भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 832 में से

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पृष्ठ 387

३ तैत्तिरीयोपनिषद् * ३६१ है और जो परमानन्दस्वरूप है, वे इस पुरुषमे अर्थात् मनुष्यमे और सूर्यमे एक ही है। अभिप्राय यह कि सम्पूर्ण प्राणियोंमे अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एक ही परमात्मा है। नाना रूपोंमे उन्हीकी अभिव्यक्ति हो रही है। जो मनुष्य इस तत्त्व- को जान लेता है, वह वर्तमान शरीरसे अलग होनेपर उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, जिनका वर्णन अन्नमय आत्मा, प्राणमय आत्मा, मनोमय आत्मा, विज्ञानमय आत्मा और आनन्दमय आत्माके नामसे पहले किया गया है। इन सबको पाकर अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म भेदसे जो एककी अपेक्षा एकके अन्तरात्मा होकर नाना रूपोंमे स्थित हे और सबके अन्तर्यामी परमानन्दस्वरूप हैं, उनको प्राप्त करके मनुष्य पर्याप्त भोग-सामग्रीसे युक्त और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। साथ ही वह इन लोकोमे विचरता हुआ आगे बताये जानेवाले साम ( समतायुक्त भावो ) का गान करता रहता है। सम्बन्ध-उसके आनन्दमग्न मनम जो समता और सर्वरूपताके भाव उठा करते हैं, उनका वर्णन करते हैं- हा३वु हा३वु हा३वु । अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादो३ऽहमन्नादो३ऽहमन्नादः । अहग्ँश्लोककृदहग्ँश्लोककृदहग्ँश्लोककृत् । अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य । पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भायि। यो मा ददाति स इदेव मा३वाः। अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म् । सुवर्णं ज्योतीः । य एवं वेद । इत्युपनिषत् । हावु हावु हावु = आश्चर्य ! आश्चर्य !! आश्चर्य !II; अहम् = मै, अन्नम् = अन्न हूँ, अहम् = मं; अन्नम् = अन्न हूँ; अहम् = मै; अन्नम् = अन्न हूँ; अहम् = मैं ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ; अहम् = मै ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ, अहम् = मैं ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ; अहम् = मैं, श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ; अहम् = मैं, श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ, अहम् = मैं; श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ, अहम् = मैं, ऋतस्य = सत्यका अर्थात् प्रत्यक्ष दीखने- वाले जगत्की अपेक्षासे, प्रथमजाः = सबमें प्रधान होकर उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ), [च = और,] देवेभ्यः = देवताओंसे भी; पूर्वम् = पहले विद्यमान, अमृतस्य = अमृतका, नाभायि (नाभिः) = केन्द्र, अस्मि = हूँ, यः = जो कोई, मा = मुझे; ददाति = देता है, सः = वह, इत् = इस कार्यसे, एव = ही, मा आवाः = मेरी रक्षा करता है, अहम् = मे, अन्नम् = अन्नस्वरूप होकर, अन्नम् = अन्न, अदन्तम् = खानेवालेको, अद्मि = निगल जाता हूँ, अहम् = मै, विश्वम् = समस्त; भुवनम् अभ्यभवाम् = ब्रह्माण्डका तिरस्कार करता हूँ, सुवः न ज्योतीः = मेरे प्रकाशकी एक झलक सूर्यके समान है, यः = जो, एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है (उसे भी यही स्थिति प्राप्त होती है), इति = इस प्रकार, उपनिषत् = यह उपनिषद्-ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । व्याख्या-उस महापुरुषकी स्थिति शरीरमे नहीं रहती । वह शरीरसे सर्वथा ऊपर उठकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है । यह बात पहले कहकर उसके बाद इस साम-गानका वर्णन किया गया है। इससे यह प्रकट होता है कि परमात्मा- के साथ एकताकी प्राप्ति कर लेनेवाले महापुरुषके ये पावन उद्गार उसके विशुद्ध अन्तःकरणसे निकले हैं और उसकी अलौकिक महिमा सूचित करते हे । 'हावु' पद आश्चर्यबोधक अव्यय है। वह महापुरुष कहता है-बड़े आश्चर्यकी बात है ! ये सम्पूर्ण भोग वस्तुएँ, इनको भोगनेवाला जीवात्मा और इन दोनोंका संयोग करानेवाला परमेश्वर एक मैं ही हूँ। मै ही इस प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्में समस्त देवताओंसे पहले सबमें प्रधान होकर प्रकट होनेवाला ब्रह्मा हूँ, और परमानन्दरूप अमृतके केन्द्र परब्रह्म परमेश्वर भी मुझसे अभिन्न है, अतः वे भी मै ही हूँ । जो कोई मनुष्य किसी भी वस्तुके रूपमे मुझे किसीको प्रदान करता है, वह मानो मुझे देकर मेरी रक्षा करता है । अर्थात् योग्य पात्रमें भोग्य पदार्थोंका दान ही उनकी रक्षाका सर्वोत्तम उपाय है । इसके विपरीत जो अपने ही लिये अन्नरूप समस्त भोगोंका उपभोग करता है, उस खानेवालेको मैं अन्नरूप होकर निगल जाता हूँ। अर्थात् उसका विनाश हो जाता है-उसकी भोग-सामग्री टिकती नही। मैं समस्त ब्रह्माण्डका तिरस्कार करनेवाला हूँ। मेरी महिमाकी तुलनामें यह सब तुच्छ है । मेरे प्रकाशकी एक झलक भी सूर्यके समान है। अर्थात् जगत्मे जितने भी प्रकाशयुक्त पदार्थ हैं, वे सब मेरे ही तेज- उ० अ० ४६-

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