भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 832 में से

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पृष्ठ 395
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३६७ व्याख्या—जिनकी महिमाका वेदोंमें गान किया गया है, जो परब्रह्म परमात्मा सबके सर्वोत्तम आश्रय हैं, उन्हींमें तीनो लोकोंका समुदायरूप समस्त विश्व स्थित है। वे ही ऊपर बताये हुए सबके प्रेरक, कभी नाश न होनेवाले परम अक्षर, परम देव हैं। जिन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्माकी दिव्यशक्तिका दर्शन किया था, वे वेदके रहस्यको समझनेवाले ऋषिलोग उन सबके प्रेरक परमात्माको यहाँ—अपने हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान समझकर, उन्हींकेपरायण होकर अर्थात् सर्वतोभावसे उनकी शरणमे जाकर, उन्हींमें लीन हो गये और सदाके लिये जन्म मरणरूप योनिसे मुक्त हो गये। उनके मार्ग- का अनुसरण करके हम सब लोग भी उन्हींकी भाँति जन्म मरणसे छूटकर परमात्मामे लीन हो सकते है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—अब उन परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके उन्हें जाननेका फल बताया जाता है— संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः । अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावाज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ८॥ क्षरम् = विनाशशील जडवर्ग; च=एव; अक्षरम्=अविनाशी जीवात्मा; संयुक्तम्=(इन दोनोके) सयुक्त रूप; व्यक्ताव्यक्तम्=व्यक्त और अव्यक्तरूप; एतत् विश्वम्=इस विश्वका; ईशः=परमेश्वर ही; भरते=धारण और पोषण करता है; च=तथा; आत्मा=जीवात्मा; [भोक्तृभावात्=इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण; अनीशः=प्रकृतिके अधीन हो; बध्यते=इसमे बँध जाता है; (और) देवम्=उस परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशैः=सब प्रकारके बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ व्याख्या—विनाशशील जडवर्ग, जिसे भगवान्‌की अपरा प्रकृति तथा क्षर-तत्त्व कहा गया है और भगवान्‌की परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो अक्षरतत्त्वके नामसे पुकारा जाता है—इन दोनोंके सयोगसे बने हुए, प्रकट और अप्रकट रूपमें स्थित इस समस्त जगत्‌का वे परमपुरुष पुरुषोत्तम ही धारण-पोषण करते हैं, जो सबके स्वामी, सबके प्रेरक तथा सबका यथायोग्य सञ्चालन और नियमन करनेवाले परमेश्वर हीं। जीवात्मा इस जगत्‌के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण प्रकृतिके अधीन हो इसके मोहजालमे फँसा रहता है, उन परमदेव परमात्माकी ओर दृष्टिपात नहीं करता। जब कभी यह उन सर्व- सुहृद् परमात्माकी अहैतुकी दयासे महापुरुषोंका सग पाकर उनको जाननेका अभिलाषी होकर पूर्ण चेष्टा करता है, तब उन परमदेव परमेश्वरको जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—पुन जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति—इन तीनोके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन करके, इस तत्त्वको जानकर उपासना करनेका फल दो मन्त्रोंद्वारा बताया जाता है— ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ॥ ९ ॥ ज्ञाज्ञौ=सर्वज्ञ और अज्ञानी; ईशनीशौ=सर्वसमर्थ और असमर्थ; द्वौ=ये दो; अजौ=अजन्मा आत्मा हैं; (तथा) भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता=भोगनेवाले जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग्य सामग्रीसे युक्त; हि=तथा; अजा=अनादि प्रकृति; एका=एक तीसरी शक्ति है, (इन तीनोंमें जो ईश्वग्तत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है;) हि=क्योंकि, आत्मा=वह परमात्मा; अनन्तः=अनन्त; विश्वरूपः=सम्पूर्ण रूपोंवाला; च=और; अकर्ता=कर्तापनके अभिमानसे रहित है; यदा=जब; (मनुष्य इस प्रकार) एतत् त्रयम्= ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनोंको; ब्रह्मम्=ब्रह्मरूपमे; विन्दते= प्राप्त कर लेता है (तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है) ॥ ९॥ व्याख्या—ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, जीव अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है; ये दोनों ही अजन्मा हैं। इनके सिवा एक तीसरी शक्ति भी अजन्मा है, जिसे प्रकृति कहते ह, यह भोक्ता जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग-सामग्री प्रस्तुत करती है। यद्यपि ये तीनों ही अजन्मा हैं—अनादि है, फिर भी ईश्वर शेष दो तत्त्वोसे विलक्षण हैं; क्योकि वे परमात्मा हैं, अनन्त हैं। सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप—विराट् शरीर है। वे सब कुछ करते हुए—सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति, पालन और सहार करते हुए भी वास्तवमे कुछ नहीं करते; क्योंकि वे कर्त्तापनके अभिमानसे रहित हैं। मनुष्य जब इस प्रकार इन तीनोंकी विलक्षणता और
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