कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 382, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या । अन्नम् न परिचक्षीत = अन्नकी अवहेलना न करे; तत् = वह; व्रतम् = एक व्रत है, आपः = जल; वै = ही; अन्नम् = अन्न है, ( और ) ज्योतिः = तेज, अन्नादम् = ( रसस्वरूप ) अन्नका भोक्ता है; अप्सु = जलमें; ज्योतिः = तेज; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, ज्योतिषि = तेजमें, आपः = जल, प्रतिष्ठिताः = प्रतिष्ठित है, तत् = वही; एतत् = यह; अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, यः = जो मनुष्य, ( इस प्रकार ) अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है; एतत् = इस रहस्यको, वेद = भलीभाँति समझता है, सः = वह, ( अन्तमे ) प्रतितिष्ठति = ( उस रहस्यमे ) परिनिष्ठित हो जाता है, ( तथा ) अन्नवान् = अन्नवाला, ( और ) अन्नादः = अन्नको खानेवाला; भवति = हो जाता है; प्रजया = ( वह ) संतानसे; पशुभिः = पशुओंसे, ( और ) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे, महान् = महान्; भवति = बन जाता है, ( तथा ) कीर्त्या = कीर्तिसे ( समृद्ध होकर भी ); महान् = महान्, [ भवति = हो जाता है । ] व्याख्या - इस अनुवाकमें जल और ज्योति दोनोंको अन्नरूप बताकर उन्हें जाननेका फल बतलाया है । भाव यह है कि जिस मनुष्यकी अन्नादिसे सम्पन्न होनेकी इच्छा हो, उसे यह नियम ले लेना चाहिये कि 'मैं कभी अन्नकी अवहेलना नहीं करूँगा अर्थात् अन्नका उल्लङ्घन, दुरुपयोग और परित्याग नहीं करूँगा एव उसे जूठा नहीं छोड़ें गा ।' यह साधारण नियम है कि जो जिस वस्तुका अनादर करता है, उसके प्रति उपेक्षाबुद्धि रखता है, वह वस्तु उसका कभी वरण नहीं करती । किसी भी वस्तुको प्राप्त करनेके लिये उसके प्रति आदरबुद्धि रखना परमावश्यक है । जिसकी जिसमें आदरबुद्धि नहीं है, वह उसे पानेकी इच्छा अथवा चेष्टा क्यों करेगा । इस प्रकार अन्नकी अवहेलना न करनेका व्रत लेकर फिर अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि जल ही अन्न है; क्योंकि सब प्रकारके अन्न अर्थात् खाद्य वस्तुएँ जलसे ही उत्पन्न होती हैं। और ज्योति अर्थात् तेज ही इस जलरूप अन्नको भक्षण करनेवाला है । जिस प्रकार अग्नि एवं सूर्यरश्मियाँ आदि बाहरके जलका शोषण करती हैं, उसी प्रकार शरीरमें रहनेवाली जठराग्नि शरीरमें जानेवाले जलीय तत्त्वोंका शोषण करती है । जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है। यद्यपि जल स्वभावतः ठंडा है, अतएव उसमें उष्ण ज्योति कैसे स्थित है- यह बात समझमें नहीं आती, तथापि शास्त्रोंमें यह माना गया है कि समुद्रमे वडवानल रहता है तथा आजकलके वैज्ञानिक भी जलमेंसे बिजली-तत्त्वको निकालते हैं। इससे यह बात सिद्ध होती है कि जलमें तेज स्थित है । इसी प्रकार तेजमें जल स्थित है, यह तो प्रत्यक्ष देखनेमें आता ही है, क्योंकि सूर्यकी प्रखर किरणोंमें स्थित जल ही हमलोगोंके सामने वृष्टिके रूपमें प्रत्यक्ष होता है । इस प्रकार ये जल और तेज अन्योन्याश्रित होनेके कारण समस्त अन्नरूप खाद्य पदार्थोंके कारण हैं, अतः ये ही उनके रूपमें परिणत होते हैं, इसलिये दोनों अन्न ही हैं। इस प्रकार अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस तत्त्वको समझ लेता है, वह इन दोनोंके विज्ञानमें प्रतिष्ठित अर्थात् सिद्ध हो जाता है, क्योंकि वही इन दोनोंका ठीक उपयोग कर सकता है । और इसीके फलस्वरूप वह अन्नसे अर्थात् सब प्रकारकी भोग-सामग्रीसे सम्पन्न और उन सबको यथायोग्य उपभोगमें लानेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है। और इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो महान् हो जाता है। इतना ही नहीं, इस समृद्धिके कारण उसका यश सर्वत्र फैल जाता है, वह बड़ा भारी यशस्वी हो जाता है । और उस यशके कारण भी वह महान् हो जाता है । ॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥ नवम अनुवाक अन्नं बहु कुर्वीत । तद् व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या ।