कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 397, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 397
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३६९ व्याख्या—ये परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तम अपने ही भीतर—हृदयमे अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इनको जाननेके लिये कहीं बाहर जानेकी आवश्यकता नहीं है। इन्हींको सदा जाननेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि इनसे बढ़कर जानने- योग्य दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। इन एकको जाननेसे ही सबका ज्ञान हो जाता है, ये ही सबके कारण और परमाधार हैं। मनुष्य भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (जड़वर्ग) और इन दोनोंके प्रेरक ईश्वरको जानकर सब कुछ जान लेता है। फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। जिनके ये तीन भेद बताये गये हैं, वे ही समग्र ब्रह्म हैं। अर्थात् जड़ प्रकृति, चेतन आत्मा और उन दोनोंके आधार तथा नियामक परमात्मा—ये तीनों ब्रह्मके ही रूप हैं ॥ १२ ॥ वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः। स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्भोभयं वै प्रणवेन देहे ॥१३॥ यथा=जिस प्रकार; योनिगतस्य=योनि अर्थात् आश्रयभूत काष्ठमें स्थित, वह्नेः=अग्निका, मूर्तिः=रूप, न दृश्यते=नहीं दीखता, च=और; लिङ्गनाशः=उसके चिह्नका (सत्ताका) नाश; एव=भी, न=नहीं होता; (क्योंकि) सः=यह; भूयः एव=चेष्टा करनेपर अवश्य ही, इन्धनयोनिगृह्यः=ईंधनरूप अपनी योनिमें ग्रहण किया जा सकता है, वा=उसी प्रकार, तत् उभयम्=वे दोनो (जीवात्मा और परमात्मा), देहे=शरीरमें; वै=ही, प्रणवेन=ॐकारके द्वारा (साधन करनेपर); [गृह्यते=ग्रहण किये जा सकते हैं] ॥ १३ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार अपनी योनि अर्थात् प्रकट होनेके स्थानविशेष काष्ठ आदिमें स्थित अग्निका रूप दिखलायी नहीं देता, परंतु इस कारण यह नहीं समझा जाता कि अग्नि नहीं है,—उसका होना अवश्य माना जाता है, क्योंकि उसकी सत्ता मानकर अरणियोंका मन्थन करनेपर ईंधनरूप अपने स्थानमेसे वह फिर भी ग्रहण किया जा सकता है, उसी प्रकार उपर्युक्त जीवात्मा और परमात्मा हृदयरूप अपने स्थानमे छिपे रहकर प्रत्यक्ष नहीं होते, परन्तु ॐ के जपद्वारा साधन करनेपर इस शरीरमें ही इनका साक्षात्कार किया जा सकता है—इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—ॐकारके द्वारा साधक किस प्रकार उन परमात्माका साक्षात् कर लेता है, इस जिज्ञासापर कहा जाता है— स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥१४॥ स्वदेहम्=अपने शरीरको; अरणिम्=नीचेकी अरणि, च=और, प्रणवम्=प्रणवको; उत्तरारणिम्= ऊपरकी अरणि, कृत्वा=बनाकर; ध्याननिर्मथनाभ्यासात्=ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे, (साधक) निगूढवत्=छिपी हुई अग्निकी भाँति, (हृदयमें स्थित) देवम्=परमदेव परमेश्वरको, पश्येत्=देखे ॥ १४ ॥ व्याख्या—अग्निको प्रकट करनेके लिये जैसे दो अरणियोंका मन्थन किया जाता है, उसी प्रकार अपने शरीरमें परम पुरुष परमात्माको प्राप्त करनेके लिये शरीरको तो नीचेकी अरणि बनाना चाहिये और ॐकारको ऊपरकी अरणि। अर्थात् शरीरको नीचेकी अरणिकी भाँति समभावसे निश्चल स्थित करके ऊपरकी अरणिकी भाँति ॐकारका वाणीद्वारा जप और मनसे उसके अर्थस्वरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार इस ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे साधकको काष्ठमें छिपी हुई अग्निकी भाँति अपने हृदयमे छिपे हुए परमदेव परमेश्वरको देख लेना—प्रत्यक्ष कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥ तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः। एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥१५॥ तिलेषु=तिलोंमें, तैलम्=तेल; दधनि=दहीमें; सर्पिः=घी, स्रोतःसु=स्रोतोंमें, आपः=जल; च=और; अरणीषु=अरणियोंमें, अग्निः=अग्नि; इव=जिस प्रकार छिपे रहते हैं, एवम्=उसी प्रकार, असौ=वह; आत्मा= परमात्मा, आत्मनि=अपने हृदयमें छिपा हुआ है, यः=जो कोई साधक; एनम्=इसको, सत्येन=सत्यके द्वारा; (और) तपसा=संयमरूप तपसे; अनुपश्यति=देखता रहता है—चिन्तन करता रहता है; [तेन=उसके द्वारा;] गृह्यते=यह ग्रहण किया जाता है ॥ १५ ॥ उ० अ० ४७—