कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५७
-अन्नम् = अन्नको; बहु कुर्वीत = बढ़ाये; तत् = वह; व्रतम् = एक व्रत है; पृथिवी = पृथ्वी; वै = ही; अन्नम् = अन्न है; आकाशः = आकाश; अन्नादः = पृथ्वीरूप अन्नका आधार होनेसे (मानो) अन्नाद है; पृथिव्याम् = पृथ्वीमें, आकाशः = आकाश; प्रतिष्ठितः = प्रतिष्ठित है; आकाशे = आकाशमे, पृथिवी = पृथ्वी; प्रतिष्ठिता = प्रतिष्ठित है; तत् = वही; एतत् = यह, अन्ने = अन्नमें; अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, यः = जो मनुष्य; (इस प्रकार) अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, एतत् = इस रहस्यको; वेद = भलीभाँति जान लेता है; सः = वह; (उस विषयमें) प्रतितिष्ठति = प्रतिष्ठित हो जाता है, अन्नवान् = अन्नवाला; (और) अन्नादः = अन्नको खानेवाला अर्थात् उसे पचानेकी शक्तिवाला, भवति = हो जाता है, प्रजया = (वह) प्रजासे; पशुभिः = पशुओंसे, (और) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे; महान् = महान्, भवति = बन जाता है; कीर्त्या = कीर्तिसे, [च = भी;] महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या—इस अनुवाकमें पृथ्वी और आकाश दोनोंको अन्नरूप बताकर उनके तत्त्वको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्यको अन्नादिसे समृद्ध होनेकी इच्छा हो, उसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये—यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि 'मैं अन्नको खूब बढ़ाऊँगा।' किसी वस्तुका अभ्युदय—उसका विस्तार चाहना ही उसे आकर्षित करनेका सबसे श्रेष्ठ उपाय है। जो जिस वस्तुको क्षीण करनेपर तुला हुआ है, वह वस्तु उसे कदापि नहीं मिल सकती और मिलनेपर टिकेगी नहीं। इसके बाद अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि पृथ्वी ही अन्न है—जितने भी अन्न है वे सब पृथ्वीसे ही उत्पन्न होते हैं। और पृथ्वीको अपनेमें विलीन कर लेनेवाला इसका आधारभूत आकाश ही अन्नाद अर्थात् इस अन्नका भोक्ता है। पृथ्वीमें आकाश स्थित है, क्योंकि वह सर्वव्यापी है, और आकाशमें पृथ्वी स्थित है—यह बात प्रत्यक्ष- सिद्ध है। ये दोनों ही एक दूसरेके आधार होनेके कारण अन्नस्वरूप हैं। पाँच भूतोंमें आकाश पहला तत्त्व है और पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है, बीचके तीनों तत्त्व इन्हींके अन्तर्गत हैं। समस्त भोग्यपदार्थरूप अन्न इन पाँच महाभूतोंके ही कार्य हैं; अतः ये ही अन्नके रूपमें स्थित हैं। इसलिये अन्नमें ही अन्न प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस बातको तत्त्वसे जानता है कि पृथ्वीरूप अन्नमें आकाशरूप अन्न और आकाशरूप अन्नमें पृथ्वीरूप अन्न प्रतिष्ठित है, वही सम्पूर्ण भूतोंका यथायोग्य उपयोग कर सकता है और इसीलिये वह इस विषयमें सिद्ध हो जाता है। इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह अन्नसे अर्थात् सब प्रकारके भोग्य पदार्थोंसे और उनको उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। और इसीलिये वह सन्तानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और विद्याके तेजसे समृद्ध हो महान् बन जाता है। उसका यश समस्त जगत्में फैल जाता है, अतः वह यशके द्वारा भी महान् हो जाता है। ॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ ९ ॥
दशम अनुवाक न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद् व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नꣳराद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वै मध्यतोऽ- न्नꣳराद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नꣳराद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । य एवं वेद । वसतौ = अपने घरपर (ठहरनेके लिये आये हुए); कंचन = किसी (भी अतिथि) को; न प्रत्याचक्षीत = प्रतिकूल उत्तर न दे, तत् = वह, व्रतम् = एक व्रत है, तस्मात् = इसलिये, (अतिथि-सत्कारके लिये) यया कया च विधया = जिस किसी भी प्रकारसे, बहु = बहुत-सा, अन्नम् = अन्न, प्राप्नुयात् = प्राप्त करना चाहिये, (क्योंकि सद्गृहस्थ) अस्मै = इस (घरपर आये हुए अतिथि) से, अन्नम् = भोजन, अराधि = तैयार है; इति = यों, आचक्षते = कहते हैं, (यदि यह अतिथिको) मुखतः = मुख्यवृत्तिसे अर्थात् अधिक श्रद्धा, प्रेम और सत्कारपूर्वक, एतत् = यह, राद्धम् = तैयार किया हुआ, 'अन्नम् = भोजन (देता है तो), वै = निश्चय ही, अस्मै = इस (दाता) को, मुखतः = अधिक आदर-सत्कारके साथ ही, अन्नम् =