कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३७८ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * रुद्र = हे रुद्रदेव, ने = तेरी, या = जो अघोरा = भयानकतासे शून्य (सौम्य); अपापकाशिनी = पुण्यने प्रकाशित होनेवाली (तथा) शिवा = कल्याणमयी, तनूः = मूर्ति है गिरिशन्त = हे पर्वतपर रहकर सुखका विस्तार करनेवाले शिव, तया = उस, शान्तमया तनुवा = परम शान्त मूर्तिसे, (तू कृपा करके) न अभिचाकशीहि = हमलोगोंको देखो ॥ ५ ॥ व्याख्या- हे रुद्रदेव ! आपकी जो भयानकतासे शून्य तथा पुण्यकर्मसे प्रकाशित होनेवाली कल्याणमयी सौम्यमूर्ति है— जिसका दर्शन करके मनुष्य परम आनन्दमें मग्न हो जाता है—हे गिरिशन्त अर्थात् पर्वतपर निवास करते हुए समस्त लोकोंको सुख पहुँचानेवाले परमेश्वर ! उस परमशान्त मूर्तिसे ही कृपा करके आप हमलोगोंकी ओर देखिये । आपकी कृपादृष्टि पड़ते ही हम सर्वथा पवित्र होकर आपकी प्राप्तिके योग्य बन जायँगे ॥ ५ ॥ यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हि१सीः पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥ गिरिशन्त = हे गिरिशन्त ! याम् = जिस, इषुम् = बाणको अस्तवे = फेंकनेके लिये, (तू) हस्ते = हाथमें, बिभर्षि = धारण किये हुए है, गिरित्र = हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले देव !, ताम् = उस बाणको, शिवाम् = कल्याणमय, कुरु = बना ले, पुरुषम् = जीव-समुदायरूप, जगत् = जगत्को, मा हिंसीः = नष्ट न कर (कष्ट न दे ) ॥ ६ ॥ व्याख्या- हे गिरिशन्त—हे कैलासवासी सुखदायक परमेश्वर ! जिस बाणको फेंकनेके लिये आपने हाथमें ले रक्खा है, हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले ! आप उस बाणको कल्याणमय बना ले—उसकी क्रूरताको नष्ट करके उसे शान्तिमय बना लें । इस जीवसमुदायरूप जगत्को कष्ट न दे—इसका विनाश न करें ॥ ६ ॥ ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥ ततः = पूर्वोक्त जीव-समुदायरूप जगत्से, परम् = परे, (और) ब्रह्मपरम् = हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, सर्वभूतेषु = समस्त प्राणियोंमें, यथानिकायम् = उनके शरीरोंके अनुरूप होकर, गूढम् = छिपे हुए, (और) विश्वस्य परिवेष्टितारम् = सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे घेरे हुए, तम् = उस, बृहन्तम् = महान्, सर्वत्र व्यापक, एकम् = एकमात्र देव, ईशम् = परमेश्वरको, ज्ञात्वा = जानकर, अमृताः भवन्ति = (ज्ञानीजन) अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या- जो पहले कहे हुए जीव-समुदायरूप जगत्से और हिरण्यगर्भ नामक ब्रह्मासे भी सर्वथा श्रेष्ठ हैं, समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरोंके अनुरूप होकर छिपे हुए हैं; समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए हैं; तथा सर्वत्र व्याप्त और महान् हैं; उन एकमात्र परमेश्वरको जानकर ज्ञानीजन सदाके लिये अमर हो जाते हैं; फिर कभी उनका जन्म-मरण नहीं होता ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-अब इस मन्त्रमें ज्ञानी महापुरुषके अनुभवकी बात कहकर परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ता दिखलाते हैं— वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था - विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥ तमसः परस्तात् = अविद्यारूप अन्धकारसे अतीत, (तथा) आदित्यवर्णम् = सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप; एतम् = इस, महान्तम् पुरुषम् = महान् पुरुष (परमेश्वर) को, अहम् = मैं, वेद = जानता हूँ, तम् = उसको, विदित्वा = जान- कर; एव = ही, (मनुष्य) मृत्युम् = मृत्युको अत्येति (अति+एति) = उल्लङ्घन कर जाता है, अयनाय = (परमपदकी) प्राप्तिके लिये, अन्यः = दूसरा, पन्थाः = मार्ग, न = नहीं विद्यते = है ॥ ८ ॥ व्याख्या-कोई ज्ञानी महापुरुष कहता है—'इन महान्से भी महान् परम पुरुषोत्तमको मैं जानता हूँ । वे अविद्या- रूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत हैं तथा सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं। उनको जानकर ही मनुष्य मृत्युका उल्लङ्घन करनेमें