कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 385, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 385
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५९ दैवी = दैवी उपासनाओंका वर्णन करते हैं; (वह परमात्मा) वृष्टौ = वृष्टिमें; तृप्तिः इति = तृप्ति-शक्तिके रूपमें है; विद्युति = बिजलीमें; बलम् इति = बल (पावर) बनकर स्थित है; पशुषु = पशुओंमें, यशः इति = यशके रूपमें स्थित है; नक्षत्रेषु = ग्रहों और नक्षत्रोंमें; ज्योतिः इति = ज्योतिरूपसे स्थित है, उपस्थे = उपस्थमें; प्रजातिः = प्रजा उत्पन्न करनेकी शक्ति, अमृतम् = वीर्यरूप अमृत (और); आनन्दः = आनन्द देनेकी शक्ति, इति = बनकर स्थित है, आकाशे = (तथा) आकाशमें; सर्वम् इति = सबका आधार बनकर स्थित है । व्याख्या-दसवें अनुवाकके इस अंशमें परमेश्वरकी विभूतियोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया है । भाव यह है कि सत्यरूप वाणीमें आशीर्वादादिके द्वारा जो रक्षा करनेकी शक्ति प्रतीत होती है, उसके रूपमें वहाँ परमात्माकी ही स्थिति है । प्राण और अपानमें जो जीवनोपयोगी वस्तुओंको आकर्षण करनेकी और जीवन-रक्षाकी शक्ति है, वह भी परमात्माका ही अंश है । इसी प्रकार हाथोंमें काम करनेकी शक्ति, पैरोंमें चलनेकी शक्ति और गुदामें मलत्याग करनेकी शक्ति भी परमात्माकी ही हैं । ये सब शक्तियाँ उन परमेश्वरकी शक्तिका ही एक अंश हैं । यह देखकर मनुष्यको परमेश्वरकी सत्तापर विश्वास करना चाहिये । यह मानुषी समाज्ञा बतायी गयी है, अर्थात् मनुष्यके शरीरमें प्रतीत होनेवाली परमात्माकी शक्तियोंका संक्षेपमे दिग्दर्शन कराया गया है । इसीको आध्यात्मिक (शरीर-सम्बन्धी) उपासना भी कह सकते हैं । इसी प्रकार दैवी पदार्थोंमें अभिव्यक्त होनेवाली शक्तिका वर्णन करते हैं । यह दैवी अथवा आधिदैविक उपासना है। वृष्टिमें जो अन्नादिको उत्पन्न करने तथा जल-प्रदानके द्वारा सबको तृप्त करनेकी शक्ति है, बिजलीमें जो बल (पावर) है, पशुओमे जो स्वामीका यश बढानेकी शक्ति है, नक्षत्रोंमें अर्थात् सूर्य, चन्द्रमा और तारागणोंमें जो प्रकाश है, उपस्थमें जो संतानोत्पादनकी शक्ति, वीर्यरूप अमृत* और आनन्द देनेकी शक्ति है तथा आकाशमें जो सबको धारण करनेकी और सर्वव्यापकताकी एवं अन्य सब प्रकारकी शक्ति है—ये सब उन परमेश्वरकी अचिन्त्य एव अपार शक्तिके ही किसी एक अंशकी अभिव्यक्तियाँ हैं । गीतामे भी कहा है कि इस जगत्में जो कुछ भी विभूति, शक्ति और शोभासे युक्त है, वह मेरे ही तेजका एक अंश है (गीता १० । ४१) । इन सबको देखकर मनुष्यको सर्वत्र एक परमात्माकी व्यापकताका रहस्य समझना चाहिये । सम्बन्ध-अब विविध भावनासे की जानेवाली उपासनाका फलसहित वर्णन करते हैं— तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति । तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद् ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद् ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत । पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । तत् = वह (उपास्यदेव); प्रतिष्ठा = 'प्रतिष्ठा' (सबका आधार) है; इति = इस प्रकार, उपासीत = (उसकी) उपासना करे तो; प्रतिष्ठावान् भवति = साधक प्रतिष्ठावाला हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव); महः = सबमे महान् है, इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उपासना करे तो, महान् = महान्, भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), मनः = 'मन' है, इति = इस प्रकार समझकर; उपासीत = उसकी उपासना करे तो; (ऐसा उपासक) मानवान् = मनन- शक्तिसे सम्पन्न; भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), नमः = 'नमः' (नमस्कारके योग्य) है; इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, अस्मै = ऐसे उपासकके लिये, कामाः = समस्त काम—भोग पदार्थ; नम्यन्ते = विनीत हो जाते हैं, तत् = वह (उपास्यदेव); ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, (ऐसा उपासक) ब्रह्मवान् = ब्रह्मसे युक्त, भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), ब्रह्मणः = परमात्माका; परिमरः = सबको मारनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी है, इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, एनम् परि = ऐसे उपासकके प्रति, द्विषन्तः = द्वेष रखनेवाले; सपत्नाः = शत्रु, म्रियन्ते = मर जाते हैं;
- शरीरका रक्षक एव पोषक तथा जीवनका आधार होनेसे वीर्यको अमृत कहा गया है । इसकी सावधानीके साथ रक्षा करनेसे अमृतत्वकी प्राप्ति भी सम्भव है ।