कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३८० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * वै = निश्चय ही; एषः = यह; महान् = महान्, प्रभुः = समर्थ, ईशानः = सबपर शासन करनेवाला; अव्ययः = अविनाशी; (एव) ज्योतिः = प्रकाशस्वरूप, पुरुषः = परमपुरुष पुरुषोत्तम, इमाम् सुनिर्मलाम् प्राप्तिम् [प्रति] = अपनी प्राप्तिरूप इस अत्यन्त निर्मल लाभकी ओर, सत्त्वस्य प्रवर्तकः = अन्तःकरणको प्रेरित करनेवाला है ॥ १२ ॥ व्याख्या—निश्चय ही ये सबपर शासन करनेवाले, महान्, प्रभु तथा अविनाशी और प्रकाशस्वरूप परम पुरुष पुरुषोत्तम पहले बताये हुए इस परम निर्मल लाभके प्रति अर्थात् अपने आनन्दमय विशुद्ध स्वरूपकी प्राप्तिकी ओर मनुष्यके अन्तःकरणको प्रेरित करते हैं, हरेक मनुष्यको ये अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तथापि यह मूर्ख जीव सब प्रकारका सुयोग पाकर भी उनकी प्रेरणाके अनुसार उनकी प्राप्तिके लिये तत्परतासे चेष्टा नहीं करता, इसी कारण मारा मारा फिरता है ॥ १२ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मन्वीशो मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१३॥ अङ्गुष्ठमात्रः = (यह) अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; अन्तरात्मा = अन्तर्यामी, पुरुषः = परम पुरुष (पुरुषोत्तम); सदा = सदा ही, जनानाम् = मनुष्योंके, हृदये = हृदयमें; संनिविष्टः = सम्यक् प्रकारसे स्थित है, मन्वीशः = मनका स्वामी है, (तथा) हृदा = निर्मल हृदय, (और) मनसा = विशुद्ध मनसे; अभिक्लृप्तः = ध्यानमें लाया हुआ (प्रत्यक्ष होता है), ये = जो; एतत् = इस परब्रह्म परमेश्वरको, विदुः = जान लेते हैं; ते = वे; अमृताः = अमर; भवन्ति = हो जाते हैं ॥ १३ ॥ व्याख्या—अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाले अन्तर्यामी परमपुरुष परमेश्वर सदा ही मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं और मनके स्वामी हैं, तथा निर्मल हृदय और विशुद्ध मनके द्वारा ध्यानमें लाये जाकर प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इन परब्रह्म परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं, अर्थात् सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं—अमृतस्वरूप बन जाते हैं। यहाँ परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला इसलिये बताया गया है कि मनुष्यका हृदय अंगूठेके नापका होता है और वही परमात्माकी उपलब्धिक स्थान है। ब्रह्मसूत्रमें भी इस विषयपर विचार करके यही निश्चय किया गया है (ब्र० सू० १।३। २४-२५) ॥ १३ ॥ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१४॥ पुरुषः = वह परम पुरुष; सहस्रशीर्षा = हजारों सिरवाला, सहस्राक्षः = हजारों आँखवाला, सहस्रपात् = (और) हजारों पैरवाला है; सः = वह; भूमिम् = समस्त जगत्को; विश्वतः = सब ओरसे, वृत्वा = घेरकर, दशाङ्गुलम् अति = नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर (हृदयमें); अतिष्ठत् = स्थित है ॥ १४ ॥ व्याख्या—उन परम पुरुष परमेश्वरके हजारों सिर, हजारों आँखें और हजारों पैर हैं। अर्थात् सब अवयवोंसे रहित होनेपर भी उनके सिर, आँख और पैर आदि सभी अङ्ग अनन्त और असंख्य हैं। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर सर्वत्र व्याप्त हुए ही नाभिसे दस अंगुल ऊपर हृदयाकाशमें स्थित हैं। वे सर्वव्यापी और महान् होते हुए ही हृदयरूप एकदेशमें स्थित हैं। वे अनेक विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं ॥ १४ ॥ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥१५॥ यत् = जो, भूतम् = अबसे पहले हो चुका है, यत् = जो; भव्यम् = भविष्यमें होनेवाला है; च = और, यत् = जो, अन्नेन = खाद्य पदार्थोंसे, अतिरोहति = इस समय बढ़ रहा है, इदम् = यह; सर्वम् = समस्त जगत्, पुरुषः एव = परम पुरुष परमात्मा ही है; उत = और; (वही) अमृतत्वस्य = अमृतस्वरूप मोक्षका; ईशानः = स्वामी है ॥ १५ ॥