भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 832 में से

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पृष्ठ 409

व्याख्या—जो सबसे पहले हो चुका है, जो भविष्यमे होनेवाला है और जो वर्तमान कालमें अन्नके द्वारा अर्थात् खाद्य पदार्थोंके द्वारा बढ़ रहा है, वह समस्त जगत् परम पुरुष परमात्माका ही स्वरूप है। वे स्वयं ही अपनी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिसे इस रूपमें प्रकट होते हैं; तथा वे ही अमृतरूप मोक्षके स्वामी हैं अर्थात् जीवोंको संसार-बन्धनसे छुड़ाकर अपनी प्राप्ति करा देते हैं। अतएव उनकी प्राप्तिके अभिलाषी साधकोंको उन्हींकी शरणमें जाना चाहिये ॥ १५ ॥ सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१६॥ तत् = वह परम पुरुष परमात्मा; सर्वतःपाणिपादम् = सब जगह हाथ-पैरवाला; सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् = सब जगह आँख, सिर और मुखवाला; ( तथा ) सर्वतःश्रुतिमत् = सब जगह कानोंवाला है, ( वही ) लोके = ब्रह्माण्डमे, सर्वम् = सबको, आवृत्य = सब ओरसे घेरकर; तिष्ठति = स्थित है ॥ १६ ॥ व्याख्या-उन परमात्माके हाथ, पैर, आँखें, सिर, मुख और कान सब जगह हैं। वे सब जगह सब शक्तियोंसे सब कार्य करनेमें समर्थ हैं। उन्होंने सभी जगह अपने भक्तोंकी रक्षा करने तथा उन्हें अपनी ओर खींचनेके लिये हाथ बढ़ा रक्खा है। उनका भक्त उन्हें जहाँ चाहता है, वहीं उन्हें पहुँचा हुआ पाता है। वे सब जगह सब जीवोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंको देख रहे हैं। उनका भक्त जहाँ उन्हें प्रणाम करता है, सर्वत्र व्याप्त होनेके कारण उनके चरण और सिर आदि अङ्ग वहीं मौजूद रहते हैं। अपने भक्तकी प्रार्थना सुननेके लिये उनके कान सर्वत्र हैं और अपने भक्तद्वारा अर्पण की हुई वस्तुका भोग लगानेके लिये उनका मुख भी सर्वत्र विद्यमान है। वे परमेश्वर इस ब्रह्माण्डमें सबको सब ओरसे घेरकर स्थित हैं—इस बातपर विश्वास करके मनुष्यको उनकी सेवामें लग जाना चाहिये। यह मन्त्र गीतामें भी इसी रूपमें आया है ( १३ । ३ ) ॥ १६ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥१७॥ ( जो परम पुरुष परमात्मा ) सर्वेन्द्रियविवर्जितम् = समस्त इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी; सर्वेन्द्रिय- गुणाभासम् = समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है; (तथा) सर्वस्य = सबका; प्रभुम् = स्वामी; सर्वस्य = सबका, ईशानम् = शासक; ( और ) बृहत् = सबसे बड़ा; शरणम् = आश्रय है, [ प्रपद्येत = उसकी शरणमें जाना चाहिये ] ॥ १७ ॥ व्याख्या-जो सर्वशक्तिमान् परम पुरुष परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित—देहेन्द्रियादि भेदसे शून्य होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तथा सबके स्वामी, परम समर्थ, सबका शासन करनेवाले और जीवके लिये सबसे बड़े आश्रय हैं, मनुष्यको सर्वतोभावसे उन्हींकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। यही मनुष्य-शरीरका अच्छे से-अच्छा उपयोग है। इस मन्त्रका पूर्वार्द्ध गीतामें ज्यों-का त्यों आया है ( १३ । १४ ) ॥ १७ ॥ नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः । वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥१८॥ सर्वस्य = सम्पूर्ण, स्थावरस्य = स्थावर; च = और, चरस्य = जङ्गम; लोकस्य वशी = जगत्को वशमें रखनेवाला, हंसः = वह प्रकाशमय परमेश्वर, नवद्वारे = नव द्वारवाले, पुरे = शरीररूपी नगरमें; देही = अन्तर्यामीरूपसे हृदयमें स्थित देही है; ( तथा वही ) बहिः = बाह्य जगत्में भी, लेलायते = लीला कर रहा है ॥ १८ ॥ व्याख्या—सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम जीवोंके समुदायरूप इस जगत्को अपने वशमें रखनेवाले वे प्रकाशमय परमेश्वर दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा और एक उपस्थ—इस प्रकार नौ दरवाजोंवाले मनुष्य- शरीररूप नगरमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं और वे ही इस बाह्य जगत्में भी लीला कर रहे हैं। यों समझकर मन जहाँ सुगमतासे स्थिर हो सके, वहीं उनका ध्यान करना चाहिये ॥ १८ ॥