भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 401
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७३ पार कर लेना चाहिये । भाव यह है कि नाना योनियोंमें ले जानेवाली जितनी वासनाएँ हैं, वे सब जन्म मृत्युरूप भय देनेवाले स्रोत (प्रवाह) हैं । इन सबका त्याग करके सदाके लिये अमरपदको प्राप्त कर लेना चाहिये ॥ ८ ॥ प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत । दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ९॥ विद्वान् = बुद्धिमान् साधक (को चाहिये कि), इह = उपर्युक्त योगसाधनामें, संयुक्तचेष्टः = आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करते हुए, प्राणान् प्रपीड्य = विधिवत् प्राणायाम करके, प्राणे क्षीणे = प्राणके सूक्ष्म हो जानेपर; नासिकया = नासिकाद्वारा; उच्छ्वसीत = उनको बाहर निकाल दे; दुष्टाश्वयुक्तम् = (इसके बाद) दुष्ट घोड़ोंसे युक्त; वाहम् इव = रथको जिस प्रकार सारथि सावधानीपूर्वक गन्तव्य मार्गमें ले जाता है, उसी प्रकार, एनम् = इस, मनः = मनको, अप्रमत्तः = सावधान होकर, धारयेत = वशमें किये रहे ॥ ९ ॥ व्याख्या—बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह इस योग-साधनाके लिये आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करता रहे, उन्हें ध्यानयोगके लिये उपयोगी बना ले । तथा योगशास्त्रकी विधिके अनुसार प्राणायाम करते-करते जब प्राण अत्यन्त सूक्ष्म हो जाय, तब नासिकाद्वारा उसे बाहर निकाल दे* । इसके बाद जैसे दुष्ट घोड़ोंसे जुते हुए रथको अच्छा सारथि बड़ी सावधानीसे चलाकर अपने गन्तव्य स्थानपर ले जाता है, उसी प्रकार साधकको चाहिये कि बड़ी सावधानीके साथ अपने मनको वशमे रक्खे, जिससे योगसाधनमें किसी प्रकारका विघ्न न आये और वह परमात्माकी प्राप्तिरूप लक्ष्यपर पहुँच जाय † ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—परब्रह्म परमात्मामें मन लगानेके लिये कैसे स्थानमें कैसी भूमिपर बैठकर साधन करना चाहिये, इस जिज्ञासा- पर कहा जाता है— समे शुचौ शर्करावह्नवालुकाविवर्जिते शब्दजलाशयादिभिः । मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥ समे = समतल, शुचौ = सब प्रकारसे शुद्ध, शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते = कंकड़, अग्नि और बालूसे रहित; (तथा) शब्दजलाश्रयादिभिः = शब्द, जल और आश्रय आदिकी दृष्टिसे, अनुकूले = सर्वथा अनुकूल, तु = और, न चक्षुपीडने = नेत्रोंको पीड़ा न देनेवाले, गुहानिवाताश्रयणे = गुहा आदि वायुशून्य स्थानमें, मनः = मनको, प्रयोजयेत् = ध्यानमें लगानेका अभ्यास करना चाहिये ॥ १० ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें ध्यानयोगके उपयुक्त स्थानका वर्णन है । भाव यह है कि ध्यानयोगका साधन करनेवाले साधकको ऐसे स्थानमें अपना आसन लगाना चाहिये, जहाँकी भूमि समतल हो—ऊँची नीची, टेढ़ी-मेढ़ी न हो, जो सब प्रकारसे शुद्ध हो,—जहाँपर कूड़ा-कर्कट, मैला आदि न हो, झाड़-बुहारकर साफ किया हुआ हो और स्वभावसे भी पवित्र हो— जैसे कोई देवालय, तीर्थस्थान आदि, जहाँ कंकड़, बालू न हों और अग्नि या धूपकी गर्मी भी न हो; जहाँ कोई मनमें विक्षेप करनेवाला शब्द न होता हो—कोलाहलका सर्वथा अभाव हो, यथावश्यक जल प्राप्त हो सके, किंतु ऐसा जलाशय न हो जहाँ बहुत लोग आते-जाते हों, एव जहाँ शरीर रक्षाके लिये उपयुक्त आश्रय हो परंतु ऐसा न हो, जहाँ धर्मशाला आदिकी भाँति बहुत लोग ठहरते हों, तात्पर्य यह कि इन सब विचारोंके अनुसार जो सर्वथा अनुकूल हो और जहाँका दृश्य नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला—भयानक न हो, ऐसे गुफा आदि वायुशून्य एकान्त स्थानमें पहले बताये हुए प्रकारसे आसन लगाकर अपने मनको परमात्मामें लगानेका अभ्यास करना चाहिये ॥ १० ॥ सम्बन्ध—योगाभ्यास करनेवाले साधकका साधन ठीक हो रहा है या नहीं, इसकी पहचान बतायी जाती है—
  • आठवें और नवें मन्त्रोंमें जो ध्यानके लिये बैठनेकी और साधन करनेकी विधि बतायी गयी है, उसका बड़े सुन्दर ढंगसे सुस्पष्ट वर्णन भगवान्‌ने गीता अध्याय ६ श्लोक ११ से १७ तक किया है । † कठोपनिषद्में ( १ । ३ । २ से ८ तक ) रथके रूपकका विस्तृत वर्णन है ।