कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 410, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध-पहले जो यह बात कही थी कि वे समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं, उसीका स्पष्टीकरण किया जाता है- अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥१९॥ सः=वह परमात्मा, अपाणिपादः=हाथ-पैरोंसे रहित होकर भी, ग्रहीता=समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला; (तथा) जवनः=वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करनेवाला है, अचक्षुः=आँखोंके बिना ही, पश्यति=वह सब कुछ देखता है, (और) अकर्णः=कानोंके बिना ही; शृणोति=सब कुछ सुनता है, सः=वह; वेद्यम्=जो कुछ भी जाननेमें आनेवाली वस्तुएँ हैं, उन सबको; वेत्ति=जानता है, च=और; तस्य वेत्ता=उसको जाननेवाला; (कोई) न=नहीं, अस्ति=है, तम्=(ज्ञानी पुरुष) उसे, महान्तम्=महान्; अग्र्यम्=आदि, पुरुषम्=पुरुष, आहुः= कहते हैं ॥ १९ ॥ व्याख्या-जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परब्रह्म परमात्मा हाथोंसे रहित होनेपर भी सब जगह समस्त वस्तुओंको ग्रहण कर लेते हैं तथा पैरोंसे रहित होकर भी बड़े वेगसे इच्छानुसार सर्वत्र गमनागमन करते हैं। आँखोंसे रहित होनेपर भी सब जगह सब कुछ देखते हैं, कानोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ सुनते हैं। वे समस्त जानने योग्य और जाननेमें आनेवाले जड़-चेतन पदार्थोंको भलीभाँति जानते हैं, परंतु उनको जाननेवाला कोई नहीं है। जो सबको जाननेवाले हैं, उन्हें भला कौन जान सकता है। उनके विषयमें ज्ञानी महापुरुष कहते हैं कि वे सबके आदि, पुरातन, महान् पुरुष हैं ॥ १९ ॥ अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः। तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥२०॥ अणोः अणीयान्= (वह) सूक्ष्मसे भी अतिसूक्ष्म; (तथा) महतः महीयान्=बड़ेसे भी बहुत बड़ा; आत्मा=परमात्मा, अस्य जन्तोः=इस जीवकी, गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें, निहितः=छिपा हुआ है; धातुः=सबकी रचना करनेवाले परमेश्वरकी, प्रसादात्=कृपासे; (जो मनुष्य) तम्=उस; अक्रतुम्=सङ्कल्परहित; ईशम्=परमेश्वरको; (और) महिमानम्=उसकी महिमाको; पश्यति=देख लेता है, (वह) वीतशोकः=सब प्रकारके दुःखोंसे रहित, [ भवति=हो जाता है ] ॥ २० ॥ व्याख्या-वे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और बड़ेसे भी बहुत बड़े परब्रह्म परमात्मा इस जीवकी हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। सबकी रचना करनेवाले उन परमेश्वरकी कृपासे ही मनुष्य उन स्वार्थके सङ्कल्पसे सर्वथा रहित, अकारण कृपा करनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरको और उनकी महिमाको जान सकता है। जब उन परम दयालु परम सुहृद् परमेश्वरका यह साक्षात् कर लेता है, तब सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे रहित होकर उन परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥ वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥२१॥ ब्रह्मवादिनः=वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष, यस्य=जिसके, जन्मनिरोधम्=जन्मका अभाव; प्रवदन्ति=बतलाते हैं, हि [ यम् ]=तथा जिसको, नित्यम्=नित्य, प्रवदन्ति=बतलाते हैं, एतम्=इस, विभुत्वात्=व्यापक होनेके कारण, सर्वगतम्=सर्वत्र विद्यमान, सर्वात्मानम्=सबके आत्मा, अजरम्=जरा, मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, पुराणम्=पुराण पुरुष परमेश्वरको, अहम्=मैं, वेद=जानता हूँ ॥ २१ ॥ व्याख्या-परमात्माको प्राप्त हुए महात्माका कहना है कि 'वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष जिन्हें जन्म- रहित तथा नित्य बताते हैं, व्यापक होनेके कारण जो सर्वत्र विद्यमान है-जिनसे कोई भी स्थान खाली नहीं है, जो जरा-