भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 396

३६८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * विभिन्नताको समझते हुए भी इन्हें ब्रह्मरूपमे उपलब्ध कर लेता है अर्थात् प्रकृति और जीव तो उन परमेश्वरकी प्रकृतियाँ है और परमेश्वर इनके स्वामी हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह सब प्रकारके बन्धनोसे मुक्त हो जाता है ॥ ९ ॥ क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥१०॥ प्रधानम् = प्रकृति तो, क्षरम् = विनाशशील है, हरः = इसको भोगनेवाला जीवात्मा; अमृताक्षरम् = अमृतस्वरूप अविनाशी है, क्षरात्मानौ = इन विनाशशील जड-तत्त्व और चेतन आत्मा—दोनोको; एकः = एक; देवः = ईश्वर; ईशते = अपने शासनमें रखता है; (इस प्रकार जानकर) तस्य = उसका; अभिध्यानात् = निरन्तर ध्यान करनेसे; योजनात् = मनको उसमे लगाये रहनेसे, च = तथा; तत्त्वभावात् = तन्मय हो जानेसे, अन्ते = अन्तमे (उसीको प्राप्त हो जाता है); भूयः = फिर, विश्वमायानिवृत्तिः = समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है ॥ १० ॥ व्याख्या—प्रकृति तो क्षर अर्थात् परिवर्तन होनेवाली, विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीवसमुदाय अविनाशी अक्षरतत्त्व है। इन क्षर और अक्षर (जड प्रकृति और चेतन जीवसमुदाय)—दोनों तत्त्वोंपर एक परमदेव परमेश्वर शासन करते हैं, वे ही प्राप्त करनेके और जाननेके योग्य हैं, उन्हें तत्त्वसे जानना चाहिये—इस प्रकार दृढ निश्चय करके उन परमदेव परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे, उन्हींमे रात दिन संलग्न रहनेसे और उन्हींमे तन्मय हो जानेसे अन्तमें यह उन्हींको पा लेता है। फिर इसके लिये सम्पूर्ण मायाकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है अर्थात् मायामय जगत्से इसका सम्बन्ध सर्वथा छूट जाता है ॥१०॥ सम्बन्ध—उन परमदेवको जाननेका फल पुन बताया जाता है— ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः । तस्याभिध्यानात्तृतीयं देहभेदे विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः ॥११॥ तस्य = उस परमदेवका, अभिध्यानात् = निरन्तर ध्यान करनेसे; देवम् = उस प्रकाशमय परमात्माको; ज्ञात्वा = जान लेनेपर, सर्वपाशापहानिः = समस्त बन्धनोंका नाश हो जाता है; (क्योंकि) क्लेशैः क्षीणैः = क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण, जन्ममृत्युप्रहाणिः = जन्म मृत्युका सर्वथा अभाव हो जाता है, (अतः वह) देहभेदे = शरीरका नाश होनेपर, तृतीयम् = तीसरे लोक (स्वर्ग) तकके, विश्वैश्वर्यम् [त्यक्त्वा] = समस्त ऐश्वर्यका त्याग करके, केवलः = सर्वथा विशुद्ध; आप्तकामः = पूर्णकाम हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या—परमपुरुष परमात्माका निरन्तर ध्यान करते करते जब साधक उन परमदेवको जान लेता है, तब इसके समस्त बन्धनोंका सदाके लिये सर्वथा नाश हो जाता है, क्योकि अविद्या, अस्मिता (अहकार), राग, द्वेष और मरणभय— इन पाँचो क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण उसके जन्म मरणका सदाके लिये अभाव हो जाता है। अतः वह फिर कभी बन्धनमे नहीं पड़ सकता। वह इस शरीरका नाश होनेपर तृतीय लोक अर्थात् स्वर्गके सबसे ऊँचे स्तर—ब्रह्मलोकतकके बड़े-से-बड़े समस्त ऐश्वर्योंका त्याग करके प्रकृतिसे वियुक्त, सर्वथा विशुद्ध कैवल्यपदको प्राप्त हो पूर्णकाम हो जाता है—उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती, क्योकि वह सम्पूर्ण कामनाओंका फल पा लेता है ॥ ११ ॥ एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् । भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥१२॥ आत्मसस्थम् = अपने ही भीतर स्थित, एतत् = इस ब्रह्मको; एव = ही, नित्यम् = सर्वदा, ज्ञेयम् = जानना चाहिये; हि = क्योंकि, अतः परम् = इससे बढकर, वेदितव्यम् = जाननेयोग्य तत्त्व, किञ्चित् = दूसरा कुछ भी, न = नहीं है, भोक्ता = भोक्ता (जीवात्मा), भोग्यम् = भोग्य (जडवर्ग), च = और, प्रेरितारम् = उनके प्रेरक परमेश्वर; मत्वा = (इन तीनोंको) जानकर, (मनुष्य) सर्वम् = सब कुछ (जान लेता है), एतत् = (इस प्रकार) यह, त्रिविधम् = तीन भेदोंमें, प्रोक्तम् = बताया हुआ ही, ब्रह्मम् = ब्रह्म है ॥ १२ ॥