भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

३७० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—जिस प्रकार तिलोंमे तेल, दहीमें घी, ऊपरसे सूखी हुई नदीके भीतरी सोतोंमें जल तथा अरणियोंमे अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार परमात्मा हमारे हृदयरूप गुफामें छिपे हैं। जिस प्रकार अपने-अपने स्थानोंमे छिपे हुए तेल आदि उनके लिये बताये हुए उपायोंसे उपलब्ध किये जा सकते हैं, उसी प्रकार जो कोई साधक विषयोंसे विरक्त होकर सदाचार, सत्यभाषण तथा संयमरूप तपस्याके द्वारा साधन करता हुआ पूर्वोक्त प्रकारसे उनका निरन्तर ध्यान करता रहता है, उनके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा भी प्राप्त किये जा सकते हैं ॥ १५ ॥ सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् । आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥ तद् ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥१६॥ क्षीरे = दूधमे; अर्पितम् = स्थित; सर्पिः इव = घीकी भाँति, सर्वव्यापिनम् = सर्वत्र परिपूर्ण, आत्मविद्यातपो- मूलम् = आत्मविद्या तथा तपसे प्राप्त होनेवाले, आत्मानम् = परमात्माको (वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है); तत् = वह, उपनिषत् = उपनिषदोंमे बताया हुआ, परम् = परम तत्त्व; ब्रह्म = ब्रह्म है, तत् = वह, उपनिषत् = उपनिषदोंमे बताया हुआ, परम् = परमतत्त्व, ब्रह्म = ब्रह्म है ॥ १६ ॥ व्याख्या-आत्मविद्या और तप जिनकी प्राप्तिके मूलभूत साधन हैं, तथा जो दूधमे स्थित घीकी भाँति सर्वत्र परिपूर्ण हैं, उन सर्वान्तर्यामी परमात्माको वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है। वे ही उपनिषद्‌दोमे वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। वे ही उपनिषदों- में वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १६ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय
सम्बन्ध-पहले अध्यायमें परमदेव परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान उपाय ध्यान बताया गया। उस ध्यानकी प्रक्रिया
बतानेके लिये यह दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले ध्यानकी सिद्धिके लिये पाँच मन्त्रोंमें परमेश्वरसे प्रार्थना करनेका
प्रकार बताया जाता है—
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः ।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् ॥ १ ॥
सविता = सबको उत्पन्न करनेवाला परमात्मा, प्रथमम् = पहले, मनः = हमारे मन, (और) धियः =
बुद्धियोंको, तत्त्वाय = तत्त्वकी प्राप्तिके लिये, युञ्जानः = अपने स्वरूपमें लगाते हुए, अग्नेः = अग्नि (आदि इन्द्रियाभिमानी
देवताओं) की, ज्योतिः = ज्योति (प्रकाशन-सामर्थ्य) को, निचाय्य = अवलोकन करके, पृथिव्याः = पार्थिव पदार्थोंसे; अधि =
ऊपर उठाकर, आभरत् = हमारी इन्द्रियोंमें स्थापित करे ॥ १ ॥
व्याख्या-सबको उत्पन्न करनेवाले परमात्मा पहले हमारे मन और बुद्धिकी वृत्तियोंको तत्त्वकी प्राप्तिके लिये अपने
दिव्य स्वरूपमें लगायें और अग्नि आदि इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी जो विषयोंको प्रकाशित करनेकी सामर्थ्य है, उसे दृष्टिमें
रखते हुए बाह्य विषयोंसे लौटाकर हमारी इन्द्रियोंमें स्थिरतापूर्वक स्थापित कर दें, जिससे हमारी इन्द्रियोंका प्रकाश बाहर न
जाकर बुद्धि और मनकी स्थिरतामें सहायक हो ॥ १ ॥
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे । सुवर्गेयाय शक्त्या ॥ २ ॥
वयम् = हमलोग, सवितुः = सबको उत्पन्न करनेवाले, देवस्य = परमदेव परमेश्वरकी, सवे = आराधनास्वरूप यज्ञमें,
युक्तेन मनसा = लगे हुए मनके द्वारा, सुवर्गेयाय = स्वर्गीय सुख (भगवत् प्राप्ति-जनित आनन्द) की प्राप्तिके लिये; शक्त्या =
पूरी शक्तिसे, [प्रयतामहै = प्रयत्न करें ] ॥ २ ॥