कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 407
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७९ —इस जन्म मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छुटकारा पानेमें समर्थ होता है। परम पदकी प्राप्तिके लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग अर्थात् उपाय नहीं है ॥ ८ ॥ यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९ ॥ यस्मात् परम् = जिससे श्रेष्ठ, अपरम् = दूसरा; किंचित् = कुछ भी; न = नहीं, अस्ति = है, यस्मात् = जिससे (बढकर), कश्चित् = कोई भी; न = न तो, अणीयः = अधिक सूक्ष्म, न = और न, ज्यायः = महान् ही, अस्ति = है, एकः = (जो) अकेला ही, वृक्षः इव = वृक्षकी भाँति, स्तब्धः = निश्चलभावसे; दिवि = प्रकाशमय आकाशमें, तिष्ठति = स्थित है, तेन पुरुषेण = उस परमपुरुष पुरुषोत्तमसे, इदम् = यह; सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्, पूर्णम् = परिपूर्ण है ॥ ९ ॥ व्याख्या—उन परमदेव परमेश्वरसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है, वे सर्वश्रेष्ठ हैं। जितने भी सूक्ष्म तत्त्व हैं, उन सबसे अधिक सूक्ष्म वे परमेश्वर हैं। उनसे अधिक सूक्ष्म कोई भी नहीं है। इसीसे वे छोटे-से छोटे जीवके शरीरमें प्रविष्ट होकर स्थित हैं। इसी प्रकार जितने भी महान् व्यापक तत्त्व हैं, उन सबसे महान्—अधिक व्यापक वे परब्रह्म हैं, उनसे बड़ा—उनसे अधिक व्यापक कोई भी नहीं है। इसीसे वे प्रलयकालमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपने अदर लीन कर लेते हैं। जो अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चलभावसे परमधामरूप प्रकाशमय दिव्य आकाशमें स्थित हैं, वे परम पुरुष परमेश्वर निराकाररूपसे सारे जगत्में परिपूर्ण हैं ॥ ९ ॥ ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम् । य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥१०॥ ततः = उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे, यत् = जो, उत्तरतरम् = अत्यन्त उत्कृष्ट है, तत् = वह परब्रह्म परमात्मा; अरूपम् = आकाररहित, (और) अनामयम् = सब प्रकारके दोषोंसे शून्य है; ये = जो, एतत् = इस परब्रह्म परमात्माको; विदुः = जानते हैं, ते = वे, अमृताः = अमर, भवन्ति = हो जाते हैं; अथ = परन्तु; इतरे = इस रहस्यको न जाननेवाले दूसरे लोग; (वार-वार) दुःखम् = दुःखको, एव = ही; अपियन्ति = प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥ व्याख्या—उस पहले बताये हुए हिरण्यगर्भसे जो सब प्रकारसे अत्यन्त उत्कृष्ट हैं, वे परब्रह्म परमात्मा आकाररहित और सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य हैं; जो कोई महापुरुष इन परब्रह्म परमात्माको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं— सदाके लिये जन्म-मृत्युके दुःखोंसे छूट जाते हैं। परंतु जो इन्हें नहीं जानते, वे सब लोग निश्चयपूर्वक बार-बार दुःखोंको प्राप्त होते हैं। अतः मनुष्यको सदाके लिये दुःखोंसे छूटने और परमानन्दस्वरूप परमात्माको पानेके लिये उन्हें जानना चाहिये ॥१०॥ सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः । सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥११॥ सः = वह, भगवान् = भगवान्, सर्वाननशिरोग्रीवः = सब ओर मुख, सिर और ग्रीवावाला है, सर्वभूतगुहाशयः = समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करता है, (और) सर्वव्यापी = सर्वव्यापी है, तस्मात् = इसलिये, सः = वह, शिवः = कल्याणस्वरूप परमेश्वर, सर्वगतः = सब जगह पहुँचा हुआ है ॥ ११ ॥ व्याख्या—उन सर्वेश्वर भगवान्के सभी जगह मुख हैं, सभी जगह सिर और सभी जगह गला हैं। भाव यह कि वे प्रत्येक स्थानपर प्रत्येक अङ्गद्वारा किया जानेवाला कार्य करनेमें समर्थ हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें निवास करते हैं और सर्वव्यापी हैं, इसलिये वे कल्याणस्वरूप परमेश्वर सभी जगह पहुँचे हुए हैं। अभिप्राय यह कि साधक उनको जिस समय, जहाँ और जिस रूपमें प्रत्यक्ष करना चाहे, उसी समय, उसी जगह और उसी रूपमें वे प्रत्यक्ष हो सकते हैं ॥ ११ ॥ महान्प्रभुर्वे पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः । सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥१२॥