भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 832 में से

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पृष्ठ 391

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्वे ाश्व रोपनि दू शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ कठोपनिषद्के आरम्भमें दिया गया है। प्रथम अध्याय हरिः ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति- किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १ ॥ 'हरिः ओम्' इस प्रकार परमात्माके नामका उच्चारण करके उस परब्रह्म परमेश्वरका स्मरण करते हुए यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है- ब्रह्मवादिनः = ब्रह्मविषयक चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु, वदन्ति = आपसमें कहते हैं; ब्रह्मविदः = हे वेदज्ञ महर्षियो; कारणम् = इस जगत्का मुख्य कारण, ब्रह्म = ब्रह्म, किम् = कौन है; कुतः = ( हमलोग ) किससे; जाताः स्म = उत्पन्न हुए हैं; केन = किससे; जीवाम = जी रहे हैं; च = और, क्व = किसमें, सम्प्रतिष्ठाः = हमारी सम्यक् प्रकारसे स्थिति है, ( तथा ) केन अधिष्ठिताः = किसके अधीन रहकर, [ वयम् = हमलोग, ] सुखेतरेषु = सुख और दुःखोंमें, व्यवस्थाम् = निश्चित व्यवस्थाके अनुसार; वर्तामहे = वर्त रहे हैं ॥ १ ॥ व्याख्या-परब्रह्म परमात्माको जानने और प्राप्त करनेके लिये उनकी चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु पुरुष आपसमें कहने लगे-'हे वेदज्ञ महर्षिगण ! हमने वेदोंमें पढ़ा है कि इस समस्त जगत्के कारण ब्रह्म हैं; सो वे ब्रह्म कौन हैं ? हम सब लोग किससे उत्पन्न हुए हैं-हमारा मूल क्या है ? किसके प्रभावसे हम जी रहे हैं-हमारे जीवनका आधार कौन है ? और हमारी पूर्णतया स्थिति किसमें है ? अर्थात् हम उत्पन्न होनेसे पहले-भूतकालमें, उत्पन्न होनेके बाद-वर्तमानकालमें और इसके पश्चात्-प्रलयकालमें किसमें स्थित रहते हैं ? हमारा परम आश्रय कौन है ? तथा हमारा अधिष्ठाता-हमलोगोंकी व्यवस्था करनेवाला कौन है ? जिसकी रची हुई व्यवस्थाके अनुसार हमलोग सुख-दुःख दोनों भोग रहे हैं, वह इस सम्पूर्ण जगत्की सुव्यवस्था करनेवाला इसका संचालक स्वामी कौन है ?'* ॥ १ ॥ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या । संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥

  • इस प्रकार परब्रह्म परमात्माकी खोज करना, उन्हें जानने और पानेके लिये उत्कट अभिलाषाके साथ उत्साहपूर्वक आपसमें विचार करना, परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंसे उनके विषयमें विनयभाव और श्रद्धापूर्वक पूछना, उनकी बतायी हुई बातोंको ध्यानपूर्वक सुनकर काममें लाना-इसीका नाम 'सत्सङ्ग' है। इस उपनिषद्के प्रथम मन्त्रमें सत्सङ्गका ही वर्णन है। इससे सत्सङ्गकी अनादिता और अलौकिक महत्ता सूचित होती है।