भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 832 में से

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पृष्ठ 394

३६६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—इस मन्त्रमें संसारका नदीके रूपमें वर्णन किया गया है। वे ब्रह्मज्ञ ऋषि कहते हैं—हम एक ऐसी नदीको देख रहे हैं, जिसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही पाँच स्रोत हैं। संसारका ज्ञान हमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा ही होता है, इन्हींमेंसे होकर संसारका प्रवाह बहता है। इसीलिये इन्द्रियोंको यहाँ स्रोत कहा गया है। ये इन्द्रियाँ पञ्च सूक्ष्मभूतों (तन्मात्रों) से उत्पन्न हुई हैं, इसीलिये इस नदीके पाँच उद्गमस्थान माने गये हैं। इस नदीका प्रवाह बड़ा ही भयंकर है। इसमें गिर जानेसे बार-बार जन्म-मृत्युका क्लेश उठाना पड़ता है। संसारकी चाल बड़ी टेढ़ी है, कपटसे भरी है। इसमेंसे निकलना कठिन है। इसीलिये इस संसाररूप नदीको वक्र कहा गया है। जगत्के जीवोंमें जो कुछ भी चेष्टा--हलचल होती है, वह प्राणोंके द्वारा ही होती है। इसीलिये प्राणोंको इस भव-सरिताकी तरङ्गमाला कहा गया है। नदीमे हलचल तरङ्गोंसे ही होती है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा होनेवाले चाक्षुष आदि पाँच प्रकारके ज्ञानोंका आदि कारण मन है, जितने भी ज्ञान हैं, सब मनकी ही तो वृत्तियाँ हैं। मन न हो तो इन्द्रियोंके सचेष्ट रहनेपर भी किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होता। यह मन ही संसाररूप नदीका मूल है। मनसे ही संसारकी सृष्टि होती है। सारा जगत् मनकी ही कल्पना है। मनके अमन हो जानेपर— नाश हो जानेपर जगत्का अस्तित्व ही नहीं रहता। जबतक मन है; तभीतक संसार है। इन्द्रियोंके शब्द-स्पर्श आदि पाँच विषय ही इस संसाररूप नदीमे आवर्त अर्थात् भँवर हैं। इन्हींमें फँसकर जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ जाता है। गर्भका दुःख, जन्मका दुःख, बुढ़ापेका दुःख, रोगका दुःख और मृत्युका दुःख—ये पाँच प्रकारके दुःख ही इस नदीके प्रवाहमें वेगरूप हैं। इन्हींके थपेड़ोंसे जीव व्याकुल रहता है और इस योनिसे उस योनिमें भटकता रहता है। अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहङ्कार), राग (प्रियबुद्धि), द्वेष (अप्रियबुद्धि) और अभिनिवेश (मृत्युभय)—ये पञ्चविध क्लेश ही इस संसाररूप नदीके पाँच पर्व अर्थात् विभाग हैं। इन्हीं पाँच विभागोंमें यह जगत् बँटा हुआ है। इन पाँचोंका समुदाय ही संसारका स्वरूप है और अन्तःकरणकी पचास वृत्तियाँ ही इस नदीके पचास भेद अर्थात् भिन्न-भिन्न रूप हैं। अन्तः- करणकी वृत्तियोंको लेकर ही संसारमें भेदकी प्रतीति होती है॥ ५॥ सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे। पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६ ॥ अस्मिन्= इस; सर्वाजीवे= सबके जीविकारूप; सर्वसंस्थे=सबके आश्रयभूत; बृहन्ते=विस्तृत; ब्रह्मचक्रे=ब्रह्मचक्रमें; हंसः=जीवात्मा, भ्राम्यते=घुमाया जाता है; [ सः=वह; ] आत्मानम्=अपने आपको, च=और; प्रेरितारम्=सबके प्रेरक परमात्माको; पृथक्=अलग-अलग; मत्वा=जानकर, ततः=उसके बाद; तेन=उस परमात्मासे; जुष्टः=स्वीकृत होकर; अमृतत्वम्=अमृतभावको, एति=प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या—जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, जो सबके जीवननिर्वाहका हेतु है और जो समस्त प्राणियोंका आश्रय है, ऐसे इस जगद्रूप ब्रह्मचक्रमें अर्थात् परब्रह्म परमात्माद्वारा संचालित तथा परमात्माके ही विराट् शरीररूप संसारचक्रमें यह जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उन परमात्माद्वारा घुमाया जाता है। जबतक यह इसके सञ्चालकको जानकर उनका कृपापात्र नहीं बन जाता, अपनेको उनका प्रिय नहीं बना लेता, तबतक इसका इस चक्रसे छुटकारा नहीं हो सकता । जब यह अपनेको और सबके प्रेरक परमात्माको भलीभाँति पृथक्-पृथक् समझ लेता है कि उन्हींके घुमानेसे मैं इस संसार-चक्रमें घूम रहा हूँ और उन्हींकी कृपासे छूट सकता हूँ, तब वह उन परमेश्वरका प्रिय बनकर उनके द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है (कठ० २। २३; मुण्डक० ३।२।३)। और फिर तो वह अमृतभावको प्राप्त हो जाता है, जन्म-मरणरूप संसार-चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। परम शान्ति एव सनातन दिव्य परमधामको प्राप्त हो जाता है (गीता १८। ६१-६२)॥ ६॥ उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च। अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः॥७॥ एतत्= यह; उद्गीतम्=वेदवर्णित, परमम् ब्रह्म=परब्रह्म; तु=ही, सुप्रतिष्ठा=सर्वश्रेष्ठ आश्रय, च=और; अक्षरम्=अविनाशी है; तस्मिन्=उसमें; त्रयम्=तीनों लोक स्थित हैं; ब्रह्मविदः=वेदके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुष; अत्र=यहाँ (हृदयमें); अन्तरम्=अन्तर्यामीरूपसे स्थित उस ब्रह्मको; विदित्वा=जानकर; तत्पराः=उसीके परायण हो; ब्रह्मणि=उस परब्रह्ममें; लीनाः=लीन होकर; योनिमुक्ताः=सदाके लिये जन्म-मृत्युसे मुक्त हो गये॥ ७॥