कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ तैत्तिरीयोपनिषद् ॐ ३५५ सप्तम अनुवाक सम्बन्ध—छठे अनुवाकमें ब्रह्मज्ञानीके अन्न और प्रजा आदिसे सम्पन्न होनेकी बात कही गयी, उसपर यह जिज्ञासा होती है कि ये सब सिद्धियाँ भी क्या ब्रह्माक्षात्कार होनेपर ही मिलती हैं, या इन्हें प्राप्त करनेका दूसरा उपाय भी है। इसपर उन सबकी प्राप्तिके दूसरे उपाय भी बताये जाते हैं— अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या । अन्नम् न निन्द्यात् = अन्नकी निन्दा न करे; तत् = वह; व्रतम् = व्रत है. प्राण.= प्राण, वै = ही; अन्नम् = अन्न है; (और) शरीरम् = शरीर; (उस प्राणरूप अन्नसे जीनेके कारण) अन्नादम् = अन्नका भोक्ता है; शरीरम् = शरीर; प्राणे = प्राणके आधारपर, प्रतिष्ठितम् = स्थित हो रहा है; (और) शरीरे = शरीरके आधारपर; प्राण.= प्राण. प्रतिष्ठितः = स्थित हो-रहे हैं; तत् = इस तरह, एतत् = यह, अन्ने = अन्नमें ही, अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = स्थित हो रहा है, यः = जो मनुष्य; अन्ने = अन्नमें ही; अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित हो रहा है; एतत् = इस रहस्यको, वेद = जानता है; सः = वह; प्रतितिष्ठति = उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है; (अतः) अन्नवान् = अन्नवाला, (और) अन्नादः = अन्नको खानेवाला, भवति = हो जाता है, प्रजया = प्रजासे, पशुभि.= पशुओंसे, ब्रह्मवर्चसेन = (और) ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर महान् = महान्; भवति = बन जाता है; (तथा) कीर्त्या = कीर्तिसे (सम्पन्न होकर भी); महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या—इस अनुवाकमें अन्नका महत्त्व बतलाकर उसे जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अन्नादिसे सम्पन्न होना चाहे, उसे सबसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये कि 'मैं कभी अन्नकी निन्दा नहीं करूँगा।' यह एक साधारण नियम है कि जिस किसी वस्तुको मनुष्य पाना चाहता है, उसके प्रति उसकी महत्त्वबुद्धि होनी चाहिये, तभी वह उसके लिये प्रयत्न करेगा। जिसकी चित्तमें हेयबुद्धि है, वह उसकी ओर आँख उठाकर देखेगा भी नहीं। अन्नकी निन्दा न करनेका व्रत लेकर अन्नके इस महत्त्वको समझना चाहिये कि अन्न ही प्राण है, और प्राण ही अन्न है, क्योंकि अन्नसे ही प्राणोंमें बल आता है और प्राणशक्तिसे ही अन्नमय शरीरमें जीवनी-शक्ति आती है। यहाँ प्राणको अन्न इसलिये भी कहा है कि यही शरीरमें अन्नके रसको सर्वत्र फैलाता है। शरीर प्राणके ही आधार टिका हुआ है, इसीलिये वह प्राणरूप अन्नका भोक्ता है। शरीर प्राणमें स्थित है अर्थात् शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन है और प्राण शरीरमें स्थित है—प्राणोंका आधार शरीर है, यह बात प्रत्यक्ष है ही। इस प्रकार यह अन्नमय शरीर भी अन्न है। यह अनुभवसिद्ध विषय है कि प्राणोंको आहार न मिलनेपर वे शरीरकी धातुओंको ही सोख लेते हैं। और शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन होनेसे प्राण भी अन्न ही हैं। अतः शरीर और प्राणका अन्योन्याश्रय सम्बन्ध होनेसे यह कहा गया है कि अन्नमे ही अन्न स्थित हो रहा है। यही इसका तत्त्व है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है, वही शरीर और प्राण—इन दोनोंका ठीक ठीक उपयोग कर सकता है। इसीलिये यह कहा गया है कि वह शरीर और प्राणके विज्ञानमें पारङ्गत हो जाता है। और इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह सब प्रकारकी भोगसामग्रीसे युक्त और उसे उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। और इसीलिये वह सन्तानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे भी सम्पन्न होकर महान् बन जाता है। उसकी कीर्ति, उसका यश जगत्में फैल जाता है और उसके द्वारा भी वह जगत्में महान् हो जाता है। ॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥ 🙞···🙜 अष्टम अनुवाक अन्नं न परिचक्षीत । तद्व्रतम् । आपो वा अन्नम् । ज्योतिरन्नादम् । अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम् ।