कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३५८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
अन्नं, राध्यते= प्राप्त होता है; (यदि यह अतिथिको ) मध्यतः=मध्यम श्रेणीकी श्रद्धा और प्रेमसे; एतत् = यह; राद्धम् = तैयार किया हुआ; अन्नम् = भोजन (देता है तो); चै = निःसन्देह; अस्मै = इस (दाता) को; मध्यतः = मध्यम श्रद्धा और प्रेमसे ही, अन्नम् राध्यते=अन्न प्राप्त होता है; (और यदि यह अतिथिको) अन्ततः = निकृष्ट श्रद्धा-सत्कारसे, एतत् = यह; राद्धम् = तैयार किया हुआ; अन्नम् = भोजन (देता है तो), वै = अवश्य ही; अस्मै = इस (दाता) को, अन्ततः = निकृष्ट श्रद्धा आदिसे; अन्नम् = अन्न; राध्यते = मिलता है; यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद = इस रहस्यको जानता है (वह अतिथिके साथ बहुत उत्तम बर्ताव करता है)।
**व्याख्या—**दसवें अनुवाकके इस अंशमें अतिथि-सेवाका महत्त्व और फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अतिथि-सेवाका पूरा लाभ उठाना चाहे, उसको सबसे पहले तो यह नियम लेना चाहिये कि 'मेरे घरपर जो कोई अतिथि आश्रयकी आशासे पधारेगा, मैं कभी उसको सूखा जवाब देकर निराश नहीं लौटाऊँगा।' 'अतिथिदेवो भव'— अतिथिकी देवताबुद्धिसे सेवा करो—यह उपदेश गुरुके द्वारा स्नातक शिष्यको पहले ही दिया जा चुका है। इस प्रकारका नियम लेनेपर ही अतिथि-सेवा सम्भव है। यह व्रत लेकर इसका पालन करनेके लिये—केवल अपना तथा कुटुम्बका पोषण करनेके लिये ही नहीं—जिस किसी भी न्यायोचित उपायसे बहुत से अन्नका उपार्जन करे। धन-सम्पत्ति और अन्नादि, जो शरीरके पालन पोषणके लिये उपयोगी सामग्री हैं, उन्हें प्राप्त करनेके लिये जितने भी न्यायोचित उपाय बताये गये हैं तथा पूर्वके तीन अनुवाकोंमें भी जो-जो उपाय बताये गये हैं, उनमेंसे किसीके भी द्वारा बहुत-सा अन्न प्राप्त करना चाहिये। अर्थात् अतिथि-सेवाके लिये आवश्यक वस्तुओंका अधिक मात्रामे सङ्ग्रह करना चाहिये; क्योंकि अतिथि-सेवा गृहस्थोचित सदाचारका एक अत्यावश्यक अङ्ग है। अच्छे प्रतिश्रित मनुष्य घरपर आये हुए अतिथिसे यही कहते हैं—'आइये, बैठिये; भोजन तैयार है, भोजन कीजिये' इत्यादि। वे यह कदापि नहीं कहते कि हमारे यहाँ आपकी सेवाके लिये उपयुक्त वस्तुएँ अथवा रहनेका स्थान नहीं है। जो मनुष्य अपने घरपर आये हुए अतिथिकी अधिक आदर-सत्कारपूर्वक उत्तमभावसे विशुद्ध सामग्रियोंद्वारा सेवा करता है—उसे शुद्धतापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन देता है, उसको भी उत्तमभावसे ही अन्न प्राप्त होता है अर्थात् उसे भोग्य-पदार्थाके संग्रह करनेमें कठिनाईका सामना नहीं करना पड़ता। अतिथि-सेवाके प्रभावसे उसे किसी बातकी कमी नहीं रहती। अनायास उसकी सारी आवश्यकताएँ पूर्ण होती रहती हैं। यदि वह आये हुए अतिथिकी मध्यमभावसे सेवा करता है, साधारण रीतिसे भोजनादि तैयार करके विशेष आदर-सत्कारके बिना ही अतिथिको भोजन आदि कराके उसे सुख पहुँचाता है, तो उसे भी साधारण रीतिसे ही अन्न प्राप्त होता है। अर्थात् अन्न-वस्त्र आदि पदार्थोंका सङ्ग्रह करनेमें उसे साधारणतया आवश्यक परिश्रम करना पड़ता है। जिस भावसे वह अतिथिको देता है, उसी भावसे उतने ही आदर-सत्कारके साथ उसे वे वस्तुएँ मिलती हैं। इसी प्रकार यदि कोई अन्तिम वृत्तिसे अर्थात् बिना किसी प्रकारका आदर- सत्कार किये तुच्छ भावसे भाररूप समझकर अतिथिकी सेवा करता है—उसे निकृष्ट भावसे अश्रद्धापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन आदि पदार्थ देता है, तो उसे वे पदार्थ वैसे ही भावसे प्राप्त होते हैं। अर्थात् उनकी प्राप्तिके लिये उसे अधिक-से-अधिक परिश्रम करना पड़ता है, लोगोंकी खुशामद करनी पड़ती है। जो मनुष्य इस प्रकार इस रहस्यको जानता है, वह उत्तम रीतिसे और विशुद्धभावसे अतिथि सेवा करता है, अतः उसे सर्वोत्तम फल जो पहले तीन अनुवाकोंमें बताया गया है, वह मिलता है।
**सम्बन्ध—**अब परमात्माका विभूतिरूपसे सर्वत्र चिन्तन करनेका प्रकार बताया जाता है—
क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति दृष्टौ । बलमिति विद्युति । यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे ।
[ सः परमात्मा = वह परमात्मा, ] वाचि = वाणीमें; क्षेमः इति = रक्षाशक्तिके रूपसे है; प्राणापानयोः = प्राण और अपानमें, योगक्षेमः इति = प्राप्ति और रक्षा—दोनों शक्तियोंके रूपमें है, हस्तयोः = हाथोंमें; कर्म इति = कर्म करनेकी शक्तिके रूपमें है, पादयोः = पैरोंमें, गतिः इति = चलनेकी शक्तिके रूपमें स्थित है, पायौ = गुदामें, विमुक्तिः इति = मलत्यागकी शक्ति बनकर है, इति = इस प्रकार (ये), मानुषीः समाज्ञा = मानुषी समाज्ञा अर्थात् आध्यात्मिक उपासनाएँ हैं, अथ = अब;