भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 832 में से

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पृष्ठ 386

३६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ये = जो, परि = (उसका) सब प्रकारसे, अप्रियाः भ्रातृव्याः = अनिष्ट चाहनेवाले अप्रिय बन्धुजन हैं, [ ते अपि म्रियन्ते = वे भी मर जाते हैं।] व्याख्या-इस मन्त्रमे सकाम उपासनाका भिन्न-भिन्न फल बताया गया है। भाव यह है कि प्रतिष्ठा चाहनेवाला पुरुष अपने उपास्यदेवकी प्रतिष्ठाके रूपमे उपासना करे, अर्थात् 'वे उपास्यदेव ही सब की प्रतिष्ठा-सबके आधार हैं' इस भावसे उनका चिन्तन करे। ऐसे उपासककी संसारमे प्रतिष्ठा होती है। महत्त्वकी प्राप्तिके लिये यदि अपने उपास्यदेवको 'महान्' समझकर उनकी उपासना करे तो वह महान् हो जाता है—महत्त्वको प्राप्त कर लेता है। यदि अपने उपास्यदेवको महान् मनस्वी समझकर मनन करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे तो वह साधक मनन करनेकी विशेष शक्ति प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार जो अपने उपास्यदेवको नमस्कार करनेयोग्य शक्तिशाली समझकर वैसी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे, वह स्वयं नमस्कार करनेयोग्य बन जाता है, समस्त कामनाएँ उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। समस्त भोग अपने-आप उसके चरणोंमें लोटने लगते हैं। अनायास ही उसे समस्त भोग-सामग्री प्राप्त हो जाती है। तथा जो अपने उपास्यदेवको सबसे बड़ा-सर्वाधार ब्रह्म समझकर उन्हींकी प्राप्तिके लिये उनकी उपासना करे, वह ब्रह्मवान् बन जाता है, अर्थात् सर्वशक्तिमान् परमेश्वर उसके अपने बन जाते हैं—उसके वशमे हो जाते हैं। जो अपने उपास्यदेवको ब्रह्मके द्वारा सबका सहार करनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी देवता समझकर उनकी उपासना करता है, उससे द्वेष करनेवाले शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं तथा जो उसके अपकारी एवं अप्रिय बन्धुजन होते हैं, वे भी मारे जाते हैं। वास्तवमे किसी भी रूपमें किसी भी उपास्यदेवकी उपासना की जाय, वह प्रकारान्तरसे उन परब्रह्म परमेश्वरकी ही उपासना है, परतु सकाम मनुष्य अज्ञानवश इस रहस्यको न जाननेके कारण भिन्न-भिन्न शक्तियोंसे युक्त भिन्न-भिन्न देवताओंकी भिन्न-भिन्न कामनाओंकी सिद्धिके लिये उपासना करते हैं, इसलिये वे वास्तविक लाभसे वञ्चित रह जाते हैं (गीता ७। २१, २२, २३, २४; ९। २२, २३)। अतः मनुष्यको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर सब देवोंके देव सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासना उन्हींकी प्राप्तिके लिये करे, उनसे और कुछ न चाहे। सम्बन्ध-सर्वत्र एक ही परमात्मा परिपूर्ण हैं, इस बातको समझकर उन्हें प्राप्त कर लेनेका फल और प्राप्त करनेवालेकी स्थितिका वर्णन करते हैं— स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। सय एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुप- संक्राम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं विज्ञानमयमात्मानमुप- संक्राम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्राम्य । इमाँल्लोकान्कामान्नी कामरूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते । सः = वह (परमात्मा); यः = जो; अयम् = यह; पुरुषे = इस मनुष्यमें है, च = तथा; यः = जो, असौ = वह; आदित्ये च = सूर्यमें भी है, सः = वह (दोनोंका अन्तर्यामी); एकः = एक ही है; यः = जो (मनुष्य), एवंवित् = इस प्रकार तत्त्वसे जाननेवाला है; सः = वह, अस्मात् = इस; लोकात् = लोक (शरीर) से; प्रेत्य = उत्क्रमण करके; एतम् = इस, अन्नमयम् = अन्नमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर, एतम् = इस, प्राणमयम् = प्राणमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; एतम् = इस, मनोमयम् = मनोमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर, एतम् = इस; विज्ञानमयम् = विज्ञानमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; एतम् = इस; आनन्दमयम् = आनन्दमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; कामान्नी = इच्छानुसार भोगवाला; (और) कामरूपी = इच्छानुसार रूपवाला हो जाता है, (तथा) इमान् = इन, लोकान् अनुसंचरन् = सब लोकोंमें विचरता हुआ; एतत् = इस (आगे बताये हुए ); साम गायन् = साम (समतायुक्त उद्गारों) का गायन करता; आस्ते = रहता है। —वे परमात्मा, जिनका वर्णन पहले सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण कहकर किया जा चुका