लोगोंके देखनेमें भी वह) अन्नवान् = बहुत अन्नवाला, अन्नादः = और अन्नको भलीभाँति पचानेकी शक्तिवाला; भवति = हो जाता है, (तथा) प्रजया = सन्तानसे; पशुभिः = पशुओंसे, (तथा) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर, महान् = महान्; भवति = हो जाता है, कीर्त्या [अपि] = उत्तम कीर्तिके द्वारा भी, महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या-इस बार भृगुने पिताके उपदेशपर गहरा विचार करके यह निश्चय किया कि आनन्द ही ब्रह्म है। ये आनन्दमय परमात्मा ही अन्नमय आदि सबके अन्तरात्मा हैं। वे सब भी इन्हींके स्थूल रूप हैं। इसी कारण उनमें ब्रह्मबुद्धि होती है और ब्रह्मके आंशिक लक्षण पाये जाते हैं। परतु सर्वोत्तमे ब्रह्मके लक्षण आनन्दमें ही घटते हैं, क्योंकि ये समस्त प्राणी उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मासे ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न होते हैं- इन सबके आदि कारण तो वे ही हैं। तथा इन आनन्दमयके आनन्दका लेश पाकर ही ये सब प्राणी जी रहे हैं-कोई भी दुःखके साथ जीवित रहना नहीं चाहता। इतना ही नहीं, उन आनन्दमय सर्वान्तर्यामी परमात्माकी अचिन्त्यशक्तिकी प्रेरणासे ही इस जगत्के समस्त प्राणियोंकी सारी चेष्टाएँ हो रही हैं। उनके शासनमें रहनेवाले सूर्य आदि यदि अपना-अपना काम न करें तो एक क्षण भी कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता। सबके जीवनाधार सचमुच वे आनन्दस्वरूप परमात्मा ही हैं। तथा प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंसे भरा हुआ यह ब्रह्माण्ड उन्हींमें प्रविष्ट होता है-उन्हींमें विलीन होता है; वे ही सबके सब प्रकारसे सदा-सर्वदा आधार हैं। इस प्रकार अनुभव होते ही भृगुको परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान हो गया। फिर उन्हें किसी प्रकारकी जिज्ञासा नहीं रही। श्रुति स्वय उस विद्याकी महिमा बतलानेके लिये कहती है-वही यह वरुणद्वारा बतायी हुई और भृगुको प्राप्त हुई ब्रह्मविद्या (ब्रह्मका रहस्य बतानेवाली विद्या) है। यह विद्या विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें स्थित है। वे ही इस विद्याके भी आधार हैं। जो कोई मनुष्य भृगुकी भाँति तपस्यापूर्वक इसपर विचार करके परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह भी उन विशुद्ध परमानन्दस्वरूप परमात्मामे स्थित हो जाता है। इस प्रकार इस विद्याका वास्तविक फल बताकर मनुष्योंको उस साधनकी ओर लगानेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे अन्न, प्राण आदि समस्त तत्त्वोंके रहस्य विज्ञानपूर्वक ब्रह्मको जाननेवाले ज्ञानीके शरीर और अन्तःकरणमें जो स्वाभाविक विलक्षण शक्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, उनको भी श्रुति बतलाती है। वह अन्नवान् अर्थात् नाना प्रकारके जीवनयात्रोपयोगी भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है और उन सबको सेवन करनेकी सामर्थ्य भी उसमें आ जाती है। अर्थात् उसके मन, इन्द्रियों और शरीर सर्वथा निर्विकार और नीरोग हो जाते हैं। इतना ही नहीं, वह सन्तानसे, पशुओंसे, ब्रह्मतेजसे और बड़ी भारी कीर्तिसे समृद्ध होकर जगत्में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है। ॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥