भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 400

३७२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते । सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६ ॥ यत्र = जिस स्थितिमें; अग्निः = परमात्मारूप अग्निको, ( प्राप्त करनेके उद्देश्यसे ) अभिमथ्यते = ( ॐकारके जप और ध्यानद्वारा ) मन्थन किया जाता है; यत्र = जहाँ; वायुः अधिरुध्यते = प्राणवायुका भलीभाँति विधिपूर्वक निरोध किया जाता है; ( तथा ) यत्र = जहाँ; सोमः = आनन्दरूप सोमरस; अतिरिच्यते = अधिकतासे प्रकट होता है; तत्र = वहाँ ( उस स्थितिमें ), मनः = मन; संजायते = सर्वथा विशुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या - जिस स्थितिमें अग्नि प्रकट करनेके लिये अरणियोंद्वारा मन्थन करनेकी भाँति अग्निस्थानीय परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पहले अध्यायमें कहे हुए प्रकारसे शरीरको नीचेकी अरणि और ॐकारको ऊपरकी अरणि बनाकर उसका जप और उसके अर्थरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तनरूप मन्थन किया जाता है, जहाँ प्राणवायुका विधिपूर्वक भलीभाँति निरोध किया जाता है, जहाँ आनन्दरूप सोमरस अधिकतासे प्रकट होता है, उस ध्यानावस्थामे मनुष्यका मन सर्वथा विशुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् । तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्वमक्षिपत् ॥ ७ ॥ सवित्रा = सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमात्माके द्वारा; प्रसवेन = प्राप्त हुई प्रेरणासे; पूर्व्यम् = सबके आदि- कारण; ब्रह्म जुषेत = उस परब्रह्म परमेश्वरकी ही सेवा ( आराधना ) करनी चाहिये; तत्र = ( तू ) उस परमात्मामें ही, योनिम् = आश्रय, कृणवसे = प्राप्त कर; हि = क्योंकि; ( यों करनेसे ) ते = तेरे; पूर्वम् = पूर्व संचित कर्म; न अक्षिपत् = विघ्नकारक नहीं होंगे ॥ ७ ॥ व्याख्या - हे साधक ! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे अर्थात् ऊपर बताये हुए प्रकारसे परमात्माकी स्तुति करके उनसे अनुमति प्राप्तकर तुम्हे उन सबके आदि परब्रह्म परमात्माकी ही सेवा ( समाराधना ) करनी चाहिये । उन परमेश्वरमें ही आश्रय प्राप्त करना चाहिये - उन्हींकी शरण ग्रहण करके उन्हींमे अपने-आपको विलीन कर देना चाहिये । यों करनेसे तुम्हारे पहले किये हुए समस्त सचित कर्म विघ्नकारक नहीं होंगे - बन्धनरूप नहीं होंगे ॥ ७ ॥ सम्बन्ध - ध्यानयोगका साधन करनेवालेको किस प्रकार बैठकर कैसे ध्यान करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं- त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ ८ ॥ विद्वान् = बुद्धिमान् मनुष्य ( को चाहिये कि ); त्रिरुन्नतम् = सिर, गला और छाती - इन तीनों स्थानोंपर उभरे हुए; शरीरम् = शरीरको, समम् = सीधा, ( और ) स्थाप्य = स्थिर करके, ( तथा ) इन्द्रियाणि = समस्त इन्द्रियोंको; मनसा = मनके द्वारा; हृदि = हृदयमे, संनिवेश्य = निरुद्ध करके, ब्रह्मोडुपेन = ॐ काररूप नौकाद्वारा, सर्वाणि = सम्पूर्ण; भयावहानि = भयङ्कर; स्रोतांसि = स्रोतों ( प्रवाहों ) को, प्रतरेत = पार कर जाय ॥ ८ ॥ व्याख्या - जो ध्यानयोगका साधन करे, उस बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि ध्यानके समय जब आसन जमाकरे सुखपूर्वक बैठे, उस समय अपने सिर, गले और छातीको ऊँचा उठाये रक्खे, इधर-उधर न झुकने दे, तथा शरीरको सीधा और स्थिर रक्खे । क्योंकि शरीरको सीधा और स्थिर रक्खे बिना तथा सिर, गला और वक्षःस्थल ऊँचा किये बिना आलस्य, निद्रा और विक्षेपरूप विघ्न आ जाते हैं। अतः इन विघ्नोंसे बचनेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे ही बैठना चाहिये । इसके बाद समस्त इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर उनका मनके द्वारा हृदयमें निरोध कर लेना चाहिये । फिर ॐकाररूप नौकाका आश्रय लेकर अर्थात् ॐकारका जप और उसके वाच्य परब्रह्म परमात्माका ध्यान करके समस्त भयानक प्रवाहोंको