कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 399, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 399
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७१ व्याख्या—हमलोग सबको उत्पन्न करनेवाले परमदेव परमेश्वरकी आराधनारूप यज्ञमे लगे हुए मनके द्वारा परमा- नन्दप्राप्तिके लिये पूर्ण शक्तिसे प्रयत्न करें। अर्थात् हमारा मन निरन्तर भगवान्की आराधनामें लगा रहे और हम भगवत्- प्राप्तिजनित परमानन्दकी अनुभूतिके लिये पूर्ण शक्तिसे प्रयत्नशील रहे ॥ २ ॥ युक्त्वाय मनसा देवान्त्सुवर्यतो धिया दिवम् । बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३ ॥ सविता = सबको उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर, सुवः = स्वर्गादि लोकोंमें; (और) दिवम् = आकाशमें, यतः = गमन करनेवाले, (तथा) बृहत् = बड़ा भारी; ज्योतिः = प्रकाश, करिष्यतः = फैलानेवाले, तान् = उन; (मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) देवान् = देवताओंको, मनसा = हमारे मन, (और) धिया = बुद्धिसे, युक्त्वाय = संयुक्त करके, (प्रकाश प्रदान करनेके लिये) प्रसुवाति = प्रेरणा करता है अर्थात् करे ॥ ३ ॥ व्याख्या—वे सबको उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवताओंको, जो स्वर्ग आदि लोकोंमें और आकाशमें विचरनेवाले तथा बड़ा भारी प्रकाश फैलानेवाले हैं, हमारे मन और बुद्धिसे संयुक्त करके हमें प्रकाश प्रदान करनेके लिये प्रेरणा करें, ताकि हम उन परमेश्वरका साक्षात् करनेके लिये ध्यान करनेमें समर्थ हों। हमारे मन, बुद्धि और इन्द्रियोंमें प्रकाश फैला रहे। निद्रा, आलस्य और अकर्मण्यता आदि दोष हमारे ध्यानमें विघ्न न कर सकें ॥ ३ ॥ युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥ ४ ॥ विप्राः = (जिसमे) ब्राह्मण आदि; मनः = मनको, युञ्जते = लगाते हैं; उत = और, धियः = बुद्धिकी वृत्तियोंको भी; युञ्जते = लगाते हैं, होत्राः विदधे = (जिसने समस्त) अग्निहोत्र आदि शुभकर्मोंका विधान किया है, (तथा जो) वयुनावित् = समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाला, (और) एकः = एक है, बृहतः = (उस) सबसे महान्, विप्रस्य = सर्वत्र व्यापक, विपश्चितः = सर्वज्ञ, (एव) सवितुः = सबके उत्पादक, देवस्य = परम देव परमेश्वरकी, इत् = निश्चय ही; (हमें) मही = महती, परिष्टुतिः = स्तुति (करनी चाहिये) ॥ ४ ॥ व्याख्या—जिन परब्रह्म परमात्मामे श्रेष्ठ बुद्धिवाले ब्राह्मणादि अविकारी मनुष्य अपने मनको लगाते हैं तथा अपनी सब प्रकारकी बुद्धि-वृत्तियोंको भी नियुक्त करते हैं, जिन्होंने अग्निहोत्र आदि समस्त शुभ कर्मोंका विधान किया है, जो समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाले और एक अद्वितीय हैं, उन सबसे महान्, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सबके उत्पादक परमदेव परमेश्वरकी अवश्य ही हमें भूरि भूरि स्तुति करनी चाहिये ॥ ४ ॥ युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरेः । शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥ ५ ॥ (हे मन और बुद्धि ! मैं) वाम् = तुम दोनोंके (स्वामी), पूर्व्यम् = सबके आदि, ब्रह्म = पूर्णब्रह्म परमात्मामे, नमोभिः = बार-बार नमस्कारके द्वारा, युजे = संयुक्त होता हूँ, श्लोकः = मेरा यह स्तुति पाठ, सूरेः = श्रेष्ठ विद्वान्की, पथ्या इव = कीर्तिकी भाँति, व्येतु (वि+एतु) = सर्वत्र फैल जाय, (जिससे) अमृतस्य = अविनाशी परमात्माके, विश्वे = समस्त, पुत्राः = पुत्र, ये = जो, दिव्यानि = दिव्य, धामानि = लोकोंमें, आतस्थुः = निवास करते हैं, शृण्वन्तु = सुनें ॥ ५ ॥ व्याख्या—हे मन और बुद्धि ! मैं तुम दोनोंके स्वामी और समस्त जगत्के आदि कारण परब्रह्म परमात्माको बार- बार नमस्कार करके विनयपूर्वक उनकी शरणमे जाकर उनमें संलग्न होता हूँ। मेरे द्वारा जो उन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन किया गया है, वह विद्वान् पुरुषकी कीर्तिके समान समस्त जगत्में व्याप्त हो जाय। उसे अविनाशी परमात्माके वे सभी लाड़िले, जो दिव्य लोकोंमें निवास करते हैं, भलीभाँति सुनें ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—ध्यानके लिये परमात्मासे स्तुति करनेका प्रकार बतलानेके अनन्तर अब छठे मन्त्रमे उस ध्यानकी स्थितिका वर्णन करके सातवेंमें मनुष्यको उस ध्यानमें लग जानेके लिये आदेश दिया जाता है—