कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 392, कुल 832 में से
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३६५ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
(क्या) कालः = काल, स्वभावः = स्वभाव, नियतिः = निश्चित फल देनेवाला कर्म, यदृच्छा = आकस्मिक घटना;
भूतानि = पाँचों महाभूत, (या) पुरुषः = जीवात्मा योनिः = कारण हैं, इति चिन्त्या = इसपर विचार करना
चाहिये; एषाम् = इन काल आदिका, संयोगः = समुदाय, तु = भी, न = इस जगत्का कारण नहीं हो सकता;
आत्मभावात् = क्योंकि वे चेतन आत्माके अधीन हैं (जड होनेके कारण स्वतन्त्र नहीं हैं), आत्मा = जीवात्मा, अपि =
भी; [न=इस जगत्का कारण नहीं हो सकता,] सुखदुःखहेतोः = (क्योंकि वह) सुख-दुःखोंके हेतुभूत प्रारब्धके;
अनीशः = अधीन है ॥ २ ॥
व्याख्या—वे कहने लगे कि वेद-शास्त्रोंमें अनेक कारणोंका वर्णन आता है। कहीं तो कालको कारण बताया है;
क्योंकि किसी-न-किसी समयपर ही वस्तुओंकी उत्पत्ति देखी जाती है, जगत्की रचना और प्रलय भी कालके ही अधीन सुने
जाते हैं। कहीं स्वभावको कारण बताया जाता है, क्योंकि बीजके अनुरूप ही वृक्षकी उत्पत्ति होती है—जिस वस्तुमें जो
स्वाभाविक शक्ति है, उसीसे उसका कार्य उत्पन्न होता देखा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि वस्तुगत शक्तिरूप जो
स्वभाव है, वह कारण है। कहीं कर्मको कारण बताया है, क्योंकि कर्मानुसार ही जीव भिन्न-भिन्न योनियोंमें भिन्न-भिन्न
स्वभाव आदिसे युक्त होकर उत्पन्न होते हैं। कहीं आकस्मिक घटनाको अर्थात् होनहार (भवितव्यता) को कारण बताया
है। कहीं पाँचों महाभूतोंको और कहीं जीवात्माको जगत्का कारण बताया गया है। अतः हमलोगोंको विचार करना चाहिये
कि वास्तवमें कारण कौन है। विचार करनेसे समझमें आता है कि कालसे लेकर पाँच महाभूतोंतक बताये हुए जड
पदार्थोंमेंसे कोई भी जगत्का कारण नहीं है। वे अलग-अलग तो क्या सब मिलकर भी जगत्के कारण नहीं हो सकते;
क्योंकि ये सब जड होनेके कारण चेतनके अधीन हैं। इनमें स्वतन्त्र कार्य करनेकी शक्ति नहीं है। जिन जड वस्तुओंके मेलसे
कोई नयी चीज उत्पन्न होती है, वह उनके संचालक चेतन आत्माके ही अधीन और उसीके भोगार्थ होती है। इनके सिवा,
पुरुष अर्थात् जीवात्मा भी जगत्का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह सुख-दुःखके हेतुभूत प्रारब्धके अधीन है, वह भी
स्वतन्त्ररूपसे कुछ नहीं कर सकता। अतः कारण तत्त्व कुछ और ही है ॥ २ ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार विचार करके उन्होंने क्या निर्णय किया-इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।
यः कारणानि निखिलाने तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३ ॥
ते = उन्होंने, ध्यानयोगानुगताः = ध्यानयोगमें स्थित होकर स्वगुणैः = अपने गुणोंसे; निगूढाम् = ढकी हुई,
देवात्मशक्तिम् अपश्यन् = (उन) परमात्मदेवकी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिका साक्षात्कार किया, यः = जो (परमात्मदेव);
एकः = अकेला ही, तानि = उन, कालात्मयुक्तानि = कालसे लेकर आत्मातक (पहले बताये हुए), निखिलानि =
सम्पूर्ण, कारणानि अधितिष्ठति = कारणोंपर शासन करता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—इस प्रकार आपसमें विचार करनेपर जब युक्तियोंद्वारा और अनुमानसे वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच
सके, तब वे सब ध्यानयोगमें स्थित हो गये अर्थात् अपने मन और इन्द्रियोंको बाहरके विषयोंसे हटाकर परब्रह्मको
जाननेके लिये उन्हींका चिन्तन करनेमें तत्पर हो गये। ध्यान करते-करते उन्हें परमात्माकी महिमाका अनुभव हुआ।
उन्होंने उन परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी स्वरूपभूत अचिन्त्य दिव्य शक्तिका साक्षात्कार किया, जो अपने ही गुणोंसे—
सत्त्व, रज, तमसे ढकी है, अर्थात् जो देखनेमें त्रिगुणमयी प्रतीत होती है, परंतु वास्तवमें तीनों गुणोंसे परे है। तब वे इस
निर्णयपर पहुँचे कि कालसे लेकर आत्मातक जितने कारण पहले बताये गये हैं, उन समस्त कारणोंके जो अधिष्ठाता—स्वामी
हैं, अर्थात् वे सब जिनकी आज्ञा और प्रेरणा पाकर, जिनकी उस शक्तिके किसी एक अंशको लेकर अपने-अपने कार्योंके करनेमें
समर्थ होते हैं, वे एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ही इस जगत्के वास्तविक कारण हैं; दूसरा कोई नहीं है ॥ ३ ॥
तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥
तम् = उस, एकनेमिम् = एक नेमिवाले, त्रिवृतम् = तीन घेरोवाले, षोडशान्तम् = सोलह सिरोंवाले, शतार्धारम् =