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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७३ पार कर लेना चाहिये । भाव यह है कि नाना योनियोंमें ले जानेवाली जितनी वासनाएँ हैं, वे सब जन्म मृत्युरूप भय देनेवाले स्रोत (प्रवाह) हैं । इन सबका त्याग करके सदाके लिये अमरपदको प्राप्त कर लेना चाहिये ॥ ८ ॥ प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत । दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ९॥ विद्वान् = बुद्धिमान् साधक (को चाहिये कि), इह = उपर्युक्त योगसाधनामें, संयुक्तचेष्टः = आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करते हुए, प्राणान् प्रपीड्य = विधिवत् प्राणायाम करके, प्राणे क्षीणे = प्राणके सूक्ष्म हो जानेपर; नासिकया = नासिकाद्वारा; उच्छ्वसीत = उनको बाहर निकाल दे; दुष्टाश्वयुक्तम् = (इसके बाद) दुष्ट घोड़ोंसे युक्त; वाहम् इव = रथको जिस प्रकार सारथि सावधानीपूर्वक गन्तव्य मार्गमें ले जाता है, उसी प्रकार, एनम् = इस, मनः = मनको, अप्रमत्तः = सावधान होकर, धारयेत = वशमें किये रहे ॥ ९ ॥ व्याख्या—बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह इस योग-साधनाके लिये आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करता रहे, उन्हें ध्यानयोगके लिये उपयोगी बना ले । तथा योगशास्त्रकी विधिके अनुसार प्राणायाम करते-करते जब प्राण अत्यन्त सूक्ष्म हो जाय, तब नासिकाद्वारा उसे बाहर निकाल दे* । इसके बाद जैसे दुष्ट घोड़ोंसे जुते हुए रथको अच्छा सारथि बड़ी सावधानीसे चलाकर अपने गन्तव्य स्थानपर ले जाता है, उसी प्रकार साधकको चाहिये कि बड़ी सावधानीके साथ अपने मनको वशमे रक्खे, जिससे योगसाधनमें किसी प्रकारका विघ्न न आये और वह परमात्माकी प्राप्तिरूप लक्ष्यपर पहुँच जाय † ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—परब्रह्म परमात्मामें मन लगानेके लिये कैसे स्थानमें कैसी भूमिपर बैठकर साधन करना चाहिये, इस जिज्ञासा- पर कहा जाता है— समे शुचौ शर्करावह्नवालुकाविवर्जिते शब्दजलाशयादिभिः । मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥ समे = समतल, शुचौ = सब प्रकारसे शुद्ध, शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते = कंकड़, अग्नि और बालूसे रहित; (तथा) शब्दजलाश्रयादिभिः = शब्द, जल और आश्रय आदिकी दृष्टिसे, अनुकूले = सर्वथा अनुकूल, तु = और, न चक्षुपीडने = नेत्रोंको पीड़ा न देनेवाले, गुहानिवाताश्रयणे = गुहा आदि वायुशून्य स्थानमें, मनः = मनको, प्रयोजयेत् = ध्यानमें लगानेका अभ्यास करना चाहिये ॥ १० ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें ध्यानयोगके उपयुक्त स्थानका वर्णन है । भाव यह है कि ध्यानयोगका साधन करनेवाले साधकको ऐसे स्थानमें अपना आसन लगाना चाहिये, जहाँकी भूमि समतल हो—ऊँची नीची, टेढ़ी-मेढ़ी न हो, जो सब प्रकारसे शुद्ध हो,—जहाँपर कूड़ा-कर्कट, मैला आदि न हो, झाड़-बुहारकर साफ किया हुआ हो और स्वभावसे भी पवित्र हो— जैसे कोई देवालय, तीर्थस्थान आदि, जहाँ कंकड़, बालू न हों और अग्नि या धूपकी गर्मी भी न हो; जहाँ कोई मनमें विक्षेप करनेवाला शब्द न होता हो—कोलाहलका सर्वथा अभाव हो, यथावश्यक जल प्राप्त हो सके, किंतु ऐसा जलाशय न हो जहाँ बहुत लोग आते-जाते हों, एव जहाँ शरीर रक्षाके लिये उपयुक्त आश्रय हो परंतु ऐसा न हो, जहाँ धर्मशाला आदिकी भाँति बहुत लोग ठहरते हों, तात्पर्य यह कि इन सब विचारोंके अनुसार जो सर्वथा अनुकूल हो और जहाँका दृश्य नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला—भयानक न हो, ऐसे गुफा आदि वायुशून्य एकान्त स्थानमें पहले बताये हुए प्रकारसे आसन लगाकर अपने मनको परमात्मामें लगानेका अभ्यास करना चाहिये ॥ १० ॥ सम्बन्ध—योगाभ्यास करनेवाले साधकका साधन ठीक हो रहा है या नहीं, इसकी पहचान बतायी जाती है—
  • आठवें और नवें मन्त्रोंमें जो ध्यानके लिये बैठनेकी और साधन करनेकी विधि बतायी गयी है, उसका बड़े सुन्दर ढंगसे सुस्पष्ट वर्णन भगवान्‌ने गीता अध्याय ६ श्लोक ११ से १७ तक किया है । † कठोपनिषद्में ( १ । ३ । २ से ८ तक ) रथके रूपकका विस्तृत वर्णन है ।

३७४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * नीहारधूमाक्र्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् । एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥११॥ ब्रह्मणि योगे = परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले योगमें; (पहले) नीहारधूमाक्र्कानिलानलानाम् = कुहरा, धुआँ, सूर्य, वायु और अग्निके सदृश; (तथा) खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् = जुगनू, बिजली, स्फटिक मणि और चन्द्रमाके सदृश; रूपाणि = बहुत से दृश्य, पुरःसराणि [भवन्ति]=योगीके सामने प्रकट होते हैं; एतानि = ये सब; अभिव्यक्तिकराणि = योगकी सफलताको स्पष्टरूपसे सूचित करनेवाले हैं ॥ ११ ॥ व्याख्या - जब साधक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ध्यानयोगका साधन आरम्भ करता है, तब उसको अपने सामने कभी कुहरेके सदृश रूप दीखता है, कभी धूआँ सा दिखायी देता है, कभी सूर्यके समान प्रकाश सर्वत्र परिपूर्ण दीखता है, कभी निःशब्द वायुकी भाँति निराकार रूप अनुभवमें आता है, कभी अग्निके सदृश तेज दीख पड़ता है, कभी जुगनूके सदृश टिमटिमाहट सी प्रतीत होती है, कभी बिजलीकी सी चकाचौंध पैदा करनेवाली दीप्ति दृष्टिगोचर होती है, कभी स्फटिक- मणिके सदृश उज्ज्वल रूप देखनेमें आता है और कभी चन्द्रमाकी भाँति शीतल प्रकाश सर्वत्र फैला हुआ दिखायी देता है। ये सब तथा और भी अनेक दृश्य योग-साधनकी उन्नतिके द्योतक हैं। इनसे यह बात समझमें आती है कि साधकका ध्यान ठीक हो रहा है ॥ ११ ॥ पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥१२॥ पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते = पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश-इन पाँचों महाभूतोंका सम्यक् प्रकारसे उत्थान होनेपर; (तथा) पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते = इनसे सम्बन्ध रखनेवाले पाँच प्रकारके योगसम्बन्धी गुणोंकी सिद्धि हो जानेपर; योगाग्निमयम् = योगाग्निमय; शरीरम् = शरीरको; प्राप्तस्य = प्राप्त कर लेनेवाले, तस्य = उस साधकको, न = न तो, रोगः = रोग होता है, न = न, जरा = बुढ़ापा आता है; न = और न; मृत्युः = उसकी मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥ व्याख्या - ध्यानयोगका साधन करते करते जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश-इन पाँच महाभूतोंका उत्थान हो जाता है, अर्थात् जब साधकका इन पाँचों महाभूतोंपर अधिकार हो जाता है, और इन पाँचों महाभूतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली योगविषयक पाँचों सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, उस समय योगाग्निमय शरीरको प्राप्त कर लेनेवाले उस योगीके शरीरमे न तो रोग होता है, न बुढ़ापा आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है। अभिप्राय यह कि उसकी इच्छाके बिना उसका शरीर नष्ट नहीं हो सकता ॥ १२ ॥ लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च। गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥१३॥ लघुत्वम् = शरीरका हल्कापन, आरोग्यम् = किसी प्रकारके रोगका न होना, अलोलुपत्वम् = विषयासक्तिकी निवृत्ति; वर्णप्रसादम् = शारीरिक वर्णकी उज्ज्वलता; स्वरसौष्ठवम् = स्वरकी मधुरता; शुभः गन्धः = (शरीरमे) अच्छी गन्ध; च = और, मूत्रपुरीषम् = मल मूत्र, अल्पम् = कम हो जाना; (इन सबको) प्रथमाम् योगप्रवृत्तिम् = योगकी पहली सिद्धि, वदन्ति = कहते हैं ॥ १३ ॥ व्याख्या - भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले ध्यानयोगीमें पूर्वोक्त शक्तियोंके सिवा और भी शक्तियाँ आ जाती हैं। उदाहरणतः उसका शरीर हल्का हो जाता है, शरीरमें भारीपन या आलस्यका भाव नहीं रहता। वह सदा ही नीरोग रहता है, उसे कभी कोई रोग नहीं होता। भौतिक पदार्थोंमें उसकी आसक्ति नष्ट हो जाती है। कोई भी भौतिक पदार्थ सामने आनेपर उसके मन और इन्द्रियोंका उसकी ओर आकर्षण नहीं होता। उसके शरीरका वर्ण उज्ज्वल हो जाता है। स्वर अत्यन्त

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७५ मधुर और स्पष्ट हो जाता है । शरीरमेंसे बहुत अच्छी गन्ध निकलकर सब ओर फैल जाती है । मल और मूत्र बहुत ही स्वल्प मात्रामें होने लगते हैं । ये सब योगमार्गकी प्रारम्भिक सिद्धियाँ हैं—ऐसा योगीलोग कहते हैं ॥ १३ ॥ यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् । तद्वाऽऽत्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः ॥१४॥ यथा=जिस प्रकार, मृदया=मिट्टीसे, उपलिप्तम्=लिप्त होकर मलिन हुआ, [यत् = जो,] तेजोमयम् = प्रकाशयुक्त, बिम्बम्=रत्न है, तत् एव =वही, सुधान्तम्=भलीभाँति धुल जानेपर, भ्राजते= चमकने लगता है, तत् वा= उसी प्रकार, देही = शरीरधारी (जीवात्मा ), आत्मतत्त्वम् = ( मल आदिसे रहित ) आत्म तत्त्वको, प्रसमीक्ष्य = (योगके द्वारा ) भलीभाँति प्रत्यक्ष करके, एकः =अकेला, कैवल्य अवस्थाको प्राप्त, वीतशोकः = सब प्रकारके दुःखोंसे रहित, (तथा ) कृतार्थः =कृतकृत्य, भवते=हो जाता है ॥ १४ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार कोई तेजोमय रत्न मिट्टीसे लिप्त रहनेके कारण छिपा रहता है, अपने असली रूपमें प्रकट नहीं होता, परंतु वही जब मिट्टी आदिको हटाकर धो पोछकर साफ कर लिया जाता है, तब अपने असली रूपमें चमकने लगता है; उसी प्रकार इस जीवात्माका वास्तविक स्वरूप अत्यन्त स्वच्छ होनेपर भी अनन्त जन्मोंमे किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे मलिन हो जानेके कारण प्रत्यक्ष प्रकट नहीं होता, परन्तु जब मनुष्य ध्यानयोगके साधनद्वारा समस्त मलोंको धोकर आत्माके यथार्थ स्वरूपको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह असङ्ग हो जाता है । अर्थात् उसका जो जड पदार्थोंके साथ संयोग हो रहा था, उसका नाश होकर वह कैवल्य अवस्थाको प्राप्त हो जाता है । तथा उसके सब प्रकारके दुःखोंका अन्त होकर वह सर्वथा कृतकृत्य हो जाता है । उसका मनुष्य-जन्म सार्थक हो जाता है ॥ १४ ॥ यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् । अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१५॥ तु= उसके बाद, यदा = जब, युक्तः = वह योगी, इह=यहाँ, दीपोपमेन=दीपकके सदृश ( प्रकाशमय ), आत्म- तत्त्वेन=आत्मतत्त्वके द्वारा; ब्रह्मतत्त्वम्=ब्रह्मतत्त्वको, प्रपश्येत्=भलीभाँति प्रत्यक्ष देख लेता है, [तदा सः = उस समय वह; ] अजम् = ( उस ) अजन्मा, ध्रुवम् = निश्चल, सर्वतत्त्वैः = समस्त तत्त्वोंसे, विशुद्धम् = विशुद्ध, देवम् = परमदेव परमात्माको, ज्ञात्वा= जानकर, सर्वपाशैः = सब बन्धनोंसे, मुच्यते=सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—फिर जब वह योगी इसी स्थितिमें दीपकके सदृश निर्मल प्रकाशमय पूर्वोक्त आत्मतत्त्वके द्वारा ब्रह्मतत्त्वको भलीभाँति देख लेता है—अर्थात् उन परब्रह्म परमात्माको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उन जन्मादि समस्त विकारोंसे रहित, अचल और निश्चित तथा समस्त तत्त्वोंसे असङ्ग—सर्वथा विशुद्ध परम देव परमात्माको तत्त्वसे जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये छूट जाता है । इस मन्त्रमे आत्मतत्त्वसे ब्रह्मतत्त्वको जाननेकी बात कहकर यह भाव दिखाया गया है कि परमात्माका साक्षात्कार मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा नहीं हो सकता । इन सबकी वहाँ पहुँच नहीं है, वे एकमात्र आत्मतत्त्वके द्वारा ही प्रत्यक्ष होते हैं ॥ १५ ॥ एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥१६॥ ह= निश्चय ही, एषः= यह ( ऊपर बताया हुआ ), देवः = परमदेव परमात्मा, सर्वाः = समस्त, प्रदिशः अनु= दिशाओं और अवान्तर दिशाओंमें अनुगत ( व्याप्त ) है, [ सः ] ह = वही— प्रसिद्ध परमात्मा, पूर्वः = सबसे पहले, जातः = हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था, ( और ) सः उ =वही, गर्भे= समस्त ब्रह्माण्डरूप गर्भमें, अन्तः = अन्तर्यामीरूपसे स्थित है, सः एव=वही; जातः = इस समय जगत्के रूपमे प्रकट है, सः = और वही; जनिष्यमाणः = भविष्यमें भी प्रकट होने-

वाला है, [ सः = वह, ] जनान् प्रत्यङ् = सब जीवोंके भीतर, ( अन्तर्यामीरूपसे ) तिष्ठति = स्थित है; (और) सर्वतोमुखः = सब ओर मुखवाला है ॥ १६ ॥ व्याख्या - निश्चय ही ये ऊपर बताये हुए परमदेव ब्रह्म समस्त दिशा और अवान्तर दिशाओमे व्याप्त हे अर्थात् सर्वत्र परिपूर्ण हैं। जगत्में कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ वे न हों । वे ही प्रसिद्ध परब्रह्म परमात्मा सबसे पहले हिरण्य- गर्भरूपमें प्रकट हुए थे । वे ही इस ब्रह्माण्डरूप गर्भमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं । वे ही इस समय जगत्के रूपमे प्रकट हैं और भविष्यमें अर्थात् प्रलयके बाद सृष्टिकालमे पुनः प्रकट होनेवाले हैं । वे समस्त जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं, तथा सब ओर मुखवाले अर्थात् सबको सब ओरसे देखनेवाले हैं ॥ १६ ॥ यो देवो अग्नौ यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश । य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥१७॥ यः = जो, देवः = परमदेव परमात्मा; अग्नौ = अग्निमें है; यः = जो, अप्सु = जलमे है, यः = जो; विश्वम् भुवनम् आविवेश = समस्त लोकोमे प्रविष्ट हो रहा है, यः = जो, ओषधीषु = ओषधियोंमे है, ( तथा ) यः = जो; वनस्पतिषु = वनस्पतियोंमें है, तस्मै देवाय = उन परमदेव परमात्माके लिये; नमः = नमस्कार है; नमः = नमस्कार है ॥ १७ ॥ व्याख्या - जो सर्वशक्तिमान् पूर्णब्रह्म परमदेव अग्निमे है, जो जलमे हे, जो समस्त लोकोंमे अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हो रहे हैं, जो ओषधियोंमें हैं और जो वनस्पतियोमे है, अर्थात् जो सर्वत्र परिपूर्ण हैं, जिनका अनेक प्रकारसे पहले वर्णन कर आये हैं, उन परमदेव परमात्माको नमस्कार है ! नमस्कार है । 'नमः' शब्द को दुहरानेका अभिप्राय अध्यायकी समाप्तिको सूचित करना है ॥१७॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अध्याय य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वाँल्लोकानीशत ईशनीभिः । य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥ यः = जो, एकः = एक; जालवान् = जगत्रूप जालका अधिपति, ईशनीभिः = अपनी स्वरूपभूत शासनशक्तियोद्वारा, ईशते = शासन करता है, ईशनीभिः = उन विविध शासन शक्तियोँद्वारा, सर्वान् = सम्पूर्ण, लोकान् ईशते = लोकोपर शासन करता है, यः = ( तथा ) जो; एकः = अकेला, एव = ही, सम्भवे च उद्भवे = सृष्टि और उसके विस्तारमें ( सर्वथा समर्थ है); एतत् = इस ब्रह्मको, ये = जो महापुरुष, विदुः = जान लेते हैं, ते = वे; अमृताः = अमर, भवन्ति = हो जाते हैं ॥ १ ॥ व्याख्या - जो एक-अद्वितीय परमात्मा जगत्-रूप जालकी रचना करके अपनी स्वरूपभूत शासन शक्तियोँद्वारा उसपर शासन कर रहे हैं, तथा उन विविध शासन शक्तियोद्वारा समस्त लोकों और लोकपालोंका यथायोग्य सचालन कर रहे हैं- जिनके शासनमें ये सब अपने-अपने कर्तव्योंका नियमपूर्वक पालन कर रहे है, तथा जो अकेले ही विना किसी दूसरेकी सहायता लिये समस्त जगत्की उत्पत्ति और उसका विस्तार करनेमे सर्वथा समर्थ हैं, उन परब्रह्म परमेश्वरको जो महापुरुष तत्त्वसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं-जन्म-मृत्युके जालसे सदाके लिये छूट जाते हैं ॥ १ ॥ एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः । प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥ २ ॥ यः = जो; ईशनीभिः = अपनी स्वरूपभूत विविध शासन शक्तियोँद्वारा, इमान् = इन सब, लोकान् ईशते = लोकोंपर शासन करता है, [ सः ] रुद्रः = वह रुद्र; एकः हि = एक ही है, (इसीलिये विद्वान् पुरुषोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय ) द्वितीयाय न तस्थुः = दूसरेका आश्रय नही लिया, [ सः = वह परमात्मा, ] जनान् प्रत्यङ् = समस्त

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७७ जीवोंके भीतर, तिष्ठति=स्थित हो रहा है, विश्वा=सम्पूर्ण; भुवनानि संसृज्य=लोकोंकी रचना करके, गोपाः=उनकी रक्षा करनेवाला परमेश्वर; अन्तकाले=प्रलयकालमें; संचुकोच=इन सबको समेट लेता है ॥ २ ॥ व्याख्या—जो अपनी स्वरूपभूत विविध शासन-शक्तियोंद्वारा इन सब लोकोंपर शासन करते हैं—उनका नियमानुसार संचालन करते हैं, वे परमेश्वर एक ही हैं। अर्थात् यद्यपि इस विश्वका नियमन करनेवाली शक्तियाँ अनेक हैं, वे सब हैं एक ही परमेश्वरकी शक्तियाँ, अलग-अलग नहीं हैं। इसी कारण, ज्ञानीजनोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय किसी भी दूसरे तत्त्वका आश्रय नहीं लिया। सबने एक स्वरसे यही निश्चय किया कि एक परब्रह्म ही इस जगत्के कारण है। वे परमात्मा सब जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इन समस्त लोकोंकी रचना करके उनकी रक्षा करनेवाले परमेश्वर प्रलयकालमें स्वयं ही इन सबको समेट लेते हैं, अर्थात् अपनेमें विलीन कर लेते हैं। उस समय इनकी भिन्न-भिन्न रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं रहती ॥ २ ॥ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ॥ ३ ॥ विश्वतश्चक्षुः=सब जगह आँखवाला, उत=तथा; विश्वतोमुखः=सब जगह मुखवाला; विश्वतोबाहुः=सब जगह हाथवाला, उत=और; विश्वतस्पात्=सब जगह पैरवाला; द्यावाभूमी जनयन्=आकाश और पृथ्वीकी सृष्टि करनेवाला, [ सः=वह, ] एकः=एकमात्र, देवः=देव ( परमात्मा ); बाहुभ्याम्=मनुष्य आदि जीवोंको दो दो बाँहोंसे; संधमति=युक्त करता है, ( तथा ) पतत्रैः=(पक्षी-पतंग आदिको) पाँखोंसे, सं [धमति]=युक्त करता है॥ ३ ॥ व्याख्या—वे परमदेव परमेश्वर एक हैं, फिर भी उनकी सब जगह आँखें हैं, सब जगह मुख हैं, सब जगह हाथ हैं और सब जगह पैर हैं। भाव यह कि वे सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित समस्त जीवोंके कर्म और विचारोंको तथा समस्त घटनाओंको अपनी दिव्य शक्तिद्वारा निरन्तर देखते रहते हैं, कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती। उनका भक्त उनको जहाँ-कहीं भोजनके योग्य वस्तु समर्पित करता है, उसे वे वहीं भोग लगा सकते हैं। वे सब जगह प्रत्येक वस्तुको एक साथ ग्रहण करनेमें और अपने आश्रित जनोंके संकटका नाश करके उनकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, तथा जहाँ-कहीं उनके भक्त उन्हें बुलाना चाहें, वहीं वे एक साथ पहुँच सकते हैं। संसारमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ उनकी ये शक्तियाँ विद्यमान न हों। आकाशसे लेकर पृथ्वीतक समस्त लोकोंकी रचना करनेवाले एक ही परमदेव परमेश्वर मनुष्य आदि प्राणियोंको दो-दो भुजाओंसे और पक्षियोंको पाँखोंसे युक्त करते हैं। भाव यह कि वे समस्त प्राणियोंको आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न शक्तियों एव साधनोंसे सम्पन्न करते हैं। यहाँ भुजा और पाँखोंका कथन उपलक्षणमात्र है। इससे यह समझ लेना चाहिये कि समस्त प्राणियोंमें जो कुछ भी शक्ति है, वह सब परमात्माकी ही दी हुई है ॥ ३ ॥ यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ४ ॥ यः=जो, रुद्रः=रुद्र; देवानाम्=इन्द्रादि देवताओंकी, प्रभवः=उत्पत्तिका हेतु; च=और; उद्भवः= वृद्धिका हेतु है, च=तथा; (जो) विश्वाधिपः=सबका अधिपति; (और) महर्षिः=महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है; पूर्वम्=(जिसने) पहले; हिरण्यगर्भम्=हिरण्यगर्भको; जनयामास=उत्पन्न किया था; सः=वह परमदेव परमेश्वर, नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे; संयुनक्तु=संयुक्त करे ॥ ४ ॥ व्याख्या—सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानी—सर्वज्ञ हैं; जिन्होंने सृष्टिके आदिमें हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया था, वे परमदेव परमात्मा हमलोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें ॥ ४ ॥ या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ ५ ॥ उ० सं० ४८-

३७८ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * रुद्र = हे रुद्रदेव, ने = तेरी, या = जो अघोरा = भयानकतासे शून्य (सौम्य); अपापकाशिनी = पुण्यने प्रकाशित होनेवाली (तथा) शिवा = कल्याणमयी, तनूः = मूर्ति है गिरिशन्त = हे पर्वतपर रहकर सुखका विस्तार करनेवाले शिव, तया = उस, शान्तमया तनुवा = परम शान्त मूर्तिसे, (तू कृपा करके) न अभिचाकशीहि = हमलोगोंको देखो ॥ ५ ॥ व्याख्या- हे रुद्रदेव ! आपकी जो भयानकतासे शून्य तथा पुण्यकर्मसे प्रकाशित होनेवाली कल्याणमयी सौम्यमूर्ति है— जिसका दर्शन करके मनुष्य परम आनन्दमें मग्न हो जाता है—हे गिरिशन्त अर्थात् पर्वतपर निवास करते हुए समस्त लोकोंको सुख पहुँचानेवाले परमेश्वर ! उस परमशान्त मूर्तिसे ही कृपा करके आप हमलोगोंकी ओर देखिये । आपकी कृपादृष्टि पड़ते ही हम सर्वथा पवित्र होकर आपकी प्राप्तिके योग्य बन जायँगे ॥ ५ ॥ यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हि१सीः पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥ गिरिशन्त = हे गिरिशन्त ! याम् = जिस, इषुम् = बाणको अस्तवे = फेंकनेके लिये, (तू) हस्ते = हाथमें, बिभर्षि = धारण किये हुए है, गिरित्र = हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले देव !, ताम् = उस बाणको, शिवाम् = कल्याणमय, कुरु = बना ले, पुरुषम् = जीव-समुदायरूप, जगत् = जगत्‌को, मा हिंसीः = नष्ट न कर (कष्ट न दे ) ॥ ६ ॥ व्याख्या- हे गिरिशन्त—हे कैलासवासी सुखदायक परमेश्वर ! जिस बाणको फेंकनेके लिये आपने हाथमें ले रक्खा है, हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले ! आप उस बाणको कल्याणमय बना ले—उसकी क्रूरताको नष्ट करके उसे शान्तिमय बना लें । इस जीवसमुदायरूप जगत्‌को कष्ट न दे—इसका विनाश न करें ॥ ६ ॥ ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥ ततः = पूर्वोक्त जीव-समुदायरूप जगत्‌से, परम् = परे, (और) ब्रह्मपरम् = हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, सर्वभूतेषु = समस्त प्राणियोंमें, यथानिकायम् = उनके शरीरोंके अनुरूप होकर, गूढम् = छिपे हुए, (और) विश्वस्य परिवेष्टितारम् = सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे घेरे हुए, तम् = उस, बृहन्तम् = महान्, सर्वत्र व्यापक, एकम् = एकमात्र देव, ईशम् = परमेश्वरको, ज्ञात्वा = जानकर, अमृताः भवन्ति = (ज्ञानीजन) अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या- जो पहले कहे हुए जीव-समुदायरूप जगत्‌से और हिरण्यगर्भ नामक ब्रह्मासे भी सर्वथा श्रेष्ठ हैं, समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरोंके अनुरूप होकर छिपे हुए हैं; समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरे हुए हैं; तथा सर्वत्र व्याप्त और महान् हैं; उन एकमात्र परमेश्वरको जानकर ज्ञानीजन सदाके लिये अमर हो जाते हैं; फिर कभी उनका जन्म-मरण नहीं होता ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-अब इस मन्त्रमें ज्ञानी महापुरुषके अनुभवकी बात कहकर परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ता दिखलाते हैं— वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था - विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥ तमसः परस्तात् = अविद्यारूप अन्धकारसे अतीत, (तथा) आदित्यवर्णम् = सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप; एतम् = इस, महान्तम् पुरुषम् = महान् पुरुष (परमेश्वर) को, अहम् = मैं, वेद = जानता हूँ, तम् = उसको, विदित्वा = जान- कर; एव = ही, (मनुष्य) मृत्युम् = मृत्युको अत्येति (अति+एति) = उल्लङ्घन कर जाता है, अयनाय = (परमपदकी) प्राप्तिके लिये, अन्यः = दूसरा, पन्थाः = मार्ग, न = नहीं विद्यते = है ॥ ८ ॥ व्याख्या-कोई ज्ञानी महापुरुष कहता है—'इन महान्‌से भी महान् परम पुरुषोत्तमको मैं जानता हूँ । वे अविद्या- रूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत हैं तथा सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं। उनको जानकर ही मनुष्य मृत्युका उल्लङ्घन करनेमें

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७९ —इस जन्म मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छुटकारा पानेमें समर्थ होता है। परम पदकी प्राप्तिके लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग अर्थात् उपाय नहीं है ॥ ८ ॥ यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९ ॥ यस्मात् परम् = जिससे श्रेष्ठ, अपरम् = दूसरा; किंचित् = कुछ भी; न = नहीं, अस्ति = है, यस्मात् = जिससे (बढकर), कश्चित् = कोई भी; न = न तो, अणीयः = अधिक सूक्ष्म, न = और न, ज्यायः = महान् ही, अस्ति = है, एकः = (जो) अकेला ही, वृक्षः इव = वृक्षकी भाँति, स्तब्धः = निश्चलभावसे; दिवि = प्रकाशमय आकाशमें, तिष्ठति = स्थित है, तेन पुरुषेण = उस परमपुरुष पुरुषोत्तमसे, इदम् = यह; सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्, पूर्णम् = परिपूर्ण है ॥ ९ ॥ व्याख्या—उन परमदेव परमेश्वरसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है, वे सर्वश्रेष्ठ हैं। जितने भी सूक्ष्म तत्त्व हैं, उन सबसे अधिक सूक्ष्म वे परमेश्वर हैं। उनसे अधिक सूक्ष्म कोई भी नहीं है। इसीसे वे छोटे-से छोटे जीवके शरीरमें प्रविष्ट होकर स्थित हैं। इसी प्रकार जितने भी महान् व्यापक तत्त्व हैं, उन सबसे महान्—अधिक व्यापक वे परब्रह्म हैं, उनसे बड़ा—उनसे अधिक व्यापक कोई भी नहीं है। इसीसे वे प्रलयकालमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपने अदर लीन कर लेते हैं। जो अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चलभावसे परमधामरूप प्रकाशमय दिव्य आकाशमें स्थित हैं, वे परम पुरुष परमेश्वर निराकाररूपसे सारे जगत्में परिपूर्ण हैं ॥ ९ ॥ ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम् । य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥१०॥ ततः = उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे, यत् = जो, उत्तरतरम् = अत्यन्त उत्कृष्ट है, तत् = वह परब्रह्म परमात्मा; अरूपम् = आकाररहित, (और) अनामयम् = सब प्रकारके दोषोंसे शून्य है; ये = जो, एतत् = इस परब्रह्म परमात्माको; विदुः = जानते हैं, ते = वे, अमृताः = अमर, भवन्ति = हो जाते हैं; अथ = परन्तु; इतरे = इस रहस्यको न जाननेवाले दूसरे लोग; (वार-वार) दुःखम् = दुःखको, एव = ही; अपियन्ति = प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥ व्याख्या—उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे जो सब प्रकारसे अत्यन्त उत्कृष्ट हैं, वे परब्रह्म परमात्मा आकाररहित और सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य हैं; जो कोई महापुरुष इन परब्रह्म परमात्माको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं— सदाके लिये जन्म-मृत्युके दुःखोंसे छूट जाते हैं। परंतु जो इन्हें नहीं जानते, वे सब लोग निश्चयपूर्वक बार-बार दुःखोंको प्राप्त होते हैं। अतः मनुष्यको सदाके लिये दुःखोंसे छूटने और परमानन्दस्वरूप परमात्माको पानेके लिये उन्हें जानना चाहिये ॥१०॥ सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः । सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥११॥ सः = वह, भगवान् = भगवान्, सर्वाननशिरोग्रीवः = सब ओर मुख, सिर और ग्रीवावाला है, सर्वभूतगुहाशयः = समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करता है, (और) सर्वव्यापी = सर्वव्यापी है, तस्मात् = इसलिये, सः = वह, शिवः = कल्याणस्वरूप परमेश्वर, सर्वगतः = सब जगह पहुँचा हुआ है ॥ ११ ॥ व्याख्या—उन सर्वेश्वर भगवान्‌के सभी जगह मुख हैं, सभी जगह सिर और सभी जगह गला हैं। भाव यह कि वे प्रत्येक स्थानपर प्रत्येक अङ्गद्वारा किया जानेवाला कार्य करनेमें समर्थ हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करते हैं और सर्वव्यापी हैं, इसलिये वे कल्याणस्वरूप परमेश्वर सभी जगह पहुँचे हुए हैं। अभिप्राय यह कि साधक उनको जिस समय, जहाँ और जिस रूपमें प्रत्यक्ष करना चाहे, उसी समय, उसी जगह और उसी रूपमें वे प्रत्यक्ष हो सकते हैं ॥ ११ ॥ महान्प्रभुर्वे पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः । सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥१२॥

३८० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * वै = निश्चय ही; एषः = यह; महान् = महान्, प्रभुः = समर्थ, ईशानः = सबपर शासन करनेवाला; अव्ययः = अविनाशी; (एव) ज्योतिः = प्रकाशस्वरूप, पुरुषः = परमपुरुष पुरुषोत्तम, इमाम् सुनिर्मलाम् प्राप्तिम् [प्रति] = अपनी प्राप्तिरूप इस अत्यन्त निर्मल लाभकी ओर, सत्त्वस्य प्रवर्तकः = अन्तःकरणको प्रेरित करनेवाला है ॥ १२ ॥ व्याख्या—निश्चय ही ये सबपर शासन करनेवाले, महान्, प्रभु तथा अविनाशी और प्रकाशस्वरूप परम पुरुष पुरुषोत्तम पहले बताये हुए इस परम निर्मल लाभके प्रति अर्थात् अपने आनन्दमय विशुद्ध स्वरूपकी प्राप्तिकी ओर मनुष्यके अन्तःकरणको प्रेरित करते हैं, हरेक मनुष्यको ये अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तथापि यह मूर्ख जीव सब प्रकारका सुयोग पाकर भी उनकी प्रेरणाके अनुसार उनकी प्राप्तिके लिये तत्परतासे चेष्टा नहीं करता, इसी कारण मारा मारा फिरता है ॥ १२ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मन्वीशो मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१३॥ अङ्गुष्ठमात्रः = (यह) अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; अन्तरात्मा = अन्तर्यामी, पुरुषः = परम पुरुष (पुरुषोत्तम); सदा = सदा ही, जनानाम् = मनुष्योंके, हृदये = हृदयमें; संनिविष्टः = सम्यक् प्रकारसे स्थित है, मन्वीशः = मनका स्वामी है, (तथा) हृदा = निर्मल हृदय, (और) मनसा = विशुद्ध मनसे; अभिक्लृप्तः = ध्यानमें लाया हुआ (प्रत्यक्ष होता है), ये = जो; एतत् = इस परब्रह्म परमेश्वरको, विदुः = जान लेते हैं; ते = वे; अमृताः = अमर; भवन्ति = हो जाते हैं ॥ १३ ॥ व्याख्या—अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाले अन्तर्यामी परमपुरुष परमेश्वर सदा ही मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं और मनके स्वामी हैं, तथा निर्मल हृदय और विशुद्ध मनके द्वारा ध्यानमें लाये जाकर प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इन परब्रह्म परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं, अर्थात् सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं—अमृतस्वरूप बन जाते हैं। यहाँ परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला इसलिये बताया गया है कि मनुष्यका हृदय अंगूठेके नापका होता है और वही परमात्माकी उपलब्धिक स्थान है। ब्रह्मसूत्रमें भी इस विषयपर विचार करके यही निश्चय किया गया है (ब्र० सू० १।३। २४-२५) ॥ १३ ॥ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१४॥ पुरुषः = वह परम पुरुष; सहस्रशीर्षा = हजारों सिरवाला, सहस्राक्षः = हजारों आँखवाला, सहस्रपात् = (और) हजारों पैरवाला है; सः = वह; भूमिम् = समस्त जगत्‌को; विश्वतः = सब ओरसे, वृत्वा = घेरकर, दशाङ्गुलम् अति = नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर (हृदयमें); अतिष्ठत् = स्थित है ॥ १४ ॥ व्याख्या—उन परम पुरुष परमेश्वरके हजारों सिर, हजारों आँखें और हजारों पैर हैं। अर्थात् सब अवयवोंसे रहित होनेपर भी उनके सिर, आँख और पैर आदि सभी अङ्ग अनन्त और असंख्य हैं। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरकर सर्वत्र व्याप्त हुए ही नाभिसे दस अंगुल ऊपर हृदयाकाशमें स्थित हैं। वे सर्वव्यापी और महान् होते हुए ही हृदयरूप एकदेशमें स्थित हैं। वे अनेक विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं ॥ १४ ॥ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥१५॥ यत् = जो, भूतम् = अबसे पहले हो चुका है, यत् = जो; भव्यम् = भविष्यमें होनेवाला है; च = और, यत् = जो, अन्नेन = खाद्य पदार्थोंसे, अतिरोहति = इस समय बढ़ रहा है, इदम् = यह; सर्वम् = समस्त जगत्, पुरुषः एव = परम पुरुष परमात्मा ही है; उत = और; (वही) अमृतत्वस्य = अमृतस्वरूप मोक्षका; ईशानः = स्वामी है ॥ १५ ॥

व्याख्या—जो सबसे पहले हो चुका है, जो भविष्यमे होनेवाला है और जो वर्तमान कालमें अन्नके द्वारा अर्थात् खाद्य पदार्थोंके द्वारा बढ़ रहा है, वह समस्त जगत् परम पुरुष परमात्माका ही स्वरूप है। वे स्वयं ही अपनी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिसे इस रूपमें प्रकट होते हैं; तथा वे ही अमृतरूप मोक्षके स्वामी हैं अर्थात् जीवोंको संसार-बन्धनसे छुड़ाकर अपनी प्राप्ति करा देते हैं। अतएव उनकी प्राप्तिके अभिलाषी साधकोंको उन्हींकी शरणमें जाना चाहिये ॥ १५ ॥ सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१६॥ तत् = वह परम पुरुष परमात्मा; सर्वतःपाणिपादम् = सब जगह हाथ-पैरवाला; सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् = सब जगह आँख, सिर और मुखवाला; ( तथा ) सर्वतःश्रुतिमत् = सब जगह कानोंवाला है, ( वही ) लोके = ब्रह्माण्डमे, सर्वम् = सबको, आवृत्य = सब ओरसे घेरकर; तिष्ठति = स्थित है ॥ १६ ॥ व्याख्या-उन परमात्माके हाथ, पैर, आँखें, सिर, मुख और कान सब जगह हैं। वे सब जगह सब शक्तियोंसे सब कार्य करनेमें समर्थ हैं। उन्होंने सभी जगह अपने भक्तोंकी रक्षा करने तथा उन्हें अपनी ओर खींचनेके लिये हाथ बढ़ा रक्खा है। उनका भक्त उन्हें जहाँ चाहता है, वहीं उन्हें पहुँचा हुआ पाता है। वे सब जगह सब जीवोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंको देख रहे हैं। उनका भक्त जहाँ उन्हें प्रणाम करता है, सर्वत्र व्याप्त होनेके कारण उनके चरण और सिर आदि अङ्ग वहीं मौजूद रहते हैं। अपने भक्तकी प्रार्थना सुननेके लिये उनके कान सर्वत्र हैं और अपने भक्तद्वारा अर्पण की हुई वस्तुका भोग लगानेके लिये उनका मुख भी सर्वत्र विद्यमान है। वे परमेश्वर इस ब्रह्माण्डमें सबको सब ओरसे घेरकर स्थित हैं—इस बातपर विश्वास करके मनुष्यको उनकी सेवामें लग जाना चाहिये। यह मन्त्र गीतामें भी इसी रूपमें आया है ( १३ । ३ ) ॥ १६ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥१७॥ ( जो परम पुरुष परमात्मा ) सर्वेन्द्रियविवर्जितम् = समस्त इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी; सर्वेन्द्रिय- गुणाभासम् = समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है; (तथा) सर्वस्य = सबका; प्रभुम् = स्वामी; सर्वस्य = सबका, ईशानम् = शासक; ( और ) बृहत् = सबसे बड़ा; शरणम् = आश्रय है, [ प्रपद्येत = उसकी शरणमें जाना चाहिये ] ॥ १७ ॥ व्याख्या-जो सर्वशक्तिमान् परम पुरुष परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित—देहेन्द्रियादि भेदसे शून्य होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तथा सबके स्वामी, परम समर्थ, सबका शासन करनेवाले और जीवके लिये सबसे बड़े आश्रय हैं, मनुष्यको सर्वतोभावसे उन्हींकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। यही मनुष्य-शरीरका अच्छे से-अच्छा उपयोग है। इस मन्त्रका पूर्वार्द्ध गीतामें ज्यों-का त्यों आया है ( १३ । १४ ) ॥ १७ ॥ नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः । वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥१८॥ सर्वस्य = सम्पूर्ण, स्थावरस्य = स्थावर; च = और, चरस्य = जङ्गम; लोकस्य वशी = जगत्को वशमें रखनेवाला, हंसः = वह प्रकाशमय परमेश्वर, नवद्वारे = नव द्वारवाले, पुरे = शरीररूपी नगरमें; देही = अन्तर्यामीरूपसे हृदयमें स्थित देही है; ( तथा वही ) बहिः = बाह्य जगत्में भी, लेलायते = लीला कर रहा है ॥ १८ ॥ व्याख्या—सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम जीवोंके समुदायरूप इस जगत्को अपने वशमें रखनेवाले वे प्रकाशमय परमेश्वर दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा और एक उपस्थ—इस प्रकार नौ दरवाजोंवाले मनुष्य- शरीररूप नगरमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं और वे ही इस बाह्य जगत्में भी लीला कर रहे हैं। यों समझकर मन जहाँ सुगमतासे स्थिर हो सके, वहीं उनका ध्यान करना चाहिये ॥ १८ ॥

३८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध-पहले जो यह बात कही थी कि वे समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं, उसीका स्पष्टीकरण किया जाता है- अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥१९॥ सः=वह परमात्मा, अपाणिपादः=हाथ-पैरोंसे रहित होकर भी, ग्रहीता=समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला; (तथा) जवनः=वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करनेवाला है, अचक्षुः=आँखोंके बिना ही, पश्यति=वह सब कुछ देखता है, (और) अकर्णः=कानोंके बिना ही; शृणोति=सब कुछ सुनता है, सः=वह; वेद्यम्=जो कुछ भी जाननेमें आनेवाली वस्तुएँ हैं, उन सबको; वेत्ति=जानता है, च=और; तस्य वेत्ता=उसको जाननेवाला; (कोई) न=नहीं, अस्ति=है, तम्=(ज्ञानी पुरुष) उसे, महान्तम्=महान्; अग्र्यम्=आदि, पुरुषम्=पुरुष, आहुः= कहते हैं ॥ १९ ॥ व्याख्या-जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परब्रह्म परमात्मा हाथोंसे रहित होनेपर भी सब जगह समस्त वस्तुओंको ग्रहण कर लेते हैं तथा पैरोंसे रहित होकर भी बड़े वेगसे इच्छानुसार सर्वत्र गमनागमन करते हैं। आँखोंसे रहित होनेपर भी सब जगह सब कुछ देखते हैं, कानोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ सुनते हैं। वे समस्त जानने योग्य और जाननेमें आनेवाले जड़-चेतन पदार्थोंको भलीभाँति जानते हैं, परंतु उनको जाननेवाला कोई नहीं है। जो सबको जाननेवाले हैं, उन्हें भला कौन जान सकता है। उनके विषयमें ज्ञानी महापुरुष कहते हैं कि वे सबके आदि, पुरातन, महान् पुरुष हैं ॥ १९ ॥ अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः। तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥२०॥ अणोः अणीयान्= (वह) सूक्ष्मसे भी अतिसूक्ष्म; (तथा) महतः महीयान्=बड़ेसे भी बहुत बड़ा; आत्मा=परमात्मा, अस्य जन्तोः=इस जीवकी, गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें, निहितः=छिपा हुआ है; धातुः=सबकी रचना करनेवाले परमेश्वरकी, प्रसादात्=कृपासे; (जो मनुष्य) तम्=उस; अक्रतुम्=सङ्कल्परहित; ईशम्=परमेश्वरको; (और) महिमानम्=उसकी महिमाको; पश्यति=देख लेता है, (वह) वीतशोकः=सब प्रकारके दुःखोंसे रहित, [ भवति=हो जाता है ] ॥ २० ॥ व्याख्या-वे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और बड़ेसे भी बहुत बड़े परब्रह्म परमात्मा इस जीवकी हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। सबकी रचना करनेवाले उन परमेश्वरकी कृपासे ही मनुष्य उन स्वार्थके सङ्कल्पसे सर्वथा रहित, अकारण कृपा करनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरको और उनकी महिमाको जान सकता है। जब उन परम दयालु परम सुहृद् परमेश्वरका यह साक्षात् कर लेता है, तब सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे रहित होकर उन परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥ वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥२१॥ ब्रह्मवादिनः=वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष, यस्य=जिसके, जन्मनिरोधम्=जन्मका अभाव; प्रवदन्ति=बतलाते हैं, हि [ यम् ]=तथा जिसको, नित्यम्=नित्य, प्रवदन्ति=बतलाते हैं, एतम्=इस, विभुत्वात्=व्यापक होनेके कारण, सर्वगतम्=सर्वत्र विद्यमान, सर्वात्मानम्=सबके आत्मा, अजरम्=जरा, मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, पुराणम्=पुराण पुरुष परमेश्वरको, अहम्=मैं, वेद=जानता हूँ ॥ २१ ॥ व्याख्या-परमात्माको प्राप्त हुए महात्माका कहना है कि 'वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष जिन्हें जन्म- रहित तथा नित्य बताते हैं, व्यापक होनेके कारण जो सर्वत्र विद्यमान है-जिनसे कोई भी स्थान खाली नहीं है, जो जरा-

॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८३ मृत्यु आदि समस्त विकारोंसे सर्वथा रहित हैं और सबके आदि-पुराणपुरुष हैं, उन सबके आत्मा-अन्तर्यामी परब्रह्म परमेश्वरको मैं जानता हूँ ॥ २१ ॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ अध्याय य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद्वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १ ॥ यः=जो; अवर्णः=रंग, रूप आदिसे रहित होकर भी, निहितार्थः=छिपे हुए प्रयोजनवाला होनेके कारण, बहुधा शक्तियोगात्=विविध शक्तियोंके सम्बन्धसे; आदौ=सृष्टिके आदिमें; अनेकान्=अनेक, वर्णान्=रूप रंगः दधाति=धारण कर लेता है, च=तथा; अन्ते=अन्तमें; विश्वम्=यह सम्पूर्ण विश्व; (जिसमें) व्येति (वि+एति) च= विलीन भी हो जाता है, सः=वह, देवः=परमदेव (परमात्मा), एकः=एक (अद्वितीय) है, सः=वह, नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे, संयुनक्तु=संयुक्त करे ॥ १ ॥ व्याख्या-जो परब्रह्म परमात्मा अपने निराकार स्वरूपमें रूप-रंग आदिसे रहित होकर भी सृष्टिके आदिमे किसी अज्ञात प्रयोजनसे अपनी स्वरूपभूत नाना प्रकारकी शक्तियोंके सम्बन्धसे अनेक रूप-रंग आदि धारण करते हैं तथा अन्तमे यह सम्पूर्ण जगत् जिनमें विलीन भी हो जाता है-अर्थात् जो बिना किसी अपने प्रयोजनके जीवोंका कल्याण करनेके लिये ही उनके कर्मानुसार इस नाना रंग-रूपवाले जगत्‌की रचना, पालन और संहार करते हैं, वे परमदेव परमेश्वर वास्तवमें एक-अद्वितीय हैं। उनके अतिरिक्त कुछ नहीं है। वे हमें शुभ बुद्धिसे युक्त करें ॥ १ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया। अब तीन मन्त्रोंद्वारा परमेश्वरका जगत्‌के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुति करनेका प्रकार बतलाया जाता है- तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्लं तद्ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः ॥ २ ॥ तत् एव=वही, अग्निः=अग्नि है, तत्=वह, आदित्यः=सूर्य है, तत्=वह, वायुः=वायु है, उ=तथा, तत्=वही, चन्द्रमाः=चन्द्रमा है, तत्=वह, शुक्रम्=अन्यान्य प्रकाशयुक्त नक्षत्र आदि है, तत्=वह, आपः=जल है, तत्=वह, प्रजापतिः=प्रजापति है; (और) तत् एव=वही, ब्रह्म=ब्रह्मा है ॥ २ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म ही अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, अन्यान्य प्रकाशमय नक्षत्र आदि जल, प्रजापति और ब्रह्मा है। ये सब उन एक अद्वितीय परब्रह्म परमेश्वरकी ही विभूतियाँ हैं। इन सबके अन्तर्यामी आत्मा वे ही हैं, अतः ये सब उन्हींके स्वरूप हैं। इस प्रकार इस सम्पूर्ण जगत्‌के रूपमें उन परमात्माका चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥ त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ३-॥ त्वम्=तू, स्त्री=स्त्री है; त्वम्=तू; पुमान्=पुरुष है, त्वम्=तू ही, कुमारः=कुमार, उत वा=अथवा, कुमारी= कुमारी, असि=है, त्वम्=तू; जीर्णः=बूढ़ा होकर, दण्डेन=लाठीके सहारे, अञ्चसि=चलता है; उ=तथा, त्वम्=तू ही; जातः=विराट्रूपमें प्रकट होकर; विश्वतोमुखः=सब ओर मुखवाला; भवसि=हो जाता है ॥ ३ ॥ व्याख्या-हे सर्वेश्वर ! आप स्त्री, पुरुष, कुमार, कुमारी आदि अनेक रूपोंवाले हैं—अर्थात् इन सबके रूपमें आप ही प्रकट हो रहे हैं। आप ही बूढ़े होकर लाठीके सहारे चलते हैं अर्थात् आप ही वृद्धोंके रूपमें अभिव्यक्त हैं। हे परमात्मन् !

३८४ * विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * आप ही विराट्रूपमें प्रकट होकर सब ओर मुख किये हुए हैं, अर्थात् सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। जगत्‌में जितने भी मुख दिखायी देते हैं, सब आपके ही हैं ॥ ३ ॥ नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्षस्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः । अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥ [ त्वम् एव = तू ही; ] नीलः = नीलवर्ण; पतङ्गः = पतङ्ग है; हरितः = हरे रंगका; (और) लोहिताक्षः = लाल आँखोंवाला (पक्षी है एवं); तडिद्गर्भः = मेघ; ऋतवः = वसन्त आदि ऋतुएँ; (तथा) समुद्राः = सप्त समुद्ररूप है; यतः = क्योंकि; [त्वत्तः एव = तुझसे ही; ] विश्वा = सम्पूर्ण; भुवनानि = लोक; जातानि = उत्पन्न हुए हैं; त्वम् = तू ही; अनादिमत् = अनादि (प्रकृतियों) का स्वामी; (और) विभुत्वेन = व्यापकरूपसे; वर्तसे = सबमें विद्यमान है ॥ ४ ॥ व्याख्या—हे सर्वान्तर्यामिन् ! आप ही नीले रंगके पतङ्ग (भौंरे) तथा हरे रंग और लाल आँखोंवाले पक्षी—तोते हैं; आप ही बिजलीसे युक्त मेघ हैं, वसन्तादि सब ऋतुएँ और सप्त समुद्र भी आपके ही रूप हैं। अर्थात् इन नाना प्रकारके रंग-रूपवाले समस्त जड-चेतन पदार्थोके रूपमें मैं आपको ही देख रहा हूँ; क्योंकि आपसे ही ये समस्त लोक और उनमें निवास करनेवाले सम्पूर्ण जीव-समुदाय प्रकट हुए हैं। व्यापकरूपसे आप ही सबमें विद्यमान हैं तथा अव्यक्त एवं जीवरूप अपनी दो अनादि प्रकृतियोंके (जिन्हें गीतामें अपरा और परा नामोंसे कहा गया है) स्वामी भी आप ही हैं। अतः एकमात्र आपको ही मैं सबके रूपमें देखता हूँ ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—पूर्वमन्त्रमें परब्रह्म परमेश्वरको जिन दो प्रकृतियोंका स्वामी बताया गया है, वे दोनों अनादि प्रकृतियाँ कौन-सी हैं— इसका स्पष्टीकरण किया जाता है— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥ =अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय; बह्वीः = बहुत-से; प्रजाः = भूत-समुदायोंको; सृजमानाम् = रचने- वाली; (तथा) लोहितशुक्लकृष्णाम् = लाल, सफेद और काले रंगकी अर्थात् त्रिगुणमयी; एकाम् = एक; अजाम् = अजा (अजन्मा—अनादि प्रकृति) को, हि = निश्चय ही, एकः = एक; अजः = अज (अज्ञानी जीव); जुषमाणः = आसक्त हुआ; अनुशेते = भोगता है; (और) अन्यः = दूसरा; अजः = अज (ज्ञानी महापुरुष); एनाम् = इस; भुक्तभोगाम् = भोगी हुई प्रकृतिको; जहाति = त्याग देता है ॥ ५ ॥ व्याख्या—पिछले मन्त्रमें जिनका संकेत किया गया है, उन दो प्रकृतियोंमेंसे एक तो वह है, जिसका गीतामें अपरा नामसे उल्लेख हुआ है तथा जिसके आठ भेद किये गये हैं (गीता ७।४)। यह अपने अधिष्ठाता परमदेव परमेश्वरकी अध्यक्षतामें अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय असंख्य जीवदेहोंको उत्पन्न करती है। त्रिगुणमयी अथवा त्रिगुणात्मिका होनेसे इसे तीन रंगवाली कहा गया है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही इसके तीन रंग हैं। सत्त्वगुण निर्मल एवं प्रकाशक होनेसे उसे श्वेत माना गया है। रजोगुण रागात्मक है, अतएव उसका रंग लाल माना गया है तथा तमोगुण अज्ञानरूप एवं आवरक होनेसे उसे कृष्णवर्ण कहा गया है। इन तीन गुणोंको लेकर ही प्रकृतिको सफेद, लाल एवं काले रंगकी कहा गया है। दूसरी जिसका गीतामें जीवरूप परा अथवा चेतन प्रकृतिके नामसे (७।५), क्षेत्रज्ञके नामसे (१३।१) तथा अक्षर पुरुषके नामसे (१५।१६) वर्णन किया गया है, उसके दो भेद हैं। एक तो वे जीव, जो उस अपरा प्रकृतिमें आसक्त होकर—उसके साथ एकरूप होकर उसके विचित्र भोगोंको अपने कर्मानुसार भोगते हैं। दूसरा समुदाय उन ज्ञानी महापुरुषोंका है, जिन्होंने इसके भोगोंको भोगकर इसे निःसार और क्षणभङ्गुर समझकर इसका सर्वथा परित्याग कर दिया है। ये दोनों प्रकारके जीव स्वरूपतः अजन्मा तथा अनादि हैं। इसीलिये इन्हें 'अज' कहा गया है ॥ ५॥

  • सांख्यमतावलम्बियोंने इस मन्त्रको सांख्यशास्त्रका बीज माना है और इसीके आधारपर उक्त दर्शनको श्रुति-सम्मत सिद्ध किया है। सांख्यकारिकाके प्रसिद्ध टीकाकार तथा अन्य दर्शनोंके व्याख्याता सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-स्वामिवन्द्य श्रीवाचस्पति मिश्रने अपनी सांख्यतत्त्व- कौमुदी नामक टीकाके आरम्भमें इसी मन्त्रको कुछ परिवर्तनके साथ मङ्गलाचरणके रूपमें उद्धृत करते हुए इसमें वर्णित प्रकृतिकी वन्दना
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८५ सम्बन्ध—वह परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो इस प्रकृतिके भोगोंको भोगता है, कब और कैसे मुक्त हो सकता है— इस जिज्ञासापर दो मन्त्रोंमें कहते हैं— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ६ ॥ सयुजा=सदा साथ रहनेवाले, ( तथा ) सखाया=परस्पर सख्यभाव रखनेवाले, द्वा=दो, सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा एव परमात्मा); समानम् = एक ही, वृक्षम् परिषस्वजाते = वृक्ष ( शरीर ) का आश्रय लेकर रहते हैं, तयोः=उन दोनोंमेंसे, अन्यः=एक (जीवात्मा) तो, पिप्पलम्=उस वृक्षके फलो (कर्मफलों) को, स्वादु=स्वाद ले-लेकर, अत्ति= खाता है, अन्यः= ( किंतु ) दूसरा ( ईश्वर ), अनश्नन् = उनका उपभोग न करता हुआ, अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है ॥ ६ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार गीता आदिमे जगत्‌का अश्वत्थ-वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको अश्वत्थ-वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। इसी प्रकार कठोपनिषद्‌में जीवात्मा और परमात्माको गुहामें प्रविष्ट छाया और धूपके रूपमें बताकर वर्णन किया गया है। दोनों जगहका भाव प्रायः एक ही है। यहाँ मन्त्रका सारांश यह है कि यह मनुष्य-शरीर मानो एक पीपलका वृक्ष है। ईश्वर और जीव—ये दोनों सदा साथ रहनेवाले दो मित्र मानो दो पक्षी हैं। ये दोनों इस शरीररूप वृक्षमें एक साथ एक ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। शरीरमें रहते हुए प्रारब्धानुसार जो सुख-दुःखरूप कर्मफल प्राप्त होते हैं, वे ही मानो इस पीपलके फल हैं। इन फलोंको जीवात्मारूप एक पक्षी तो स्वादपूर्वक खाता है अर्थात् हर्ष-शोकका अनुभव करते हुए कर्मफलको भोगता है। दूसरा ईश्वररूप पक्षी इन फलोंको खाता नहीं, केवल देखता रहता है। अर्थात् इस शरीरमें प्राप्त हुए सुख-दुःखोंको वह भोगता नहीं, केवल उनका साक्षी बना रहता है। परमात्माकी भाँति यदि जीवात्मा भी इनका द्रष्टा बन जाय तो फिर उसका इनसे कोई सम्बन्ध न रह जाय। ऐसे ही जीवात्माके सम्बन्धमें पिछले मन्त्रमें यह कहा गया है कि वह प्रकृतिका उपभोग कर चुकनेके बाद उसे निःसार समझकर उसका परित्याग कर देता है, उससे मुँह मोड़ लेता है। उसके लिये फिर प्रकृति अर्थात् जगत्‌की सत्ता ही नहीं रह जाती। फिर तो वह और उसका मित्र—दो ही रह जाते हैं और परस्पर मित्रताका आनन्द लूटते हैं। यही इस मन्त्रका तात्पर्य मालूम होता है। मुण्डक० ३ । १ । १ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है ॥ ६ ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ ७॥ समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूप एक ही वृक्षपर रहनेवाला; पुरुषः = जीवात्मा; निमग्नः = गहरी आसक्तिमें डूबा हुआ है; ( अतः ) अनीशया = असमर्थ होनेके कारण ( दीनतापूर्वक ), मुह्यमानः=मोहित हुआ, शोचति =शोक करता रहता है; यदा = जब ( यह भगवान्‌की अहैतुकी दयासे ), जुष्टम् = भक्तोंद्वारा नित्यसेवित; अन्यम् = अपनेसे भिन्न, ईशम् = परमेश्वरको; (और) अस्य = उसकी, महिमानम् = आश्चर्यमयी महिमाको, पश्यति = प्रत्यक्ष देख लेता है; इति=तब, वीतशोकः=सर्वथा शोकरहित; [ भवति = हो जाता है ] ॥ ७॥ व्याख्या-पहले बतलाये हुए इस शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमे परमात्माके साथ रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, इस शरीरमे ही आसक्त होकर मोहमे निमग्न रहता है, अर्थात् शरीरमें अत्यन्त ममता करके उसके द्वारा भोगोंका उपभोग करनेमे ही रचा-पचा रहता है, तबतक असमर्थता और दीनतासे मोहित हुआ नाना प्रकारके दुःखोंको भोगता रहता है। जब कभी इसपर भगवान्‌की अहैतुकी दया होती है, की है। यहाँ काव्यमयी भाषामें प्रकृतिको एक तिरंगी बकरीके रूपमें चित्रित किया गया है, जो बद्धजीवरूप बकरेके संयोगसे अपनी ही- जैसी तिरंगी—त्रिगुणमयी सन्तान उत्पन्न करती है। संस्कृतमें 'अजा' बकरीको भी कहते हैं। इसी श्लेषका उपयोग कर प्रकृतिका आलंकारिक रूपमें वर्णन किया गया है। उ० मं० ४९-

३८६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तब यह अपनेसे भिन्न, अपने ही साथ रहनेवाले, परम सुहृद्, परम प्रिय भगवान्‌को पहचान पाता है। जो भक्तजनोंद्वारा निरन्तर सेवित हैं, उन परमेश्वरको तथा उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, जब यह देख लेता है, उस समय तत्काल ही सर्वथा शोकरहित हो जाता है। मुण्डक० ३। १। २ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है ॥ ७ ॥ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८ ॥ यस्मिन्=जिसमें; विश्वे=समस्त; देवाः=देवगण; अधि=भलीभाँति; निषेदुः=स्थित हैं; [तस्मिन्=उस;] अक्षरे=अविनाशी; परमे व्योमन्=परम व्योम (परम धाम) मे; ऋचः=सम्पूर्ण वेद स्थित हैं; यः=जो मनुष्य; तम्=उसको; न=नहीं; वेद=जानता; [सः=वह;] ऋचा=वेदोंके द्वारा; किम्=क्या; करिष्यति=सिद्ध करेगा; इत्= परन्तु; ये=जो; तत्=उसको; विदुः=जानते हैं; ते=वे तो; इमे=ये; समासते=सम्यक् प्रकारसे उसीमें स्थित हैं ॥ ८ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरके जिस अविनाशी दिव्य चेतन परम आकाशस्वरूप परम धाममें समस्त देवगण अर्थात् उन परमात्माके पार्षदगण उन परमेश्वरकी सेवा करते हुए निवास करते हैं, वहीं समस्त वेद भी पार्षदोंके रूपमें मूर्तिमान् होकर भगवान्‌की सेवा करते हैं। जो मनुष्य उस परम धाममें रहनेवाले परब्रह्म पुरुषोत्तमको नहीं जानता और इस रहस्यको भी नहीं जानता कि समस्त वेद उन परमात्माकी सेवा करनेवाले उन्हींके अङ्गभूत पार्षद हे, वह वेदोंके द्वारा अपना क्या प्रयोजन सिद्ध करेगा ? अर्थात् कुछ सिद्ध नहीं कर सकेगा। परन्तु जो उन परमात्माको तत्त्वसे जान लेते हैं, वे तो उस परम धाममें ही सम्यक् प्रकारसे स्थित रहते हैं, अर्थात् वहाँसे कभी नहीं लौटते ॥ ८ ॥ छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति । अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ९ ॥ छन्दांसि=छन्द; यज्ञाः=यज्ञ; क्रतवः=क्रतु (ज्योतिष्टोम आदि विशेष यज्ञ); व्रतानि=नाना प्रकारके व्रत; च=तथा; यत्=और भी जो कुछ; भूतम्=भूत; भव्यम्=भविष्य एव वर्तमानरूपसे; वेदाः=वेद; वदन्ति=वर्णन करते हैं; एतत् विश्वम्=इस सम्पूर्ण जगत्‌को; मायी=प्रकृतिका अधिपति परमेश्वर; अस्मात्=इस (पहले बताये हुए महाभूतादि तत्त्वोंके समुदाय) से; सृजते=रचता है; च=तथा; अन्यः=दूसरा (जीवात्मा);- तस्मिन्=उस प्रपञ्चमें; मायया=मायाके द्वारा; संनिरुद्धः=भलीभाँति बँधा हुआ है ॥ ९ ॥ व्याख्या—जो समस्त वेदमन्त्ररूप छन्द, यज्ञ, क्रतु अर्थात् ज्योतिष्टोमादि विशेष यज्ञ, नाना प्रकारके व्रत अर्थात् शुभ कर्म, सदाचार और उनके नियम हैं तथा और भी जो कुछ भूत, भविष्य, वर्तमान पदार्थ हैं, जिनका वर्णन वेदोंमें पाया जाता है,—इन सबको वे प्रकृतिके अधिष्ठाता परमेश्वर ही अपने अंशभूत इस पहले बताये हुए पञ्चभूत आदि तत्त्व-समुदायसे रचते हैं; इस प्रकार रचे हुए उस जगत्में अन्य अर्थात् पहले बताये हुए ज्ञानी महापुरुषोंसे भिन्न जीवसमुदाय मायाके द्वारा बँधा हुआ है। जबतक वह अपने स्वामी परम देव परमेश्वरको साक्षात् नहीं कर लेता, तबतक उसका इस प्रकृतिसे छुटकारा नहीं हो सकता; अतः मनुष्यको उन परमात्माको जानने और पानेकी उत्कट अभिलाषा रखनी चाहिये ॥ ९ ॥ मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१०॥ मायाम्=माया; तु=तो; प्रकृतिम्=प्रकृतिको; विद्यात्=समझना चाहिये; तु=और; मायिनम्=मायापति; महेश्वरम्=महेश्वरको समझना चाहिये; तस्य तु=उसीके; अवयवभूतैः=अङ्गभूत कारण-कार्य-समुदायसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण; जगत्=जगत्; व्याप्तम्=व्याप्त हो रहा है ॥ १० ॥ व्याख्या—इस प्रकरणमें जिसका मायाके नामसे वर्णन हुआ है, वह तो भगवान्‌की शक्तिरूपा प्रकृति है और उस माया नामसे कही जानेवाली शक्तिरूपा प्रकृतिका अधिपति परब्रह्म परमात्मा महेश्वर है; इस प्रकार इन दोनोंको अलग-अलग

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८७ समझना चाहिये। उस परमेश्वरकी शक्तिरूपा प्रकृतिके ही अङ्गभूत कारण-कार्यसमुदायसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है ॥ १० ॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥११॥ यः = जो; एकः = अकेला ही; योनिम् योनिम् अधितिष्ठति = प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता हो रहा है, यस्मिन् = जिसमें; इदम् = यह, सर्वम् = समस्त जगत्; समेति = प्रलयकालमें विलीन हो जाता है, च = और, व्येति च = सृष्टिकालमें विविध रूपोंमें प्रकट भी हो जाता है; तम् = उस, ईशानम् = सर्वनियन्ता; वरदम् = वरदायक; ईड्यम् = स्तुति करने योग्य, देवम् = परम देव परमेश्वरको, निचाय्य = तत्त्वसे जानकर, (मनुष्य) अत्यन्तम् = निरन्तर बनी रहनेवाली; इमाम् = इस (मुक्तिरूप), शान्तिम् = परम शान्तिको, एति = प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर प्रत्येक योनिके एकमात्र अध्यक्ष हैं—जगत्‌मे जितने प्रकारके कारण माने जाते हैं, उन सबके अधिष्ठाता हैं। उनमें किसी कार्यको उत्पन्न करनेकी शक्ति उन्हीं सर्वकारण परमात्माकी है और उन्हींकी अध्यक्षतामें वे उन-उन कार्योंको उत्पन्न करते हैं। वे ही उन सबपर शासन करते हैं—उनकी यथायोग्य व्यवस्था करते हैं। यह समस्त जगत् प्रलयके समय उनमें विलीन हो जाता है तथा पुनः सृष्टि-कालमें उन्हींमे विविध रूपोंमें उत्पन्न हो जाता है। उन सर्वनियन्ता, वरदायक, एकमात्र स्तुति करनेयोग्य, परमदेव, सर्वसुहृद्, सर्वेश्वर परमात्माको जानकर यह जीव निरन्तर बनी रहनेवाली परमनिर्वाणरूप शान्तिको प्राप्त हो जाता है। गीतामें इसका शाश्वती शान्ति (गीता ९। ३१), परा शान्ति (गीता १८ । ६२) आदि नामोंसे भी वर्णन आता है ॥ ११ ॥ यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥१२॥ यः = जो, रुद्रः = रुद्र, देवानाम् = इन्द्रादि देवताओंको, प्रभवः = उत्पन्न करनेवाला, च = और; उद्भवः = बढ़ाने- वाला है; च = तथा; (जो) विश्वाधिपः = सबका अधिपति, महर्षिः = (और) महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है, (जिसने सबसे पहले) जायमानम् = उत्पन्न हुए, हिरण्यगर्भम् = हिरण्यगर्भको, पश्यत = देखा था, सः = वह परमदेव परमेश्वर; नः = हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या = शुभ बुद्धिसे; संयुनक्तु = संयुक्त करे ॥ १२ ॥ व्याख्या—सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानसम्पन्न (सर्वज्ञ) हैं, जिन्होंने सृष्टिके आदिमें सबसे पहले उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको देखा था, अर्थात् जो ब्रह्माके भी पूर्ववर्ती हैं, वे परमदेव परमात्मा हमलोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें, जिससे हम उनकी ओर बढ़कर उन्हें प्राप्त कर सकें। शुभ बुद्धि वही है, जो जीवको परम कल्याणरूप परमात्माकी ओर लगाये । गायत्री-मन्त्रमें भी इसी बुद्धिके लिये प्रार्थना की गयी है ॥ १२ ॥ यो देवानामधिपो यस्मिँल्लोका अधिश्रिताः । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ १३ ॥ यः = जो, देवानाम् = समस्त देवोंका, अधिपः = अधिपति है, यस्मिन् = जिसमें, लोकाः = समस्त लोक; अधिश्रिताः = सब प्रकारसे आश्रित हैं, यः = जो; अस्य = इस, द्विपदः = दो पैरवाले, (और) चतुष्पदः = चार पैरवाले समस्त जीवसमुदायका, ईशे = शासन करता है, (उस) कस्मै देवाय = आनन्दस्वरूप परमदेव परमेश्वरकी; (हम) हविषा = हविष्य अर्थात् श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भेंट समर्पण करके, विधेम = पूजा करें ॥ १३ ॥ व्याख्या—जो सर्वनियन्ता परमेश्वर समस्त देवोंके अधिपति हैं, जिनमें समस्त लोक सब प्रकारसे आश्रित हैं अर्थात् जो स्थूल, सूक्ष्म और अव्यक्त अवस्थाओंमें सदा ही सब प्रकारसे सबके आश्रय हैं, जो दो पैरवाले और चार पैरवाले अर्थात्

३८८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्पूर्ण जीव-समुदायका अपनी अचिन्त्य शक्तियोंके द्वारा शासन करते हैं, उन आनन्दस्वरूप परमदेव सर्वाधार सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी हम श्रद्धा भक्तिपूर्वक हविःस्वरूप भेंट समर्पण करके पूजा करें। अर्थात् सब कुछ उन्हें समर्पण करके उन्हींके हो जायँ। यही उनकी प्राप्तिका सहज उपाय है ॥ १३ ॥ सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥१४॥ सूक्ष्मातिसूक्ष्मम् = (जो) सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म; कलिलस्य मध्ये = हृदय-गुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित; विश्वस्य = अखिल विश्वकी; स्रष्टारम् = रचना करनेवाला; अनेकरूपम् = अनेक रूप धारण करनेवाला; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम् = समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे रखनेवाला है, (उस) एकम् = एक (अद्वितीय); शिवम् = कल्याणस्वरूप महेश्वरको; ज्ञात्वा = जानकर, (मनुष्य) अत्यन्तम् = सदा रहनेवाली; शान्तिम् = शान्तिको; एति = प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ व्याख्या-जो परब्रह्म परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं-अर्थात् जो बिना उनकी कृपाके जाने नहीं जाते, जो सबकी हृदय-गुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित हैं अर्थात् जो हमारे अत्यन्त समीप हैं, जो अखिल विश्वकी रचना करते हैं, तथा स्वयं विश्वरूप होकर अनेक रूप धारण किये हुए हैं-यही नहीं, जो निराकाररूपसे समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरे रहते हैं, उन सर्वोपरि एक-अद्वितीय कल्याणस्वरूप महेश्वरको जानकर मनुष्य सदा रहनेवाली असीम, अविनाशी और अतिशय शान्तिको प्राप्त कर लेता है; क्योंकि वह महापुरुष इस अशान्त जगत्-प्रपञ्चसे सर्वथा सम्बन्धरहित एवं उपरत हो जाता है ॥ १४ ॥ स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥१५॥ सः एव = वही; काले = समयपर; भुवनस्य गोप्ता = समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करनेवाला; विश्वाधिपः = समस्त जगत्का अधिपति; (और) सर्वभूतेषु = समस्त प्राणियोंमें; गूढः = छिपा हुआ है; यस्मिन् = जिसमें; ब्रह्मर्षयः = वेदज्ञ महर्षिगण; च = और; देवताः = देवता लोग भी; युक्ताः = ध्यानद्वारा संलग्न हैं; तम् = उस (परमदेव परमेश्वर) को; एवम् = इस प्रकार; ज्ञात्वा = जानकर; (मनुष्य) मृत्युपाशान् = मृत्युके बन्धनोंको; छिनत्ति = काट डालता है ॥ १५ ॥ व्याख्या-जिनका बार-बार वर्णन किया गया है, वे परमदेव परमेश्वर ही समयपर अर्थात् स्थिति-कालमें समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करते हैं, तथा वे ही सम्पूर्ण जगत्‌के अधिपति और समस्त प्राणियोंमे अन्तर्यामीरूपसे छिपे हुए हैं। उन्हींमें वेदके रहस्यको समझनेवाले महर्षिगण और समस्त देवता लोग भी ध्यानके द्वारा संलग्न रहते हैं। सब उन्हींका स्मरण और चिन्तन करके उन्हींमें जुड़े रहते हैं। इस प्रकार उन परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य यमराजके समस्त पाशोंको अर्थात् जन्म-मृत्युके कारणभूत समस्त बन्धनोंको काट डालता है। फिर वह कभी प्रकृतिके बन्धनमें नहीं आता, सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥ घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१६॥ शिवम् = कल्याणस्वरूप; एकम् देवम् = एक (अद्वितीय) परमदेवको; घृतात् परम् = मक्खनके ऊपर रहनेवाले; मण्डम् इव = सारभागकी भाँति; अतिसूक्ष्मम् = अत्यन्त सूक्ष्म; (और) सर्वभूतेषु = समस्त प्राणियोंमें; गूढम् = छिपा हुआ; ज्ञात्वा = जानकर; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम् = समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरकर स्थित हुआ; ज्ञात्वा = जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः = समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते = छूट जाता है ॥ १६ ॥ -जो मक्खनके ऊपर रहनेवाले सारभागकी भाँति सबके सार एवं अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन कल्याणस्वरूप

  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८९ एकमात्र परमदेव परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ तथा समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरकर उसे व्याप्त किये हुए जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सदाके लिये सर्वथा छूट जाता है ॥ १६ ॥ एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१७॥ एषः = यह; विश्वकर्मा = जगत्-कर्ता; महात्मा = महात्मा; देवः = परमदेव परमेश्वर, सदा = सर्वदा; जनानाम् = सब मनुष्योंके; हृदये = हृदयमें, संनिविष्टः = सम्यक् प्रकारसे स्थित है; (तथा) हृदा = हृदयसे, मनीषा = बुद्धिसे; (और) मनसा = मनसे; अभिक्लृप्तः = ध्यानमें लाया हुआ, [ आविर्भवति = प्रत्यक्ष होता है, ] ये = जो साधक; एतत् = इस रहस्यको; विदुः = जान लेते हैं; ते = वे; अमृताः = अमृतरूप, भवन्ति = हो जाते हैं ॥ १७ ॥ व्याख्या—ये जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले, महात्मा अर्थात् सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी परमदेव परमेश्वर सदा ही सभी मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं। उनके गुण-प्रभावको सुनकर द्रवित और विशुद्ध हुए निर्मल हृदयसे, निश्चय- युक्त बुद्धिसे तथा एकाग्र मनके द्वारा निरन्तर ध्यान करनेपर वे परमात्मा प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इस रहस्यको जान लेते हैं, वे उन्हें प्राप्त करके अमृतरूप हो जाते हैं, सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ १७ ॥ यदातमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासञ्छिव एव केवलः। तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥१८॥ यदा = जब, अतमः [ स्यात् ] = अज्ञानमय अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, तत्* = उस समय (अनुभवमें आनेवाला तत्त्व ); न = न; दिवा = दिन है, न = न, रात्रिः = रात है, न = न, सत् = सत् है; च = और, न = न; असत् = असत् है; केवलः = एकमात्र, विशुद्ध; शिवः एव = कल्याणमय शिव ही है, तत् = वह, अक्षरम् = सर्वथा अविनाशी है; तत् = वह; सवितुः = सूर्याभिमानी देवताका भी, वरेण्यम् = उपास्य है, च = तथा, तस्मात् = उसीसे, पुराणी = (यह) पुराना; प्रज्ञा = ज्ञान; प्रसृता = फैला है ॥ १८ ॥ व्याख्या—जिस समय अज्ञानरूप अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, उस समय प्रत्यक्ष होनेवाला तत्त्व न दिन है, न रात है। अर्थात् उसे न तो दिनकी भाँति प्रकाशमय कहा जा सकता है और न रातकी भाँति अन्धकारमय ही; क्योंकि वह इन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है, वहाँ ज्ञान-अज्ञानके भेदकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। वह न सत् है और न असत् है—उसे न तो 'सत्' कहना बनता है, न 'असत्' ही; क्योंकि वह 'सत्' और 'असत्' नामसे समझे जानेवाले पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है। एकमात्र कल्याणस्वरूप शिव ही वह तत्त्व हैं। वे सर्वथा अविनाशी हैं। वे सूर्य आदि समस्त देवताओंके उपास्यदेव हैं। उन्हींसे यह सदासे चला आता हुआ अनादि ज्ञान—परमात्माको जानने और पानेका साधन अधिकारियोंको परम्परासे प्राप्त होता चला आ रहा है ॥ १८ ॥ नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥१९॥ एनम् = इस परमात्माको, (कोई भी) न = न तो; ऊर्ध्वम् = ऊपरसे, न = न; तिर्यञ्चम् = इधर-उधरसे; (और) न = न, मध्ये = बीचमेंसे ही; परिजग्रभत् = भलीभाँति पकड़ सकता है, यस्य = जिसका; महद्यशः = 'महान् यश'; नाम = नाम है, तस्य = उसकी, प्रतिमा = कोई उपमा; न = नहीं, अस्ति = है ॥ १९ ॥ व्याख्या—जिनका पहले कई मन्त्रोंमें वर्णन किया गया है, उन परम प्राप्य परब्रह्मको कोई भी मनुष्य न तो ऊपरसे पकड़ सकता है न नीचेसे पकड़ सकता है, और न बीचमें इधर-उधरसे ही पकड़ सकता है; क्योंकि ये सर्वथा अग्राह्य हैं— ग्रहण करनेमें नहीं आते। इन्हें जानने और ग्रहण करनेकी बात जो शास्त्रोंमें पायी जाती है, उसका रहस्य वही समझ सकता है, जो इन्हें पा लेता है। वह भी वाणीद्वारा व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि मन और वाणीकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे
  • 'तत्' अव्यय पद है, यहाँ 'तदा' के अर्थमें इसका प्रयोग हुआ है ।

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होकर; मा = न तो; नः = हमारे; तोके = पुत्रोंमें; ( ओर ) तनये = पौत्रोंमें, मा = न; नः = हमारी; आयुषि = आयुमें; मा = न; नः = हमारी; गोषु = गौओंमें, ( और ) मा = न; नः = हमारे, अश्वेषु = घोड़ोंमें ही, रीरिषः = किसी प्रकारकी कमी कर; ( तथा ) नः = हमारे, वीरान् मा वधीः = वीर पुरुषोंका भी नाश न कर ॥ २२ ॥ व्याख्या—हे सबका संहार करनेवाले रुद्रदेव ! हमलोग नाना प्रकारकी भेंट समर्पण करते हुए सदा ही आपको बुलाते रहते हैं । आप ही हमारी रक्षा करनेमें सर्वथा समर्थ हैं, अतः हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमपर कभी कुपित न हों तथा कुपित होकर हमारे पुत्र और पौत्रोंको, हमारी आयुको—जीवनको तथा हमारे गौ, घोड़े आदि पशुओंको कभी किसी प्रकारकी क्षति न पहुँचायें । तथा हमारे जो वीर—साहसी पुरुष हैं, उनका भी नाश न करें । अर्थात् सब प्रकारसे हमारी और हमारे धन-जनकी रक्षा करते रहें ॥ २२ ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम अध्याय द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे । क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥ यत्र = जिस; ब्रह्मपरे = ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, गूढे = छिपे हुए, अनन्ते = असीम; तु = और, अक्षरे = परम अक्षर परमात्मा- में; विद्याविद्ये = विद्या और अविद्या, द्वे = दोनों, निहिते = स्थित हैं ( वही ब्रह्म है ), क्षरम् = ( यहाँ ) विनाशशील जडवर्ग, तु = तो; अविद्या = अविद्या नामसे कहा गया है, तु = और, अमृतम् = अविनाशी वर्ग ( जीवसमुदाय ); हि = ही; विद्या = विद्या नामसे कहा गया है, तु = तथा, यः = जो; विद्याविद्ये ईशते = उपर्युक्त विद्या और अविद्यापर शासन करता है; सः = वह, अन्यः = इन दोनोंसे भिन्न—सर्वथा विलक्षण है ॥ १ ॥ व्याख्या—जो परमेश्वर ब्रह्मासे भी अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, अपनी मायाके पर्देमें छिपे हुए हैं, सीमारहित और अविनाशी हैं अर्थात् जो देश-कालसे सर्वथा अतीत हैं तथा जिनका कभी किसी प्रकारसे भी विनाश नहीं हो सकता, तथा जिन परमात्मामें अविद्या और विद्या—दोनों विद्यमान हैं, अर्थात् दोनों ही जिनके आधारपर टिकी हुई हैं, वे पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम हैं । इस मन्त्रमें परिवर्तनशील, घटने-बढ़नेवाले और उत्पत्ति-विनाशशील क्षरतत्त्वको तो अविद्या नामसे कहा गया है, क्योंकि वह जड है, उसमे विद्याका—ज्ञानका सर्वथा अभाव है । उससे भिन्न जो जन्म-मृत्युसे रहित है, जो घटता-बढ़ता नहीं, वह अविनाशी कूटस्थ तत्त्व ( जीव-समुदाय ) विद्याके नामसे कहा गया है, क्योंकि वह चेतन है, विज्ञानमय है । उपनिषदोंमें जगह-जगह उसका विज्ञानात्माके नामसे वर्णन आया है । यहाँ श्रुतिने स्वय ही विद्या और अविद्याकी परिभाषा कर दी है, अतः अर्थान्तर- की कल्पना अनावश्यक है । जो इन विद्या और अविद्या नामसे कहे जानेवाले क्षर और अक्षर दोनोंपर शासन करते हैं, दोनोंके स्वामी हैं, दोनों जिनकी शक्तियाँ अथवा प्रकृतियाँ हैं, वे परमेश्वर इन दोनोंसे अन्य—सर्वथा विलक्षण हैं । श्रीगीता- जीमें भी कहा है—'उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः' इत्यादि ( १५ । १७ ) ॥ १ ॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥ यः = जो, एकः = अकेला ही; योनिम् योनिम् = प्रत्येक योनिपर, विश्वानि रूपाणि = समस्त रूपोंपर, च = और, सर्वाः योनीः = समस्त कारणोंपर, अधितिष्ठति = आधिपत्य रखता है, यः = जो; अग्रे = पहले; प्रसूतम् = उत्पन्न हुए, कपिलम् ऋषिम् = कपिल ऋषिको ( हिरण्यगर्भको ), ज्ञानैः = सब प्रकारके ज्ञानोंसे, बिभर्ति = पुष्ट करता है; च = तथा, ( जिसने ) तम् = उस कपिल ( ब्रह्मा ) को, जायमानम् = ( सबसे पहले ) उत्पन्न होते, पश्येत् = देखा था; ( वे ही परमात्मा हैं ) ॥ २ ॥ —इस जगत्में देव, पितर, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि जितनी भी योनियाँ हैं, तथा प्रत्येक

३९२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * योनिमें जो भिन्न-भिन्न रूप—आकृतियाँ हैं, उन सबके और उनके कारणरूप पञ्च सूक्ष्म महाभूत आदि समस्त तत्त्वोंके जो एकमात्र अधिपति हैं, अर्थात् वे सब-के-सब जिनके अधीन हैं, जो सबसे पहले उत्पन्न हुए कपिल ऋषिको* अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माको प्रत्येक सर्गके आदिमें सब प्रकारके ज्ञानोंसे पुष्ट करते हैं—सब प्रकारके ज्ञानोंसे सम्पन्न करके उन्नत करते हैं तथा जिन्होंने सबसे पहले उत्पन्न होते हुए उन हिरण्यगर्भको देखा था, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वाधार सबके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं ॥ २ ॥ एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥ एषः = यह; देवः = परमदेव ( परमेश्वर ); अस्मिन् क्षेत्रे = इस जगत-क्षेत्रमें, ( सृष्टिके समय ) एकैकम् = एक एक; जालम् = जालको (बुद्धि आदि और आकाशादि तत्त्वोंको ), बहुधा = बहुत प्रकारसे; विकुर्वन् = विभक्त करके, ( उनका ) संहरति = ( प्रलयकालमें ) संहार कर देता है; महात्मा = ( वह ) महामना, ईशः = ईश्वर, भूयः = पुनः ( सृष्टिकालमें ), तथा = पहलेकी भाँति, पतयः सृष्ट्वा = ( समस्त लोकपालोंकी ) रचना करके; सर्वाधिपत्यम् कुरुते = ( स्वयं ) सबपर आधिपत्य करता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परमदेव परमेश्वर इस जगत्रूप क्षेत्रमें सृष्टिके समय एक एक जालको अर्थात् बुद्धि आदि और आकाश आदि अपनी प्रकृतियोंको बहुत प्रकारसे विभक्त करके—प्रत्येक प्रकृतिको भिन्न-भिन्न रूप, नाम और शक्तियोंसे युक्त करके उनका विस्तार करते हैं और स्वयं ही प्रलयकालमें उन सबका संहार कर लेते हैं। वे महामना परमेश्वर पुनः सृष्टिकालमें पहलेकी भाँति ही समस्त लोकोंकी और उनके अधिपतियोंकी रचना करके स्वयं उन सबके अधिष्ठाता बनकर उन सबपर शासन करते हैं। उनकी लीला अतर्क्य है, तर्कसे उसका रहस्य समझमें नहीं आ सकता । उनके सेवक ही उनकी लीलाके रहस्यको कुछ समझते हैं ॥ ३ ॥ सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्प्रकाशयन्भ्राजते यद्वनड्‌वान् । एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिखभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४ ॥ यत् उ = जिस प्रकार; अनड्‌वान् = सूर्य, ( अकेला ही ) सर्वाः = समस्त; दिशः = दिशाओंको, ऊर्ध्वम् अधः = ऊपर-नीचे, च = और, तिर्यक् = इधर-उधर—सब ओरसे, प्रकाशयन् = प्रकाशित करता हुआ, भ्राजते = देदीप्यमान होता है, एवम् = उसी प्रकार, सः = वह, भगवान् = भगवान्, वरेण्यः = भक्ति करनेयोग्य; देवः = परमदेव परमेश्वर, एकः = अकेला ही, योनिखभावान् अधितिष्ठति = समस्त कारणरूप अपनी शक्तियोंपर आधिपत्य करता है ॥ ४ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार यह सूर्य समस्त दिशाओंको ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर—सब ओरसे प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार वे भगवान्—सर्वविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सबके द्वारा भजनेयोग्य परमदेव परमेश्वर अकेले ही समस्त कारणरूप अपनी भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता होकर उन सबका संचालन करते हैं, सबको अपना-अपना कार्य करनेकी सामर्थ्य देकर यथायोग्य कार्यमे प्रवृत्त करते हैं ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातका इस मन्त्रमें स्पष्टीकरण किया जाता है— यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥ यत् = जो, विश्वयोनिः = सबका परम कारण है, च = और, स्वभावम् = समस्त तत्त्वोंकी शक्तिरूप स्वभावको, पचति = ( अपने सङ्कल्परूप तपसे ) पकाता है, च = तथा, यः = जो, सर्वान् = समस्त, पाच्यान् = पकाये जानेवाले पदार्थोंको, परिणामयेत् = नाना रूपोंमें परिवर्तित करता है, ( और ) यः = जो, एकः = अकेला ही; सर्वान् = समस्त; गुणान्

  • कुछ विद्वानोंने 'कपिल' शब्दको सांख्यशास्त्रके आदि वक्ता एवं प्रवर्तक भगवान् कपिलमुनिका वाचक माना है और इस प्रकार उनके द्वारा उपदिष्ट मतकी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता सिद्ध की है ।