कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ॐ तैत्तिरीयोपनिषद् ॐ ३५५ सप्तम अनुवाक सम्बन्ध—छठे अनुवाकमें ब्रह्मज्ञानीके अन्न और प्रजा आदिसे सम्पन्न होनेकी बात कही गयी, उसपर यह जिज्ञासा होती है कि ये सब सिद्धियाँ भी क्या ब्रह्माक्षात्कार होनेपर ही मिलती हैं, या इन्हें प्राप्त करनेका दूसरा उपाय भी है। इसपर उन सबकी प्राप्तिके दूसरे उपाय भी बताये जाते हैं— अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या । अन्नम् न निन्द्यात् = अन्नकी निन्दा न करे; तत् = वह; व्रतम् = व्रत है. प्राण.= प्राण, वै = ही; अन्नम् = अन्न है; (और) शरीरम् = शरीर; (उस प्राणरूप अन्नसे जीनेके कारण) अन्नादम् = अन्नका भोक्ता है; शरीरम् = शरीर; प्राणे = प्राणके आधारपर, प्रतिष्ठितम् = स्थित हो रहा है; (और) शरीरे = शरीरके आधारपर; प्राण.= प्राण. प्रतिष्ठितः = स्थित हो-रहे हैं; तत् = इस तरह, एतत् = यह, अन्ने = अन्नमें ही, अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = स्थित हो रहा है, यः = जो मनुष्य; अन्ने = अन्नमें ही; अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित हो रहा है; एतत् = इस रहस्यको, वेद = जानता है; सः = वह; प्रतितिष्ठति = उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है; (अतः) अन्नवान् = अन्नवाला, (और) अन्नादः = अन्नको खानेवाला, भवति = हो जाता है, प्रजया = प्रजासे, पशुभि.= पशुओंसे, ब्रह्मवर्चसेन = (और) ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर महान् = महान्; भवति = बन जाता है; (तथा) कीर्त्या = कीर्तिसे (सम्पन्न होकर भी); महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या—इस अनुवाकमें अन्नका महत्त्व बतलाकर उसे जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अन्नादिसे सम्पन्न होना चाहे, उसे सबसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये कि 'मैं कभी अन्नकी निन्दा नहीं करूँगा।' यह एक साधारण नियम है कि जिस किसी वस्तुको मनुष्य पाना चाहता है, उसके प्रति उसकी महत्त्वबुद्धि होनी चाहिये, तभी वह उसके लिये प्रयत्न करेगा। जिसकी चित्तमें हेयबुद्धि है, वह उसकी ओर आँख उठाकर देखेगा भी नहीं। अन्नकी निन्दा न करनेका व्रत लेकर अन्नके इस महत्त्वको समझना चाहिये कि अन्न ही प्राण है, और प्राण ही अन्न है, क्योंकि अन्नसे ही प्राणोंमें बल आता है और प्राणशक्तिसे ही अन्नमय शरीरमें जीवनी-शक्ति आती है। यहाँ प्राणको अन्न इसलिये भी कहा है कि यही शरीरमें अन्नके रसको सर्वत्र फैलाता है। शरीर प्राणके ही आधार टिका हुआ है, इसीलिये वह प्राणरूप अन्नका भोक्ता है। शरीर प्राणमें स्थित है अर्थात् शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन है और प्राण शरीरमें स्थित है—प्राणोंका आधार शरीर है, यह बात प्रत्यक्ष है ही। इस प्रकार यह अन्नमय शरीर भी अन्न है। यह अनुभवसिद्ध विषय है कि प्राणोंको आहार न मिलनेपर वे शरीरकी धातुओंको ही सोख लेते हैं। और शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन होनेसे प्राण भी अन्न ही हैं। अतः शरीर और प्राणका अन्योन्याश्रय सम्बन्ध होनेसे यह कहा गया है कि अन्नमे ही अन्न स्थित हो रहा है। यही इसका तत्त्व है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है, वही शरीर और प्राण—इन दोनोंका ठीक ठीक उपयोग कर सकता है। इसीलिये यह कहा गया है कि वह शरीर और प्राणके विज्ञानमें पारङ्गत हो जाता है। और इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह सब प्रकारकी भोगसामग्रीसे युक्त और उसे उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। और इसीलिये वह सन्तानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे भी सम्पन्न होकर महान् बन जाता है। उसकी कीर्ति, उसका यश जगत्में फैल जाता है और उसके द्वारा भी वह जगत्में महान् हो जाता है। ॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥ 🙞···🙜 अष्टम अनुवाक अन्नं न परिचक्षीत । तद्व्रतम् । आपो वा अन्नम् । ज्योतिरन्नादम् । अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम् ।
३५६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या । अन्नम् न परिचक्षीत = अन्नकी अवहेलना न करे; तत् = वह; व्रतम् = एक व्रत है, आपः = जल; वै = ही; अन्नम् = अन्न है, ( और ) ज्योतिः = तेज, अन्नादम् = ( रसस्वरूप ) अन्नका भोक्ता है; अप्सु = जलमें; ज्योतिः = तेज; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, ज्योतिषि = तेजमें, आपः = जल, प्रतिष्ठिताः = प्रतिष्ठित है, तत् = वही; एतत् = यह; अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, यः = जो मनुष्य, ( इस प्रकार ) अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है; एतत् = इस रहस्यको, वेद = भलीभाँति समझता है, सः = वह, ( अन्तमे ) प्रतितिष्ठति = ( उस रहस्यमे ) परिनिष्ठित हो जाता है, ( तथा ) अन्नवान् = अन्नवाला, ( और ) अन्नादः = अन्नको खानेवाला; भवति = हो जाता है; प्रजया = ( वह ) संतानसे; पशुभिः = पशुओंसे, ( और ) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे, महान् = महान्; भवति = बन जाता है, ( तथा ) कीर्त्या = कीर्तिसे ( समृद्ध होकर भी ); महान् = महान्, [ भवति = हो जाता है । ] व्याख्या - इस अनुवाकमें जल और ज्योति दोनोंको अन्नरूप बताकर उन्हें जाननेका फल बतलाया है । भाव यह है कि जिस मनुष्यकी अन्नादिसे सम्पन्न होनेकी इच्छा हो, उसे यह नियम ले लेना चाहिये कि 'मैं कभी अन्नकी अवहेलना नहीं करूँगा अर्थात् अन्नका उल्लङ्घन, दुरुपयोग और परित्याग नहीं करूँगा एव उसे जूठा नहीं छोड़ें गा ।' यह साधारण नियम है कि जो जिस वस्तुका अनादर करता है, उसके प्रति उपेक्षाबुद्धि रखता है, वह वस्तु उसका कभी वरण नहीं करती । किसी भी वस्तुको प्राप्त करनेके लिये उसके प्रति आदरबुद्धि रखना परमावश्यक है । जिसकी जिसमें आदरबुद्धि नहीं है, वह उसे पानेकी इच्छा अथवा चेष्टा क्यों करेगा । इस प्रकार अन्नकी अवहेलना न करनेका व्रत लेकर फिर अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि जल ही अन्न है; क्योंकि सब प्रकारके अन्न अर्थात् खाद्य वस्तुएँ जलसे ही उत्पन्न होती हैं। और ज्योति अर्थात् तेज ही इस जलरूप अन्नको भक्षण करनेवाला है । जिस प्रकार अग्नि एवं सूर्यरश्मियाँ आदि बाहरके जलका शोषण करती हैं, उसी प्रकार शरीरमें रहनेवाली जठराग्नि शरीरमें जानेवाले जलीय तत्त्वोंका शोषण करती है । जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है। यद्यपि जल स्वभावतः ठंडा है, अतएव उसमें उष्ण ज्योति कैसे स्थित है- यह बात समझमें नहीं आती, तथापि शास्त्रोंमें यह माना गया है कि समुद्रमे वडवानल रहता है तथा आजकलके वैज्ञानिक भी जलमेंसे बिजली-तत्त्वको निकालते हैं। इससे यह बात सिद्ध होती है कि जलमें तेज स्थित है । इसी प्रकार तेजमें जल स्थित है, यह तो प्रत्यक्ष देखनेमें आता ही है, क्योंकि सूर्यकी प्रखर किरणोंमें स्थित जल ही हमलोगोंके सामने वृष्टिके रूपमें प्रत्यक्ष होता है । इस प्रकार ये जल और तेज अन्योन्याश्रित होनेके कारण समस्त अन्नरूप खाद्य पदार्थोंके कारण हैं, अतः ये ही उनके रूपमें परिणत होते हैं, इसलिये दोनों अन्न ही हैं। इस प्रकार अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस तत्त्वको समझ लेता है, वह इन दोनोंके विज्ञानमें प्रतिष्ठित अर्थात् सिद्ध हो जाता है, क्योंकि वही इन दोनोंका ठीक उपयोग कर सकता है । और इसीके फलस्वरूप वह अन्नसे अर्थात् सब प्रकारकी भोग-सामग्रीसे सम्पन्न और उन सबको यथायोग्य उपभोगमें लानेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है। और इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो महान् हो जाता है। इतना ही नहीं, इस समृद्धिके कारण उसका यश सर्वत्र फैल जाता है, वह बड़ा भारी यशस्वी हो जाता है । और उस यशके कारण भी वह महान् हो जाता है । ॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥ नवम अनुवाक अन्नं बहु कुर्वीत । तद् व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या ।
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५७
-अन्नम् = अन्नको; बहु कुर्वीत = बढ़ाये; तत् = वह; व्रतम् = एक व्रत है; पृथिवी = पृथ्वी; वै = ही; अन्नम् = अन्न है; आकाशः = आकाश; अन्नादः = पृथ्वीरूप अन्नका आधार होनेसे (मानो) अन्नाद है; पृथिव्याम् = पृथ्वीमें, आकाशः = आकाश; प्रतिष्ठितः = प्रतिष्ठित है; आकाशे = आकाशमे, पृथिवी = पृथ्वी; प्रतिष्ठिता = प्रतिष्ठित है; तत् = वही; एतत् = यह, अन्ने = अन्नमें; अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, यः = जो मनुष्य; (इस प्रकार) अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, एतत् = इस रहस्यको; वेद = भलीभाँति जान लेता है; सः = वह; (उस विषयमें) प्रतितिष्ठति = प्रतिष्ठित हो जाता है, अन्नवान् = अन्नवाला; (और) अन्नादः = अन्नको खानेवाला अर्थात् उसे पचानेकी शक्तिवाला, भवति = हो जाता है, प्रजया = (वह) प्रजासे; पशुभिः = पशुओंसे, (और) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे; महान् = महान्, भवति = बन जाता है; कीर्त्या = कीर्तिसे, [च = भी;] महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या—इस अनुवाकमें पृथ्वी और आकाश दोनोंको अन्नरूप बताकर उनके तत्त्वको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्यको अन्नादिसे समृद्ध होनेकी इच्छा हो, उसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये—यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि 'मैं अन्नको खूब बढ़ाऊँगा।' किसी वस्तुका अभ्युदय—उसका विस्तार चाहना ही उसे आकर्षित करनेका सबसे श्रेष्ठ उपाय है। जो जिस वस्तुको क्षीण करनेपर तुला हुआ है, वह वस्तु उसे कदापि नहीं मिल सकती और मिलनेपर टिकेगी नहीं। इसके बाद अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि पृथ्वी ही अन्न है—जितने भी अन्न है वे सब पृथ्वीसे ही उत्पन्न होते हैं। और पृथ्वीको अपनेमें विलीन कर लेनेवाला इसका आधारभूत आकाश ही अन्नाद अर्थात् इस अन्नका भोक्ता है। पृथ्वीमें आकाश स्थित है, क्योंकि वह सर्वव्यापी है, और आकाशमें पृथ्वी स्थित है—यह बात प्रत्यक्ष- सिद्ध है। ये दोनों ही एक दूसरेके आधार होनेके कारण अन्नस्वरूप हैं। पाँच भूतोंमें आकाश पहला तत्त्व है और पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है, बीचके तीनों तत्त्व इन्हींके अन्तर्गत हैं। समस्त भोग्यपदार्थरूप अन्न इन पाँच महाभूतोंके ही कार्य हैं; अतः ये ही अन्नके रूपमें स्थित हैं। इसलिये अन्नमें ही अन्न प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस बातको तत्त्वसे जानता है कि पृथ्वीरूप अन्नमें आकाशरूप अन्न और आकाशरूप अन्नमें पृथ्वीरूप अन्न प्रतिष्ठित है, वही सम्पूर्ण भूतोंका यथायोग्य उपयोग कर सकता है और इसीलिये वह इस विषयमें सिद्ध हो जाता है। इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह अन्नसे अर्थात् सब प्रकारके भोग्य पदार्थोंसे और उनको उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। और इसीलिये वह सन्तानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और विद्याके तेजसे समृद्ध हो महान् बन जाता है। उसका यश समस्त जगत्में फैल जाता है, अतः वह यशके द्वारा भी महान् हो जाता है। ॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ ९ ॥
दशम अनुवाक न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद् व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नꣳराद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वै मध्यतोऽ- न्नꣳराद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नꣳराद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । य एवं वेद । वसतौ = अपने घरपर (ठहरनेके लिये आये हुए); कंचन = किसी (भी अतिथि) को; न प्रत्याचक्षीत = प्रतिकूल उत्तर न दे, तत् = वह, व्रतम् = एक व्रत है, तस्मात् = इसलिये, (अतिथि-सत्कारके लिये) यया कया च विधया = जिस किसी भी प्रकारसे, बहु = बहुत-सा, अन्नम् = अन्न, प्राप्नुयात् = प्राप्त करना चाहिये, (क्योंकि सद्गृहस्थ) अस्मै = इस (घरपर आये हुए अतिथि) से, अन्नम् = भोजन, अराधि = तैयार है; इति = यों, आचक्षते = कहते हैं, (यदि यह अतिथिको) मुखतः = मुख्यवृत्तिसे अर्थात् अधिक श्रद्धा, प्रेम और सत्कारपूर्वक, एतत् = यह, राद्धम् = तैयार किया हुआ, 'अन्नम् = भोजन (देता है तो), वै = निश्चय ही, अस्मै = इस (दाता) को, मुखतः = अधिक आदर-सत्कारके साथ ही, अन्नम् =
३५८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
अन्नं, राध्यते= प्राप्त होता है; (यदि यह अतिथिको ) मध्यतः=मध्यम श्रेणीकी श्रद्धा और प्रेमसे; एतत् = यह; राद्धम् = तैयार किया हुआ; अन्नम् = भोजन (देता है तो); चै = निःसन्देह; अस्मै = इस (दाता) को; मध्यतः = मध्यम श्रद्धा और प्रेमसे ही, अन्नम् राध्यते=अन्न प्राप्त होता है; (और यदि यह अतिथिको) अन्ततः = निकृष्ट श्रद्धा-सत्कारसे, एतत् = यह; राद्धम् = तैयार किया हुआ; अन्नम् = भोजन (देता है तो), वै = अवश्य ही; अस्मै = इस (दाता) को, अन्ततः = निकृष्ट श्रद्धा आदिसे; अन्नम् = अन्न; राध्यते = मिलता है; यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद = इस रहस्यको जानता है (वह अतिथिके साथ बहुत उत्तम बर्ताव करता है)।
**व्याख्या—**दसवें अनुवाकके इस अंशमें अतिथि-सेवाका महत्त्व और फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अतिथि-सेवाका पूरा लाभ उठाना चाहे, उसको सबसे पहले तो यह नियम लेना चाहिये कि 'मेरे घरपर जो कोई अतिथि आश्रयकी आशासे पधारेगा, मैं कभी उसको सूखा जवाब देकर निराश नहीं लौटाऊँगा।' 'अतिथिदेवो भव'— अतिथिकी देवताबुद्धिसे सेवा करो—यह उपदेश गुरुके द्वारा स्नातक शिष्यको पहले ही दिया जा चुका है। इस प्रकारका नियम लेनेपर ही अतिथि-सेवा सम्भव है। यह व्रत लेकर इसका पालन करनेके लिये—केवल अपना तथा कुटुम्बका पोषण करनेके लिये ही नहीं—जिस किसी भी न्यायोचित उपायसे बहुत से अन्नका उपार्जन करे। धन-सम्पत्ति और अन्नादि, जो शरीरके पालन पोषणके लिये उपयोगी सामग्री हैं, उन्हें प्राप्त करनेके लिये जितने भी न्यायोचित उपाय बताये गये हैं तथा पूर्वके तीन अनुवाकोंमें भी जो-जो उपाय बताये गये हैं, उनमेंसे किसीके भी द्वारा बहुत-सा अन्न प्राप्त करना चाहिये। अर्थात् अतिथि-सेवाके लिये आवश्यक वस्तुओंका अधिक मात्रामे सङ्ग्रह करना चाहिये; क्योंकि अतिथि-सेवा गृहस्थोचित सदाचारका एक अत्यावश्यक अङ्ग है। अच्छे प्रतिश्रित मनुष्य घरपर आये हुए अतिथिसे यही कहते हैं—'आइये, बैठिये; भोजन तैयार है, भोजन कीजिये' इत्यादि। वे यह कदापि नहीं कहते कि हमारे यहाँ आपकी सेवाके लिये उपयुक्त वस्तुएँ अथवा रहनेका स्थान नहीं है। जो मनुष्य अपने घरपर आये हुए अतिथिकी अधिक आदर-सत्कारपूर्वक उत्तमभावसे विशुद्ध सामग्रियोंद्वारा सेवा करता है—उसे शुद्धतापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन देता है, उसको भी उत्तमभावसे ही अन्न प्राप्त होता है अर्थात् उसे भोग्य-पदार्थाके संग्रह करनेमें कठिनाईका सामना नहीं करना पड़ता। अतिथि-सेवाके प्रभावसे उसे किसी बातकी कमी नहीं रहती। अनायास उसकी सारी आवश्यकताएँ पूर्ण होती रहती हैं। यदि वह आये हुए अतिथिकी मध्यमभावसे सेवा करता है, साधारण रीतिसे भोजनादि तैयार करके विशेष आदर-सत्कारके बिना ही अतिथिको भोजन आदि कराके उसे सुख पहुँचाता है, तो उसे भी साधारण रीतिसे ही अन्न प्राप्त होता है। अर्थात् अन्न-वस्त्र आदि पदार्थोंका सङ्ग्रह करनेमें उसे साधारणतया आवश्यक परिश्रम करना पड़ता है। जिस भावसे वह अतिथिको देता है, उसी भावसे उतने ही आदर-सत्कारके साथ उसे वे वस्तुएँ मिलती हैं। इसी प्रकार यदि कोई अन्तिम वृत्तिसे अर्थात् बिना किसी प्रकारका आदर- सत्कार किये तुच्छ भावसे भाररूप समझकर अतिथिकी सेवा करता है—उसे निकृष्ट भावसे अश्रद्धापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन आदि पदार्थ देता है, तो उसे वे पदार्थ वैसे ही भावसे प्राप्त होते हैं। अर्थात् उनकी प्राप्तिके लिये उसे अधिक-से-अधिक परिश्रम करना पड़ता है, लोगोंकी खुशामद करनी पड़ती है। जो मनुष्य इस प्रकार इस रहस्यको जानता है, वह उत्तम रीतिसे और विशुद्धभावसे अतिथि सेवा करता है, अतः उसे सर्वोत्तम फल जो पहले तीन अनुवाकोंमें बताया गया है, वह मिलता है।
**सम्बन्ध—**अब परमात्माका विभूतिरूपसे सर्वत्र चिन्तन करनेका प्रकार बताया जाता है—
क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति दृष्टौ । बलमिति विद्युति । यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे ।
[ सः परमात्मा = वह परमात्मा, ] वाचि = वाणीमें; क्षेमः इति = रक्षाशक्तिके रूपसे है; प्राणापानयोः = प्राण और अपानमें, योगक्षेमः इति = प्राप्ति और रक्षा—दोनों शक्तियोंके रूपमें है, हस्तयोः = हाथोंमें; कर्म इति = कर्म करनेकी शक्तिके रूपमें है, पादयोः = पैरोंमें, गतिः इति = चलनेकी शक्तिके रूपमें स्थित है, पायौ = गुदामें, विमुक्तिः इति = मलत्यागकी शक्ति बनकर है, इति = इस प्रकार (ये), मानुषीः समाज्ञा = मानुषी समाज्ञा अर्थात् आध्यात्मिक उपासनाएँ हैं, अथ = अब;
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५९ दैवी = दैवी उपासनाओंका वर्णन करते हैं; (वह परमात्मा) वृष्टौ = वृष्टिमें; तृप्तिः इति = तृप्ति-शक्तिके रूपमें है; विद्युति = बिजलीमें; बलम् इति = बल (पावर) बनकर स्थित है; पशुषु = पशुओंमें, यशः इति = यशके रूपमें स्थित है; नक्षत्रेषु = ग्रहों और नक्षत्रोंमें; ज्योतिः इति = ज्योतिरूपसे स्थित है, उपस्थे = उपस्थमें; प्रजातिः = प्रजा उत्पन्न करनेकी शक्ति, अमृतम् = वीर्यरूप अमृत (और); आनन्दः = आनन्द देनेकी शक्ति, इति = बनकर स्थित है, आकाशे = (तथा) आकाशमें; सर्वम् इति = सबका आधार बनकर स्थित है । व्याख्या-दसवें अनुवाकके इस अंशमें परमेश्वरकी विभूतियोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया है । भाव यह है कि सत्यरूप वाणीमें आशीर्वादादिके द्वारा जो रक्षा करनेकी शक्ति प्रतीत होती है, उसके रूपमें वहाँ परमात्माकी ही स्थिति है । प्राण और अपानमें जो जीवनोपयोगी वस्तुओंको आकर्षण करनेकी और जीवन-रक्षाकी शक्ति है, वह भी परमात्माका ही अंश है । इसी प्रकार हाथोंमें काम करनेकी शक्ति, पैरोंमें चलनेकी शक्ति और गुदामें मलत्याग करनेकी शक्ति भी परमात्माकी ही हैं । ये सब शक्तियाँ उन परमेश्वरकी शक्तिका ही एक अंश हैं । यह देखकर मनुष्यको परमेश्वरकी सत्तापर विश्वास करना चाहिये । यह मानुषी समाज्ञा बतायी गयी है, अर्थात् मनुष्यके शरीरमें प्रतीत होनेवाली परमात्माकी शक्तियोंका संक्षेपमे दिग्दर्शन कराया गया है । इसीको आध्यात्मिक (शरीर-सम्बन्धी) उपासना भी कह सकते हैं । इसी प्रकार दैवी पदार्थोंमें अभिव्यक्त होनेवाली शक्तिका वर्णन करते हैं । यह दैवी अथवा आधिदैविक उपासना है। वृष्टिमें जो अन्नादिको उत्पन्न करने तथा जल-प्रदानके द्वारा सबको तृप्त करनेकी शक्ति है, बिजलीमें जो बल (पावर) है, पशुओमे जो स्वामीका यश बढानेकी शक्ति है, नक्षत्रोंमें अर्थात् सूर्य, चन्द्रमा और तारागणोंमें जो प्रकाश है, उपस्थमें जो संतानोत्पादनकी शक्ति, वीर्यरूप अमृत* और आनन्द देनेकी शक्ति है तथा आकाशमें जो सबको धारण करनेकी और सर्वव्यापकताकी एवं अन्य सब प्रकारकी शक्ति है—ये सब उन परमेश्वरकी अचिन्त्य एव अपार शक्तिके ही किसी एक अंशकी अभिव्यक्तियाँ हैं । गीतामे भी कहा है कि इस जगत्में जो कुछ भी विभूति, शक्ति और शोभासे युक्त है, वह मेरे ही तेजका एक अंश है (गीता १० । ४१) । इन सबको देखकर मनुष्यको सर्वत्र एक परमात्माकी व्यापकताका रहस्य समझना चाहिये । सम्बन्ध-अब विविध भावनासे की जानेवाली उपासनाका फलसहित वर्णन करते हैं— तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति । तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद् ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद् ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत । पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । तत् = वह (उपास्यदेव); प्रतिष्ठा = 'प्रतिष्ठा' (सबका आधार) है; इति = इस प्रकार, उपासीत = (उसकी) उपासना करे तो; प्रतिष्ठावान् भवति = साधक प्रतिष्ठावाला हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव); महः = सबमे महान् है, इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उपासना करे तो, महान् = महान्, भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), मनः = 'मन' है, इति = इस प्रकार समझकर; उपासीत = उसकी उपासना करे तो; (ऐसा उपासक) मानवान् = मनन- शक्तिसे सम्पन्न; भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), नमः = 'नमः' (नमस्कारके योग्य) है; इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, अस्मै = ऐसे उपासकके लिये, कामाः = समस्त काम—भोग पदार्थ; नम्यन्ते = विनीत हो जाते हैं, तत् = वह (उपास्यदेव); ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, (ऐसा उपासक) ब्रह्मवान् = ब्रह्मसे युक्त, भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), ब्रह्मणः = परमात्माका; परिमरः = सबको मारनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी है, इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, एनम् परि = ऐसे उपासकके प्रति, द्विषन्तः = द्वेष रखनेवाले; सपत्नाः = शत्रु, म्रियन्ते = मर जाते हैं;
- शरीरका रक्षक एव पोषक तथा जीवनका आधार होनेसे वीर्यको अमृत कहा गया है । इसकी सावधानीके साथ रक्षा करनेसे अमृतत्वकी प्राप्ति भी सम्भव है ।
३६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ये = जो, परि = (उसका) सब प्रकारसे, अप्रियाः भ्रातृव्याः = अनिष्ट चाहनेवाले अप्रिय बन्धुजन हैं, [ ते अपि म्रियन्ते = वे भी मर जाते हैं।] व्याख्या-इस मन्त्रमे सकाम उपासनाका भिन्न-भिन्न फल बताया गया है। भाव यह है कि प्रतिष्ठा चाहनेवाला पुरुष अपने उपास्यदेवकी प्रतिष्ठाके रूपमे उपासना करे, अर्थात् 'वे उपास्यदेव ही सब की प्रतिष्ठा-सबके आधार हैं' इस भावसे उनका चिन्तन करे। ऐसे उपासककी संसारमे प्रतिष्ठा होती है। महत्त्वकी प्राप्तिके लिये यदि अपने उपास्यदेवको 'महान्' समझकर उनकी उपासना करे तो वह महान् हो जाता है—महत्त्वको प्राप्त कर लेता है। यदि अपने उपास्यदेवको महान् मनस्वी समझकर मनन करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे तो वह साधक मनन करनेकी विशेष शक्ति प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार जो अपने उपास्यदेवको नमस्कार करनेयोग्य शक्तिशाली समझकर वैसी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे, वह स्वयं नमस्कार करनेयोग्य बन जाता है, समस्त कामनाएँ उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। समस्त भोग अपने-आप उसके चरणोंमें लोटने लगते हैं। अनायास ही उसे समस्त भोग-सामग्री प्राप्त हो जाती है। तथा जो अपने उपास्यदेवको सबसे बड़ा-सर्वाधार ब्रह्म समझकर उन्हींकी प्राप्तिके लिये उनकी उपासना करे, वह ब्रह्मवान् बन जाता है, अर्थात् सर्वशक्तिमान् परमेश्वर उसके अपने बन जाते हैं—उसके वशमे हो जाते हैं। जो अपने उपास्यदेवको ब्रह्मके द्वारा सबका सहार करनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी देवता समझकर उनकी उपासना करता है, उससे द्वेष करनेवाले शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं तथा जो उसके अपकारी एवं अप्रिय बन्धुजन होते हैं, वे भी मारे जाते हैं। वास्तवमे किसी भी रूपमें किसी भी उपास्यदेवकी उपासना की जाय, वह प्रकारान्तरसे उन परब्रह्म परमेश्वरकी ही उपासना है, परतु सकाम मनुष्य अज्ञानवश इस रहस्यको न जाननेके कारण भिन्न-भिन्न शक्तियोंसे युक्त भिन्न-भिन्न देवताओंकी भिन्न-भिन्न कामनाओंकी सिद्धिके लिये उपासना करते हैं, इसलिये वे वास्तविक लाभसे वञ्चित रह जाते हैं (गीता ७। २१, २२, २३, २४; ९। २२, २३)। अतः मनुष्यको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर सब देवोंके देव सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासना उन्हींकी प्राप्तिके लिये करे, उनसे और कुछ न चाहे। सम्बन्ध-सर्वत्र एक ही परमात्मा परिपूर्ण हैं, इस बातको समझकर उन्हें प्राप्त कर लेनेका फल और प्राप्त करनेवालेकी स्थितिका वर्णन करते हैं— स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। सय एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुप- संक्राम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं विज्ञानमयमात्मानमुप- संक्राम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्राम्य । इमाँल्लोकान्कामान्नी कामरूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते । सः = वह (परमात्मा); यः = जो; अयम् = यह; पुरुषे = इस मनुष्यमें है, च = तथा; यः = जो, असौ = वह; आदित्ये च = सूर्यमें भी है, सः = वह (दोनोंका अन्तर्यामी); एकः = एक ही है; यः = जो (मनुष्य), एवंवित् = इस प्रकार तत्त्वसे जाननेवाला है; सः = वह, अस्मात् = इस; लोकात् = लोक (शरीर) से; प्रेत्य = उत्क्रमण करके; एतम् = इस, अन्नमयम् = अन्नमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर, एतम् = इस, प्राणमयम् = प्राणमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; एतम् = इस, मनोमयम् = मनोमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर, एतम् = इस; विज्ञानमयम् = विज्ञानमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; एतम् = इस; आनन्दमयम् = आनन्दमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; कामान्नी = इच्छानुसार भोगवाला; (और) कामरूपी = इच्छानुसार रूपवाला हो जाता है, (तथा) इमान् = इन, लोकान् अनुसंचरन् = सब लोकोंमें विचरता हुआ; एतत् = इस (आगे बताये हुए ); साम गायन् = साम (समतायुक्त उद्गारों) का गायन करता; आस्ते = रहता है। —वे परमात्मा, जिनका वर्णन पहले सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण कहकर किया जा चुका
३ तैत्तिरीयोपनिषद् * ३६१ है और जो परमानन्दस्वरूप है, वे इस पुरुषमे अर्थात् मनुष्यमे और सूर्यमे एक ही है। अभिप्राय यह कि सम्पूर्ण प्राणियोंमे अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एक ही परमात्मा है। नाना रूपोंमे उन्हीकी अभिव्यक्ति हो रही है। जो मनुष्य इस तत्त्व- को जान लेता है, वह वर्तमान शरीरसे अलग होनेपर उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, जिनका वर्णन अन्नमय आत्मा, प्राणमय आत्मा, मनोमय आत्मा, विज्ञानमय आत्मा और आनन्दमय आत्माके नामसे पहले किया गया है। इन सबको पाकर अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म भेदसे जो एककी अपेक्षा एकके अन्तरात्मा होकर नाना रूपोंमे स्थित हे और सबके अन्तर्यामी परमानन्दस्वरूप हैं, उनको प्राप्त करके मनुष्य पर्याप्त भोग-सामग्रीसे युक्त और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। साथ ही वह इन लोकोमे विचरता हुआ आगे बताये जानेवाले साम ( समतायुक्त भावो ) का गान करता रहता है। सम्बन्ध-उसके आनन्दमग्न मनम जो समता और सर्वरूपताके भाव उठा करते हैं, उनका वर्णन करते हैं- हा३वु हा३वु हा३वु । अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादो३ऽहमन्नादो३ऽहमन्नादः । अहग्ँश्लोककृदहग्ँश्लोककृदहग्ँश्लोककृत् । अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य । पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भायि। यो मा ददाति स इदेव मा३वाः। अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म् । सुवर्णं ज्योतीः । य एवं वेद । इत्युपनिषत् । हावु हावु हावु = आश्चर्य ! आश्चर्य !! आश्चर्य !II; अहम् = मै, अन्नम् = अन्न हूँ, अहम् = मं; अन्नम् = अन्न हूँ; अहम् = मै; अन्नम् = अन्न हूँ; अहम् = मैं ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ; अहम् = मै ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ, अहम् = मैं ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ; अहम् = मैं, श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ; अहम् = मैं, श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ, अहम् = मैं; श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ, अहम् = मैं, ऋतस्य = सत्यका अर्थात् प्रत्यक्ष दीखने- वाले जगत्की अपेक्षासे, प्रथमजाः = सबमें प्रधान होकर उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ), [च = और,] देवेभ्यः = देवताओंसे भी; पूर्वम् = पहले विद्यमान, अमृतस्य = अमृतका, नाभायि (नाभिः) = केन्द्र, अस्मि = हूँ, यः = जो कोई, मा = मुझे; ददाति = देता है, सः = वह, इत् = इस कार्यसे, एव = ही, मा आवाः = मेरी रक्षा करता है, अहम् = मे, अन्नम् = अन्नस्वरूप होकर, अन्नम् = अन्न, अदन्तम् = खानेवालेको, अद्मि = निगल जाता हूँ, अहम् = मै, विश्वम् = समस्त; भुवनम् अभ्यभवाम् = ब्रह्माण्डका तिरस्कार करता हूँ, सुवः न ज्योतीः = मेरे प्रकाशकी एक झलक सूर्यके समान है, यः = जो, एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है (उसे भी यही स्थिति प्राप्त होती है), इति = इस प्रकार, उपनिषत् = यह उपनिषद्-ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । व्याख्या-उस महापुरुषकी स्थिति शरीरमे नहीं रहती । वह शरीरसे सर्वथा ऊपर उठकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है । यह बात पहले कहकर उसके बाद इस साम-गानका वर्णन किया गया है। इससे यह प्रकट होता है कि परमात्मा- के साथ एकताकी प्राप्ति कर लेनेवाले महापुरुषके ये पावन उद्गार उसके विशुद्ध अन्तःकरणसे निकले हैं और उसकी अलौकिक महिमा सूचित करते हे । 'हावु' पद आश्चर्यबोधक अव्यय है। वह महापुरुष कहता है-बड़े आश्चर्यकी बात है ! ये सम्पूर्ण भोग वस्तुएँ, इनको भोगनेवाला जीवात्मा और इन दोनोंका संयोग करानेवाला परमेश्वर एक मैं ही हूँ। मै ही इस प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्में समस्त देवताओंसे पहले सबमें प्रधान होकर प्रकट होनेवाला ब्रह्मा हूँ, और परमानन्दरूप अमृतके केन्द्र परब्रह्म परमेश्वर भी मुझसे अभिन्न है, अतः वे भी मै ही हूँ । जो कोई मनुष्य किसी भी वस्तुके रूपमे मुझे किसीको प्रदान करता है, वह मानो मुझे देकर मेरी रक्षा करता है । अर्थात् योग्य पात्रमें भोग्य पदार्थोंका दान ही उनकी रक्षाका सर्वोत्तम उपाय है । इसके विपरीत जो अपने ही लिये अन्नरूप समस्त भोगोंका उपभोग करता है, उस खानेवालेको मैं अन्नरूप होकर निगल जाता हूँ। अर्थात् उसका विनाश हो जाता है-उसकी भोग-सामग्री टिकती नही। मैं समस्त ब्रह्माण्डका तिरस्कार करनेवाला हूँ। मेरी महिमाकी तुलनामें यह सब तुच्छ है । मेरे प्रकाशकी एक झलक भी सूर्यके समान है। अर्थात् जगत्मे जितने भी प्रकाशयुक्त पदार्थ हैं, वे सब मेरे ही तेज- उ० अ० ४६-
॥ भृगुवल्ली समाप्त ॥ ३ ॥
३६२ ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ के अंश हैं। जो कोई इस प्रकार परमात्माके तत्त्वको जानता है, वह भी इसी स्थितिको प्राप्त कर लेता है। उपर्युक्त कथन परमात्मामे एकीभावसे स्थित होकर परमात्माकी दृष्टिसे है, यह समझना चाहिये । ॥ दशम अनुवाक समाप्त ॥ १० ॥ ॥ भृगुवल्ली समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् । तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् । आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ शिक्षावल्लीके द्वादश अनुवाकमे दिया गया है।
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कल्याण वरुण और भृगु [जगत्कारण-मीमांसा]
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्वे ाश्व रोपनि दू शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ कठोपनिषद्के आरम्भमें दिया गया है। प्रथम अध्याय हरिः ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति- किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १ ॥ 'हरिः ओम्' इस प्रकार परमात्माके नामका उच्चारण करके उस परब्रह्म परमेश्वरका स्मरण करते हुए यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है- ब्रह्मवादिनः = ब्रह्मविषयक चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु, वदन्ति = आपसमें कहते हैं; ब्रह्मविदः = हे वेदज्ञ महर्षियो; कारणम् = इस जगत्का मुख्य कारण, ब्रह्म = ब्रह्म, किम् = कौन है; कुतः = ( हमलोग ) किससे; जाताः स्म = उत्पन्न हुए हैं; केन = किससे; जीवाम = जी रहे हैं; च = और, क्व = किसमें, सम्प्रतिष्ठाः = हमारी सम्यक् प्रकारसे स्थिति है, ( तथा ) केन अधिष्ठिताः = किसके अधीन रहकर, [ वयम् = हमलोग, ] सुखेतरेषु = सुख और दुःखोंमें, व्यवस्थाम् = निश्चित व्यवस्थाके अनुसार; वर्तामहे = वर्त रहे हैं ॥ १ ॥ व्याख्या-परब्रह्म परमात्माको जानने और प्राप्त करनेके लिये उनकी चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु पुरुष आपसमें कहने लगे-'हे वेदज्ञ महर्षिगण ! हमने वेदोंमें पढ़ा है कि इस समस्त जगत्के कारण ब्रह्म हैं; सो वे ब्रह्म कौन हैं ? हम सब लोग किससे उत्पन्न हुए हैं-हमारा मूल क्या है ? किसके प्रभावसे हम जी रहे हैं-हमारे जीवनका आधार कौन है ? और हमारी पूर्णतया स्थिति किसमें है ? अर्थात् हम उत्पन्न होनेसे पहले-भूतकालमें, उत्पन्न होनेके बाद-वर्तमानकालमें और इसके पश्चात्-प्रलयकालमें किसमें स्थित रहते हैं ? हमारा परम आश्रय कौन है ? तथा हमारा अधिष्ठाता-हमलोगोंकी व्यवस्था करनेवाला कौन है ? जिसकी रची हुई व्यवस्थाके अनुसार हमलोग सुख-दुःख दोनों भोग रहे हैं, वह इस सम्पूर्ण जगत्की सुव्यवस्था करनेवाला इसका संचालक स्वामी कौन है ?'* ॥ १ ॥ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या । संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥
- इस प्रकार परब्रह्म परमात्माकी खोज करना, उन्हें जानने और पानेके लिये उत्कट अभिलाषाके साथ उत्साहपूर्वक आपसमें विचार करना, परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंसे उनके विषयमें विनयभाव और श्रद्धापूर्वक पूछना, उनकी बतायी हुई बातोंको ध्यानपूर्वक सुनकर काममें लाना-इसीका नाम 'सत्सङ्ग' है। इस उपनिषद्के प्रथम मन्त्रमें सत्सङ्गका ही वर्णन है। इससे सत्सङ्गकी अनादिता और अलौकिक महत्ता सूचित होती है।
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
३६५ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
(क्या) कालः = काल, स्वभावः = स्वभाव, नियतिः = निश्चित फल देनेवाला कर्म, यदृच्छा = आकस्मिक घटना;
भूतानि = पाँचों महाभूत, (या) पुरुषः = जीवात्मा योनिः = कारण हैं, इति चिन्त्या = इसपर विचार करना
चाहिये; एषाम् = इन काल आदिका, संयोगः = समुदाय, तु = भी, न = इस जगत्का कारण नहीं हो सकता;
आत्मभावात् = क्योंकि वे चेतन आत्माके अधीन हैं (जड होनेके कारण स्वतन्त्र नहीं हैं), आत्मा = जीवात्मा, अपि =
भी; [न=इस जगत्का कारण नहीं हो सकता,] सुखदुःखहेतोः = (क्योंकि वह) सुख-दुःखोंके हेतुभूत प्रारब्धके;
अनीशः = अधीन है ॥ २ ॥
व्याख्या—वे कहने लगे कि वेद-शास्त्रोंमें अनेक कारणोंका वर्णन आता है। कहीं तो कालको कारण बताया है;
क्योंकि किसी-न-किसी समयपर ही वस्तुओंकी उत्पत्ति देखी जाती है, जगत्की रचना और प्रलय भी कालके ही अधीन सुने
जाते हैं। कहीं स्वभावको कारण बताया जाता है, क्योंकि बीजके अनुरूप ही वृक्षकी उत्पत्ति होती है—जिस वस्तुमें जो
स्वाभाविक शक्ति है, उसीसे उसका कार्य उत्पन्न होता देखा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि वस्तुगत शक्तिरूप जो
स्वभाव है, वह कारण है। कहीं कर्मको कारण बताया है, क्योंकि कर्मानुसार ही जीव भिन्न-भिन्न योनियोंमें भिन्न-भिन्न
स्वभाव आदिसे युक्त होकर उत्पन्न होते हैं। कहीं आकस्मिक घटनाको अर्थात् होनहार (भवितव्यता) को कारण बताया
है। कहीं पाँचों महाभूतोंको और कहीं जीवात्माको जगत्का कारण बताया गया है। अतः हमलोगोंको विचार करना चाहिये
कि वास्तवमें कारण कौन है। विचार करनेसे समझमें आता है कि कालसे लेकर पाँच महाभूतोंतक बताये हुए जड
पदार्थोंमेंसे कोई भी जगत्का कारण नहीं है। वे अलग-अलग तो क्या सब मिलकर भी जगत्के कारण नहीं हो सकते;
क्योंकि ये सब जड होनेके कारण चेतनके अधीन हैं। इनमें स्वतन्त्र कार्य करनेकी शक्ति नहीं है। जिन जड वस्तुओंके मेलसे
कोई नयी चीज उत्पन्न होती है, वह उनके संचालक चेतन आत्माके ही अधीन और उसीके भोगार्थ होती है। इनके सिवा,
पुरुष अर्थात् जीवात्मा भी जगत्का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह सुख-दुःखके हेतुभूत प्रारब्धके अधीन है, वह भी
स्वतन्त्ररूपसे कुछ नहीं कर सकता। अतः कारण तत्त्व कुछ और ही है ॥ २ ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार विचार करके उन्होंने क्या निर्णय किया-इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।
यः कारणानि निखिलाने तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३ ॥
ते = उन्होंने, ध्यानयोगानुगताः = ध्यानयोगमें स्थित होकर स्वगुणैः = अपने गुणोंसे; निगूढाम् = ढकी हुई,
देवात्मशक्तिम् अपश्यन् = (उन) परमात्मदेवकी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिका साक्षात्कार किया, यः = जो (परमात्मदेव);
एकः = अकेला ही, तानि = उन, कालात्मयुक्तानि = कालसे लेकर आत्मातक (पहले बताये हुए), निखिलानि =
सम्पूर्ण, कारणानि अधितिष्ठति = कारणोंपर शासन करता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—इस प्रकार आपसमें विचार करनेपर जब युक्तियोंद्वारा और अनुमानसे वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच
सके, तब वे सब ध्यानयोगमें स्थित हो गये अर्थात् अपने मन और इन्द्रियोंको बाहरके विषयोंसे हटाकर परब्रह्मको
जाननेके लिये उन्हींका चिन्तन करनेमें तत्पर हो गये। ध्यान करते-करते उन्हें परमात्माकी महिमाका अनुभव हुआ।
उन्होंने उन परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी स्वरूपभूत अचिन्त्य दिव्य शक्तिका साक्षात्कार किया, जो अपने ही गुणोंसे—
सत्त्व, रज, तमसे ढकी है, अर्थात् जो देखनेमें त्रिगुणमयी प्रतीत होती है, परंतु वास्तवमें तीनों गुणोंसे परे है। तब वे इस
निर्णयपर पहुँचे कि कालसे लेकर आत्मातक जितने कारण पहले बताये गये हैं, उन समस्त कारणोंके जो अधिष्ठाता—स्वामी
हैं, अर्थात् वे सब जिनकी आज्ञा और प्रेरणा पाकर, जिनकी उस शक्तिके किसी एक अंशको लेकर अपने-अपने कार्योंके करनेमें
समर्थ होते हैं, वे एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ही इस जगत्के वास्तविक कारण हैं; दूसरा कोई नहीं है ॥ ३ ॥
तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥
तम् = उस, एकनेमिम् = एक नेमिवाले, त्रिवृतम् = तीन घेरोवाले, षोडशान्तम् = सोलह सिरोंवाले, शतार्धारम् =
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३६५ पचास अरोंवाले; विंशतिप्रत्यराभिः = बीस सहायक अरोंसे, (तथा) षड्भिः अष्टकैः = छः अष्टकोंसे, [ युक्तम् = युक्त ;] विश्वरूपैकपाशम् = अनेक रूपोंवाले एक ही पाशसे युक्त; त्रिमार्गभेदम् = मार्गके तीन भेदोंवाले, (तथा) द्विनिमित्तैक- मोहम् = दो निमित्त और मोहरूपी एक नाभिवाले (चक्रको), [ अपश्यन् = उन्होंने देखा ] ॥ ४ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें विश्वका चक्रके रूपमें वर्णन किया गया है। भाव यह है कि परम देव परमेश्वरकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिका दर्शन करनेवाले वे ऋषिलोग कहते हैं—हमने एक ऐसे चक्रको देखा है, जिसमें एक नेमि है । नेमि उस गोल घेरेको कहते हैं, जो चक्रके अरों और नाभि आदि सब अवयवोंको वेष्टित किये रहती है तथा यथास्थान बनाये रखती है । यहाँ अव्याकृत प्रकृतिको ही 'नेमि' कहा गया है; क्योंकि वही इस व्यक्त जगत्का मूल अथवा आधार है । जिस प्रकार चक्केकी रक्षाके लिये उस नेमिके ऊपर लोहेका घेरा (हाल) चढा रहता है, उसी प्रकार इस संसार-चक्रकी अव्याकृत प्रकृतिरूप नेमिके ऊपर सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही तीन घेरे हैं। यह पहले ही कह आये हैं कि भगवान्की वह अचिन्त्यशक्ति तीन गुणोंसे ढकी है। जिस प्रकार चक्केकी नेमि अलग-अलग सिरोंके जोड़से बनती है, उसी प्रकार इस संसाररूप चक्रकी प्रकृतिरूप नेमिके मन, बुद्धि और अहङ्कार तथा आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये आठ सूक्ष्म तत्त्व और इनके ही आठ स्थूल रूप—इस प्रकार सोलह सिरे हैं। जिस प्रकार चक्रमें अरे लगे रहते हैं, जो एक ओरसे नेमिके टुकड़ोंमें जुड़े रहते हैं और दूसरी ओरसे चक्केकी नाभिमें जुड़े होते हैं, उसी प्रकार इस संसार-चक्रमें अन्तःकरणकी वृत्तियोंके पचास भेद तो पचास अरोंकी जगह हैं और पाँच महाभूतोंके कार्य— दस इन्द्रियाँ, पाँच विषय और पाँच प्राण—ये बीस सहायक अरोंकी जगह हैं। इस चक्रमें आठ-आठ चीजों* के छ. समूह अङ्गरूपमें विद्यमान हैं। इन्हींको छः अष्टकोंके नामसे कहा गया है। जीवोंको इस चक्रमें बाँधकर रखनेवाली अनेक रूपोंमें प्रकट आसक्तिरूप एक फाँसी है । देवयान, पितृयान और इसी लोकमें एक योनिसे दूसरी योनिमें जानेका मार्ग— इस प्रकार ये तीन मार्ग हैं। पुण्यकर्म और पापकर्म—ये दो इस जीवको इस चक्रके साथ-साथ घुमानेमें निमित्त हैं और जिसमें अरे टँगे रहते हैं, उस नाभिके स्थानमें अज्ञान है। जिस प्रकार नाभि ही चक्केका केन्द्र है, उसी प्रकार अज्ञान इस जगत्का केन्द्र है ॥ ४ ॥ पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्रां पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् । पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥ पञ्चस्रोतोऽम्बुम् = पाँच स्रोतोंसे आनेवाले विषयरूप जलसे युक्त; पञ्चयोन्युग्रवक्राम् = पाँच स्थानोंसे उत्पन्न होकर भयानक और टेढी-मेढी चालसे चलनेवाली; पञ्चप्राणोर्मिम् = पाँच प्राणरूप तरङ्गोंवाली, पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् = पाँच प्रकारके. ज्ञानके आदि कारण मन ही है मूल जिसका, पञ्चावर्ताम् = पाँच भँवरोंवाली, पञ्चदुःखौघवेगाम् = पाँच दुःख रूप प्रवाहके वेगसे युक्त, पञ्चपर्वाम् = पाँच पर्वोंवाली, (और) पञ्चाशद्भेदां = पचास भेदोंवाली (नदीको), अधीमः = हमलोग जानते हैं ॥ ५ ॥
- यहाँ 'अष्टक' शब्दसे क्या अभिप्राय है, ठीक-ठीक पता नहीं चलता । चक्रोंमें भी 'अष्टक' नामका कोई अङ्ग होता है या नहीं, और यदि होना है तो उसका क्या स्वरूप होता है तथा उसे अष्टक क्यों कहते हैं—इसका भी कोई पता नहीं चलता । शाङ्करभाष्यमें भी 'अष्टक' किसे कहते हैं—यह खोलकर नहीं बताया गया । इसीलिये 'षडष्टकम्' पदकी व्याख्या नहीं की जा सकी । शाङ्करभाष्यके अनुसार छ अष्टक इस प्रकार हैं— ( १ ) गीता ( ७ । ४ ) में उल्लिखित आठ प्रकारकी प्रकृति अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार, ( २ ) शरीरगत आठ धातुएँ अर्थात् त्वचा, चमड़ी, मांस, रक्त, मेद, हड्डी, मज्जा और वीर्य, ( ३ ) अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व—ये आठ प्रकारके ऐश्वर्य, ( ४ ) धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य ( राग ) और अनैश्वर्य—ये आठ भाव, ( ५ ) ब्रह्मा, प्रजापति, देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर और पिशाच—ये आठ प्रकारकी देवयोनियाँ, और ( ६ ) समस्त प्राणियोंके प्रति दया, क्षमा, अनसूया ( निन्दा न करना ), शौच ( बाहर-भीतरकी पवित्रता ), अनायास, मङ्गल, अकृपणता ( उदारता ) और अस्पृहा—ये आत्माके आठ गुण ।
३६६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—इस मन्त्रमें संसारका नदीके रूपमें वर्णन किया गया है। वे ब्रह्मज्ञ ऋषि कहते हैं—हम एक ऐसी नदीको देख रहे हैं, जिसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही पाँच स्रोत हैं। संसारका ज्ञान हमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा ही होता है, इन्हींमेंसे होकर संसारका प्रवाह बहता है। इसीलिये इन्द्रियोंको यहाँ स्रोत कहा गया है। ये इन्द्रियाँ पञ्च सूक्ष्मभूतों (तन्मात्रों) से उत्पन्न हुई हैं, इसीलिये इस नदीके पाँच उद्गमस्थान माने गये हैं। इस नदीका प्रवाह बड़ा ही भयंकर है। इसमें गिर जानेसे बार-बार जन्म-मृत्युका क्लेश उठाना पड़ता है। संसारकी चाल बड़ी टेढ़ी है, कपटसे भरी है। इसमेंसे निकलना कठिन है। इसीलिये इस संसाररूप नदीको वक्र कहा गया है। जगत्के जीवोंमें जो कुछ भी चेष्टा--हलचल होती है, वह प्राणोंके द्वारा ही होती है। इसीलिये प्राणोंको इस भव-सरिताकी तरङ्गमाला कहा गया है। नदीमे हलचल तरङ्गोंसे ही होती है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा होनेवाले चाक्षुष आदि पाँच प्रकारके ज्ञानोंका आदि कारण मन है, जितने भी ज्ञान हैं, सब मनकी ही तो वृत्तियाँ हैं। मन न हो तो इन्द्रियोंके सचेष्ट रहनेपर भी किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होता। यह मन ही संसाररूप नदीका मूल है। मनसे ही संसारकी सृष्टि होती है। सारा जगत् मनकी ही कल्पना है। मनके अमन हो जानेपर— नाश हो जानेपर जगत्का अस्तित्व ही नहीं रहता। जबतक मन है; तभीतक संसार है। इन्द्रियोंके शब्द-स्पर्श आदि पाँच विषय ही इस संसाररूप नदीमे आवर्त अर्थात् भँवर हैं। इन्हींमें फँसकर जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ जाता है। गर्भका दुःख, जन्मका दुःख, बुढ़ापेका दुःख, रोगका दुःख और मृत्युका दुःख—ये पाँच प्रकारके दुःख ही इस नदीके प्रवाहमें वेगरूप हैं। इन्हींके थपेड़ोंसे जीव व्याकुल रहता है और इस योनिसे उस योनिमें भटकता रहता है। अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहङ्कार), राग (प्रियबुद्धि), द्वेष (अप्रियबुद्धि) और अभिनिवेश (मृत्युभय)—ये पञ्चविध क्लेश ही इस संसाररूप नदीके पाँच पर्व अर्थात् विभाग हैं। इन्हीं पाँच विभागोंमें यह जगत् बँटा हुआ है। इन पाँचोंका समुदाय ही संसारका स्वरूप है और अन्तःकरणकी पचास वृत्तियाँ ही इस नदीके पचास भेद अर्थात् भिन्न-भिन्न रूप हैं। अन्तः- करणकी वृत्तियोंको लेकर ही संसारमें भेदकी प्रतीति होती है॥ ५॥ सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे। पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६ ॥ अस्मिन्= इस; सर्वाजीवे= सबके जीविकारूप; सर्वसंस्थे=सबके आश्रयभूत; बृहन्ते=विस्तृत; ब्रह्मचक्रे=ब्रह्मचक्रमें; हंसः=जीवात्मा, भ्राम्यते=घुमाया जाता है; [ सः=वह; ] आत्मानम्=अपने आपको, च=और; प्रेरितारम्=सबके प्रेरक परमात्माको; पृथक्=अलग-अलग; मत्वा=जानकर, ततः=उसके बाद; तेन=उस परमात्मासे; जुष्टः=स्वीकृत होकर; अमृतत्वम्=अमृतभावको, एति=प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या—जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, जो सबके जीवननिर्वाहका हेतु है और जो समस्त प्राणियोंका आश्रय है, ऐसे इस जगद्रूप ब्रह्मचक्रमें अर्थात् परब्रह्म परमात्माद्वारा संचालित तथा परमात्माके ही विराट् शरीररूप संसारचक्रमें यह जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उन परमात्माद्वारा घुमाया जाता है। जबतक यह इसके सञ्चालकको जानकर उनका कृपापात्र नहीं बन जाता, अपनेको उनका प्रिय नहीं बना लेता, तबतक इसका इस चक्रसे छुटकारा नहीं हो सकता । जब यह अपनेको और सबके प्रेरक परमात्माको भलीभाँति पृथक्-पृथक् समझ लेता है कि उन्हींके घुमानेसे मैं इस संसार-चक्रमें घूम रहा हूँ और उन्हींकी कृपासे छूट सकता हूँ, तब वह उन परमेश्वरका प्रिय बनकर उनके द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है (कठ० २। २३; मुण्डक० ३।२।३)। और फिर तो वह अमृतभावको प्राप्त हो जाता है, जन्म-मरणरूप संसार-चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। परम शान्ति एव सनातन दिव्य परमधामको प्राप्त हो जाता है (गीता १८। ६१-६२)॥ ६॥ उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च। अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः॥७॥ एतत्= यह; उद्गीतम्=वेदवर्णित, परमम् ब्रह्म=परब्रह्म; तु=ही, सुप्रतिष्ठा=सर्वश्रेष्ठ आश्रय, च=और; अक्षरम्=अविनाशी है; तस्मिन्=उसमें; त्रयम्=तीनों लोक स्थित हैं; ब्रह्मविदः=वेदके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुष; अत्र=यहाँ (हृदयमें); अन्तरम्=अन्तर्यामीरूपसे स्थित उस ब्रह्मको; विदित्वा=जानकर; तत्पराः=उसीके परायण हो; ब्रह्मणि=उस परब्रह्ममें; लीनाः=लीन होकर; योनिमुक्ताः=सदाके लिये जन्म-मृत्युसे मुक्त हो गये॥ ७॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३६७ व्याख्या—जिनकी महिमाका वेदोंमें गान किया गया है, जो परब्रह्म परमात्मा सबके सर्वोत्तम आश्रय हैं, उन्हींमें तीनो लोकोंका समुदायरूप समस्त विश्व स्थित है। वे ही ऊपर बताये हुए सबके प्रेरक, कभी नाश न होनेवाले परम अक्षर, परम देव हैं। जिन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्माकी दिव्यशक्तिका दर्शन किया था, वे वेदके रहस्यको समझनेवाले ऋषिलोग उन सबके प्रेरक परमात्माको यहाँ—अपने हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान समझकर, उन्हींकेपरायण होकर अर्थात् सर्वतोभावसे उनकी शरणमे जाकर, उन्हींमें लीन हो गये और सदाके लिये जन्म मरणरूप योनिसे मुक्त हो गये। उनके मार्ग- का अनुसरण करके हम सब लोग भी उन्हींकी भाँति जन्म मरणसे छूटकर परमात्मामे लीन हो सकते है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—अब उन परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके उन्हें जाननेका फल बताया जाता है— संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः । अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावाज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ८॥ क्षरम् = विनाशशील जडवर्ग; च=एव; अक्षरम्=अविनाशी जीवात्मा; संयुक्तम्=(इन दोनोके) सयुक्त रूप; व्यक्ताव्यक्तम्=व्यक्त और अव्यक्तरूप; एतत् विश्वम्=इस विश्वका; ईशः=परमेश्वर ही; भरते=धारण और पोषण करता है; च=तथा; आत्मा=जीवात्मा; [भोक्तृभावात्=इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण; अनीशः=प्रकृतिके अधीन हो; बध्यते=इसमे बँध जाता है; (और) देवम्=उस परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशैः=सब प्रकारके बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ व्याख्या—विनाशशील जडवर्ग, जिसे भगवान्की अपरा प्रकृति तथा क्षर-तत्त्व कहा गया है और भगवान्की परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो अक्षरतत्त्वके नामसे पुकारा जाता है—इन दोनोंके सयोगसे बने हुए, प्रकट और अप्रकट रूपमें स्थित इस समस्त जगत्का वे परमपुरुष पुरुषोत्तम ही धारण-पोषण करते हैं, जो सबके स्वामी, सबके प्रेरक तथा सबका यथायोग्य सञ्चालन और नियमन करनेवाले परमेश्वर हीं। जीवात्मा इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण प्रकृतिके अधीन हो इसके मोहजालमे फँसा रहता है, उन परमदेव परमात्माकी ओर दृष्टिपात नहीं करता। जब कभी यह उन सर्व- सुहृद् परमात्माकी अहैतुकी दयासे महापुरुषोंका सग पाकर उनको जाननेका अभिलाषी होकर पूर्ण चेष्टा करता है, तब उन परमदेव परमेश्वरको जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—पुन जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति—इन तीनोके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन करके, इस तत्त्वको जानकर उपासना करनेका फल दो मन्त्रोंद्वारा बताया जाता है— ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ॥ ९ ॥ ज्ञाज्ञौ=सर्वज्ञ और अज्ञानी; ईशनीशौ=सर्वसमर्थ और असमर्थ; द्वौ=ये दो; अजौ=अजन्मा आत्मा हैं; (तथा) भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता=भोगनेवाले जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग्य सामग्रीसे युक्त; हि=तथा; अजा=अनादि प्रकृति; एका=एक तीसरी शक्ति है, (इन तीनोंमें जो ईश्वग्तत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है;) हि=क्योंकि, आत्मा=वह परमात्मा; अनन्तः=अनन्त; विश्वरूपः=सम्पूर्ण रूपोंवाला; च=और; अकर्ता=कर्तापनके अभिमानसे रहित है; यदा=जब; (मनुष्य इस प्रकार) एतत् त्रयम्= ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनोंको; ब्रह्मम्=ब्रह्मरूपमे; विन्दते= प्राप्त कर लेता है (तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है) ॥ ९॥ व्याख्या—ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, जीव अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है; ये दोनों ही अजन्मा हैं। इनके सिवा एक तीसरी शक्ति भी अजन्मा है, जिसे प्रकृति कहते ह, यह भोक्ता जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग-सामग्री प्रस्तुत करती है। यद्यपि ये तीनों ही अजन्मा हैं—अनादि है, फिर भी ईश्वर शेष दो तत्त्वोसे विलक्षण हैं; क्योकि वे परमात्मा हैं, अनन्त हैं। सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप—विराट् शरीर है। वे सब कुछ करते हुए—सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति, पालन और सहार करते हुए भी वास्तवमे कुछ नहीं करते; क्योंकि वे कर्त्तापनके अभिमानसे रहित हैं। मनुष्य जब इस प्रकार इन तीनोंकी विलक्षणता और
३६८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * विभिन्नताको समझते हुए भी इन्हें ब्रह्मरूपमे उपलब्ध कर लेता है अर्थात् प्रकृति और जीव तो उन परमेश्वरकी प्रकृतियाँ है और परमेश्वर इनके स्वामी हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह सब प्रकारके बन्धनोसे मुक्त हो जाता है ॥ ९ ॥ क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥१०॥ प्रधानम् = प्रकृति तो, क्षरम् = विनाशशील है, हरः = इसको भोगनेवाला जीवात्मा; अमृताक्षरम् = अमृतस्वरूप अविनाशी है, क्षरात्मानौ = इन विनाशशील जड-तत्त्व और चेतन आत्मा—दोनोको; एकः = एक; देवः = ईश्वर; ईशते = अपने शासनमें रखता है; (इस प्रकार जानकर) तस्य = उसका; अभिध्यानात् = निरन्तर ध्यान करनेसे; योजनात् = मनको उसमे लगाये रहनेसे, च = तथा; तत्त्वभावात् = तन्मय हो जानेसे, अन्ते = अन्तमे (उसीको प्राप्त हो जाता है); भूयः = फिर, विश्वमायानिवृत्तिः = समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है ॥ १० ॥ व्याख्या—प्रकृति तो क्षर अर्थात् परिवर्तन होनेवाली, विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीवसमुदाय अविनाशी अक्षरतत्त्व है। इन क्षर और अक्षर (जड प्रकृति और चेतन जीवसमुदाय)—दोनों तत्त्वोंपर एक परमदेव परमेश्वर शासन करते हैं, वे ही प्राप्त करनेके और जाननेके योग्य हैं, उन्हें तत्त्वसे जानना चाहिये—इस प्रकार दृढ निश्चय करके उन परमदेव परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे, उन्हींमे रात दिन संलग्न रहनेसे और उन्हींमे तन्मय हो जानेसे अन्तमें यह उन्हींको पा लेता है। फिर इसके लिये सम्पूर्ण मायाकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है अर्थात् मायामय जगत्से इसका सम्बन्ध सर्वथा छूट जाता है ॥१०॥ सम्बन्ध—उन परमदेवको जाननेका फल पुन बताया जाता है— ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः । तस्याभिध्यानात्तृतीयं देहभेदे विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः ॥११॥ तस्य = उस परमदेवका, अभिध्यानात् = निरन्तर ध्यान करनेसे; देवम् = उस प्रकाशमय परमात्माको; ज्ञात्वा = जान लेनेपर, सर्वपाशापहानिः = समस्त बन्धनोंका नाश हो जाता है; (क्योंकि) क्लेशैः क्षीणैः = क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण, जन्ममृत्युप्रहाणिः = जन्म मृत्युका सर्वथा अभाव हो जाता है, (अतः वह) देहभेदे = शरीरका नाश होनेपर, तृतीयम् = तीसरे लोक (स्वर्ग) तकके, विश्वैश्वर्यम् [त्यक्त्वा] = समस्त ऐश्वर्यका त्याग करके, केवलः = सर्वथा विशुद्ध; आप्तकामः = पूर्णकाम हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या—परमपुरुष परमात्माका निरन्तर ध्यान करते करते जब साधक उन परमदेवको जान लेता है, तब इसके समस्त बन्धनोंका सदाके लिये सर्वथा नाश हो जाता है, क्योकि अविद्या, अस्मिता (अहकार), राग, द्वेष और मरणभय— इन पाँचो क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण उसके जन्म मरणका सदाके लिये अभाव हो जाता है। अतः वह फिर कभी बन्धनमे नहीं पड़ सकता। वह इस शरीरका नाश होनेपर तृतीय लोक अर्थात् स्वर्गके सबसे ऊँचे स्तर—ब्रह्मलोकतकके बड़े-से-बड़े समस्त ऐश्वर्योंका त्याग करके प्रकृतिसे वियुक्त, सर्वथा विशुद्ध कैवल्यपदको प्राप्त हो पूर्णकाम हो जाता है—उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती, क्योकि वह सम्पूर्ण कामनाओंका फल पा लेता है ॥ ११ ॥ एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् । भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥१२॥ आत्मसस्थम् = अपने ही भीतर स्थित, एतत् = इस ब्रह्मको; एव = ही, नित्यम् = सर्वदा, ज्ञेयम् = जानना चाहिये; हि = क्योंकि, अतः परम् = इससे बढकर, वेदितव्यम् = जाननेयोग्य तत्त्व, किञ्चित् = दूसरा कुछ भी, न = नहीं है, भोक्ता = भोक्ता (जीवात्मा), भोग्यम् = भोग्य (जडवर्ग), च = और, प्रेरितारम् = उनके प्रेरक परमेश्वर; मत्वा = (इन तीनोंको) जानकर, (मनुष्य) सर्वम् = सब कुछ (जान लेता है), एतत् = (इस प्रकार) यह, त्रिविधम् = तीन भेदोंमें, प्रोक्तम् = बताया हुआ ही, ब्रह्मम् = ब्रह्म है ॥ १२ ॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३६९ व्याख्या—ये परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तम अपने ही भीतर—हृदयमे अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इनको जाननेके लिये कहीं बाहर जानेकी आवश्यकता नहीं है। इन्हींको सदा जाननेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि इनसे बढ़कर जानने- योग्य दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। इन एकको जाननेसे ही सबका ज्ञान हो जाता है, ये ही सबके कारण और परमाधार हैं। मनुष्य भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (जड़वर्ग) और इन दोनोंके प्रेरक ईश्वरको जानकर सब कुछ जान लेता है। फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। जिनके ये तीन भेद बताये गये हैं, वे ही समग्र ब्रह्म हैं। अर्थात् जड़ प्रकृति, चेतन आत्मा और उन दोनोंके आधार तथा नियामक परमात्मा—ये तीनों ब्रह्मके ही रूप हैं ॥ १२ ॥ वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः। स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्भोभयं वै प्रणवेन देहे ॥१३॥ यथा=जिस प्रकार; योनिगतस्य=योनि अर्थात् आश्रयभूत काष्ठमें स्थित, वह्नेः=अग्निका, मूर्तिः=रूप, न दृश्यते=नहीं दीखता, च=और; लिङ्गनाशः=उसके चिह्नका (सत्ताका) नाश; एव=भी, न=नहीं होता; (क्योंकि) सः=यह; भूयः एव=चेष्टा करनेपर अवश्य ही, इन्धनयोनिगृह्यः=ईंधनरूप अपनी योनिमें ग्रहण किया जा सकता है, वा=उसी प्रकार, तत् उभयम्=वे दोनो (जीवात्मा और परमात्मा), देहे=शरीरमें; वै=ही, प्रणवेन=ॐकारके द्वारा (साधन करनेपर); [गृह्यते=ग्रहण किये जा सकते हैं] ॥ १३ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार अपनी योनि अर्थात् प्रकट होनेके स्थानविशेष काष्ठ आदिमें स्थित अग्निका रूप दिखलायी नहीं देता, परंतु इस कारण यह नहीं समझा जाता कि अग्नि नहीं है,—उसका होना अवश्य माना जाता है, क्योंकि उसकी सत्ता मानकर अरणियोंका मन्थन करनेपर ईंधनरूप अपने स्थानमेसे वह फिर भी ग्रहण किया जा सकता है, उसी प्रकार उपर्युक्त जीवात्मा और परमात्मा हृदयरूप अपने स्थानमे छिपे रहकर प्रत्यक्ष नहीं होते, परन्तु ॐ के जपद्वारा साधन करनेपर इस शरीरमें ही इनका साक्षात्कार किया जा सकता है—इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—ॐकारके द्वारा साधक किस प्रकार उन परमात्माका साक्षात् कर लेता है, इस जिज्ञासापर कहा जाता है— स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥१४॥ स्वदेहम्=अपने शरीरको; अरणिम्=नीचेकी अरणि, च=और, प्रणवम्=प्रणवको; उत्तरारणिम्= ऊपरकी अरणि, कृत्वा=बनाकर; ध्याननिर्मथनाभ्यासात्=ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे, (साधक) निगूढवत्=छिपी हुई अग्निकी भाँति, (हृदयमें स्थित) देवम्=परमदेव परमेश्वरको, पश्येत्=देखे ॥ १४ ॥ व्याख्या—अग्निको प्रकट करनेके लिये जैसे दो अरणियोंका मन्थन किया जाता है, उसी प्रकार अपने शरीरमें परम पुरुष परमात्माको प्राप्त करनेके लिये शरीरको तो नीचेकी अरणि बनाना चाहिये और ॐकारको ऊपरकी अरणि। अर्थात् शरीरको नीचेकी अरणिकी भाँति समभावसे निश्चल स्थित करके ऊपरकी अरणिकी भाँति ॐकारका वाणीद्वारा जप और मनसे उसके अर्थस्वरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार इस ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे साधकको काष्ठमें छिपी हुई अग्निकी भाँति अपने हृदयमे छिपे हुए परमदेव परमेश्वरको देख लेना—प्रत्यक्ष कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥ तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः। एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥१५॥ तिलेषु=तिलोंमें, तैलम्=तेल; दधनि=दहीमें; सर्पिः=घी, स्रोतःसु=स्रोतोंमें, आपः=जल; च=और; अरणीषु=अरणियोंमें, अग्निः=अग्नि; इव=जिस प्रकार छिपे रहते हैं, एवम्=उसी प्रकार, असौ=वह; आत्मा= परमात्मा, आत्मनि=अपने हृदयमें छिपा हुआ है, यः=जो कोई साधक; एनम्=इसको, सत्येन=सत्यके द्वारा; (और) तपसा=संयमरूप तपसे; अनुपश्यति=देखता रहता है—चिन्तन करता रहता है; [तेन=उसके द्वारा;] गृह्यते=यह ग्रहण किया जाता है ॥ १५ ॥ उ० अ० ४७—
३७० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—जिस प्रकार तिलोंमे तेल, दहीमें घी, ऊपरसे सूखी हुई नदीके भीतरी सोतोंमें जल तथा अरणियोंमे अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार परमात्मा हमारे हृदयरूप गुफामें छिपे हैं। जिस प्रकार अपने-अपने स्थानोंमे छिपे हुए तेल आदि उनके लिये बताये हुए उपायोंसे उपलब्ध किये जा सकते हैं, उसी प्रकार जो कोई साधक विषयोंसे विरक्त होकर सदाचार, सत्यभाषण तथा संयमरूप तपस्याके द्वारा साधन करता हुआ पूर्वोक्त प्रकारसे उनका निरन्तर ध्यान करता रहता है, उनके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा भी प्राप्त किये जा सकते हैं ॥ १५ ॥ सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् । आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥ तद् ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥१६॥ क्षीरे = दूधमे; अर्पितम् = स्थित; सर्पिः इव = घीकी भाँति, सर्वव्यापिनम् = सर्वत्र परिपूर्ण, आत्मविद्यातपो- मूलम् = आत्मविद्या तथा तपसे प्राप्त होनेवाले, आत्मानम् = परमात्माको (वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है); तत् = वह, उपनिषत् = उपनिषदोंमे बताया हुआ, परम् = परम तत्त्व; ब्रह्म = ब्रह्म है, तत् = वह, उपनिषत् = उपनिषदोंमे बताया हुआ, परम् = परमतत्त्व, ब्रह्म = ब्रह्म है ॥ १६ ॥ व्याख्या-आत्मविद्या और तप जिनकी प्राप्तिके मूलभूत साधन हैं, तथा जो दूधमे स्थित घीकी भाँति सर्वत्र परिपूर्ण हैं, उन सर्वान्तर्यामी परमात्माको वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है। वे ही उपनिषद्दोमे वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। वे ही उपनिषदों- में वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १६ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय अध्याय
सम्बन्ध-पहले अध्यायमें परमदेव परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान उपाय ध्यान बताया गया। उस ध्यानकी प्रक्रिया
बतानेके लिये यह दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले ध्यानकी सिद्धिके लिये पाँच मन्त्रोंमें परमेश्वरसे प्रार्थना करनेका
प्रकार बताया जाता है—
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः ।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् ॥ १ ॥
सविता = सबको उत्पन्न करनेवाला परमात्मा, प्रथमम् = पहले, मनः = हमारे मन, (और) धियः =
बुद्धियोंको, तत्त्वाय = तत्त्वकी प्राप्तिके लिये, युञ्जानः = अपने स्वरूपमें लगाते हुए, अग्नेः = अग्नि (आदि इन्द्रियाभिमानी
देवताओं) की, ज्योतिः = ज्योति (प्रकाशन-सामर्थ्य) को, निचाय्य = अवलोकन करके, पृथिव्याः = पार्थिव पदार्थोंसे; अधि =
ऊपर उठाकर, आभरत् = हमारी इन्द्रियोंमें स्थापित करे ॥ १ ॥
व्याख्या-सबको उत्पन्न करनेवाले परमात्मा पहले हमारे मन और बुद्धिकी वृत्तियोंको तत्त्वकी प्राप्तिके लिये अपने
दिव्य स्वरूपमें लगायें और अग्नि आदि इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी जो विषयोंको प्रकाशित करनेकी सामर्थ्य है, उसे दृष्टिमें
रखते हुए बाह्य विषयोंसे लौटाकर हमारी इन्द्रियोंमें स्थिरतापूर्वक स्थापित कर दें, जिससे हमारी इन्द्रियोंका प्रकाश बाहर न
जाकर बुद्धि और मनकी स्थिरतामें सहायक हो ॥ १ ॥
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे । सुवर्गेयाय शक्त्या ॥ २ ॥
वयम् = हमलोग, सवितुः = सबको उत्पन्न करनेवाले, देवस्य = परमदेव परमेश्वरकी, सवे = आराधनास्वरूप यज्ञमें,
युक्तेन मनसा = लगे हुए मनके द्वारा, सुवर्गेयाय = स्वर्गीय सुख (भगवत् प्राप्ति-जनित आनन्द) की प्राप्तिके लिये; शक्त्या =
पूरी शक्तिसे, [प्रयतामहै = प्रयत्न करें ] ॥ २ ॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७१ व्याख्या—हमलोग सबको उत्पन्न करनेवाले परमदेव परमेश्वरकी आराधनारूप यज्ञमे लगे हुए मनके द्वारा परमा- नन्दप्राप्तिके लिये पूर्ण शक्तिसे प्रयत्न करें। अर्थात् हमारा मन निरन्तर भगवान्की आराधनामें लगा रहे और हम भगवत्- प्राप्तिजनित परमानन्दकी अनुभूतिके लिये पूर्ण शक्तिसे प्रयत्नशील रहे ॥ २ ॥ युक्त्वाय मनसा देवान्त्सुवर्यतो धिया दिवम् । बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३ ॥ सविता = सबको उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर, सुवः = स्वर्गादि लोकोंमें; (और) दिवम् = आकाशमें, यतः = गमन करनेवाले, (तथा) बृहत् = बड़ा भारी; ज्योतिः = प्रकाश, करिष्यतः = फैलानेवाले, तान् = उन; (मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) देवान् = देवताओंको, मनसा = हमारे मन, (और) धिया = बुद्धिसे, युक्त्वाय = संयुक्त करके, (प्रकाश प्रदान करनेके लिये) प्रसुवाति = प्रेरणा करता है अर्थात् करे ॥ ३ ॥ व्याख्या—वे सबको उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवताओंको, जो स्वर्ग आदि लोकोंमें और आकाशमें विचरनेवाले तथा बड़ा भारी प्रकाश फैलानेवाले हैं, हमारे मन और बुद्धिसे संयुक्त करके हमें प्रकाश प्रदान करनेके लिये प्रेरणा करें, ताकि हम उन परमेश्वरका साक्षात् करनेके लिये ध्यान करनेमें समर्थ हों। हमारे मन, बुद्धि और इन्द्रियोंमें प्रकाश फैला रहे। निद्रा, आलस्य और अकर्मण्यता आदि दोष हमारे ध्यानमें विघ्न न कर सकें ॥ ३ ॥ युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥ ४ ॥ विप्राः = (जिसमे) ब्राह्मण आदि; मनः = मनको, युञ्जते = लगाते हैं; उत = और, धियः = बुद्धिकी वृत्तियोंको भी; युञ्जते = लगाते हैं, होत्राः विदधे = (जिसने समस्त) अग्निहोत्र आदि शुभकर्मोंका विधान किया है, (तथा जो) वयुनावित् = समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाला, (और) एकः = एक है, बृहतः = (उस) सबसे महान्, विप्रस्य = सर्वत्र व्यापक, विपश्चितः = सर्वज्ञ, (एव) सवितुः = सबके उत्पादक, देवस्य = परम देव परमेश्वरकी, इत् = निश्चय ही; (हमें) मही = महती, परिष्टुतिः = स्तुति (करनी चाहिये) ॥ ४ ॥ व्याख्या—जिन परब्रह्म परमात्मामे श्रेष्ठ बुद्धिवाले ब्राह्मणादि अविकारी मनुष्य अपने मनको लगाते हैं तथा अपनी सब प्रकारकी बुद्धि-वृत्तियोंको भी नियुक्त करते हैं, जिन्होंने अग्निहोत्र आदि समस्त शुभ कर्मोंका विधान किया है, जो समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाले और एक अद्वितीय हैं, उन सबसे महान्, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सबके उत्पादक परमदेव परमेश्वरकी अवश्य ही हमें भूरि भूरि स्तुति करनी चाहिये ॥ ४ ॥ युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरेः । शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥ ५ ॥ (हे मन और बुद्धि ! मैं) वाम् = तुम दोनोंके (स्वामी), पूर्व्यम् = सबके आदि, ब्रह्म = पूर्णब्रह्म परमात्मामे, नमोभिः = बार-बार नमस्कारके द्वारा, युजे = संयुक्त होता हूँ, श्लोकः = मेरा यह स्तुति पाठ, सूरेः = श्रेष्ठ विद्वान्की, पथ्या इव = कीर्तिकी भाँति, व्येतु (वि+एतु) = सर्वत्र फैल जाय, (जिससे) अमृतस्य = अविनाशी परमात्माके, विश्वे = समस्त, पुत्राः = पुत्र, ये = जो, दिव्यानि = दिव्य, धामानि = लोकोंमें, आतस्थुः = निवास करते हैं, शृण्वन्तु = सुनें ॥ ५ ॥ व्याख्या—हे मन और बुद्धि ! मैं तुम दोनोंके स्वामी और समस्त जगत्के आदि कारण परब्रह्म परमात्माको बार- बार नमस्कार करके विनयपूर्वक उनकी शरणमे जाकर उनमें संलग्न होता हूँ। मेरे द्वारा जो उन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन किया गया है, वह विद्वान् पुरुषकी कीर्तिके समान समस्त जगत्में व्याप्त हो जाय। उसे अविनाशी परमात्माके वे सभी लाड़िले, जो दिव्य लोकोंमें निवास करते हैं, भलीभाँति सुनें ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—ध्यानके लिये परमात्मासे स्तुति करनेका प्रकार बतलानेके अनन्तर अब छठे मन्त्रमे उस ध्यानकी स्थितिका वर्णन करके सातवेंमें मनुष्यको उस ध्यानमें लग जानेके लिये आदेश दिया जाता है—
३७२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते । सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६ ॥ यत्र = जिस स्थितिमें; अग्निः = परमात्मारूप अग्निको, ( प्राप्त करनेके उद्देश्यसे ) अभिमथ्यते = ( ॐकारके जप और ध्यानद्वारा ) मन्थन किया जाता है; यत्र = जहाँ; वायुः अधिरुध्यते = प्राणवायुका भलीभाँति विधिपूर्वक निरोध किया जाता है; ( तथा ) यत्र = जहाँ; सोमः = आनन्दरूप सोमरस; अतिरिच्यते = अधिकतासे प्रकट होता है; तत्र = वहाँ ( उस स्थितिमें ), मनः = मन; संजायते = सर्वथा विशुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या - जिस स्थितिमें अग्नि प्रकट करनेके लिये अरणियोंद्वारा मन्थन करनेकी भाँति अग्निस्थानीय परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पहले अध्यायमें कहे हुए प्रकारसे शरीरको नीचेकी अरणि और ॐकारको ऊपरकी अरणि बनाकर उसका जप और उसके अर्थरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तनरूप मन्थन किया जाता है, जहाँ प्राणवायुका विधिपूर्वक भलीभाँति निरोध किया जाता है, जहाँ आनन्दरूप सोमरस अधिकतासे प्रकट होता है, उस ध्यानावस्थामे मनुष्यका मन सर्वथा विशुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् । तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्वमक्षिपत् ॥ ७ ॥ सवित्रा = सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमात्माके द्वारा; प्रसवेन = प्राप्त हुई प्रेरणासे; पूर्व्यम् = सबके आदि- कारण; ब्रह्म जुषेत = उस परब्रह्म परमेश्वरकी ही सेवा ( आराधना ) करनी चाहिये; तत्र = ( तू ) उस परमात्मामें ही, योनिम् = आश्रय, कृणवसे = प्राप्त कर; हि = क्योंकि; ( यों करनेसे ) ते = तेरे; पूर्वम् = पूर्व संचित कर्म; न अक्षिपत् = विघ्नकारक नहीं होंगे ॥ ७ ॥ व्याख्या - हे साधक ! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे अर्थात् ऊपर बताये हुए प्रकारसे परमात्माकी स्तुति करके उनसे अनुमति प्राप्तकर तुम्हे उन सबके आदि परब्रह्म परमात्माकी ही सेवा ( समाराधना ) करनी चाहिये । उन परमेश्वरमें ही आश्रय प्राप्त करना चाहिये - उन्हींकी शरण ग्रहण करके उन्हींमे अपने-आपको विलीन कर देना चाहिये । यों करनेसे तुम्हारे पहले किये हुए समस्त सचित कर्म विघ्नकारक नहीं होंगे - बन्धनरूप नहीं होंगे ॥ ७ ॥ सम्बन्ध - ध्यानयोगका साधन करनेवालेको किस प्रकार बैठकर कैसे ध्यान करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं- त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ ८ ॥ विद्वान् = बुद्धिमान् मनुष्य ( को चाहिये कि ); त्रिरुन्नतम् = सिर, गला और छाती - इन तीनों स्थानोंपर उभरे हुए; शरीरम् = शरीरको, समम् = सीधा, ( और ) स्थाप्य = स्थिर करके, ( तथा ) इन्द्रियाणि = समस्त इन्द्रियोंको; मनसा = मनके द्वारा; हृदि = हृदयमे, संनिवेश्य = निरुद्ध करके, ब्रह्मोडुपेन = ॐ काररूप नौकाद्वारा, सर्वाणि = सम्पूर्ण; भयावहानि = भयङ्कर; स्रोतांसि = स्रोतों ( प्रवाहों ) को, प्रतरेत = पार कर जाय ॥ ८ ॥ व्याख्या - जो ध्यानयोगका साधन करे, उस बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि ध्यानके समय जब आसन जमाकरे सुखपूर्वक बैठे, उस समय अपने सिर, गले और छातीको ऊँचा उठाये रक्खे, इधर-उधर न झुकने दे, तथा शरीरको सीधा और स्थिर रक्खे । क्योंकि शरीरको सीधा और स्थिर रक्खे बिना तथा सिर, गला और वक्षःस्थल ऊँचा किये बिना आलस्य, निद्रा और विक्षेपरूप विघ्न आ जाते हैं। अतः इन विघ्नोंसे बचनेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे ही बैठना चाहिये । इसके बाद समस्त इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर उनका मनके द्वारा हृदयमें निरोध कर लेना चाहिये । फिर ॐकाररूप नौकाका आश्रय लेकर अर्थात् ॐकारका जप और उसके वाच्य परब्रह्म परमात्माका ध्यान करके समस्त भयानक प्रवाहोंको