भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 832 में से

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पृष्ठ 405
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७७ जीवोंके भीतर, तिष्ठति=स्थित हो रहा है, विश्वा=सम्पूर्ण; भुवनानि संसृज्य=लोकोंकी रचना करके, गोपाः=उनकी रक्षा करनेवाला परमेश्वर; अन्तकाले=प्रलयकालमें; संचुकोच=इन सबको समेट लेता है ॥ २ ॥ व्याख्या—जो अपनी स्वरूपभूत विविध शासन-शक्तियोंद्वारा इन सब लोकोंपर शासन करते हैं—उनका नियमानुसार संचालन करते हैं, वे परमेश्वर एक ही हैं। अर्थात् यद्यपि इस विश्वका नियमन करनेवाली शक्तियाँ अनेक हैं, वे सब हैं एक ही परमेश्वरकी शक्तियाँ, अलग-अलग नहीं हैं। इसी कारण, ज्ञानीजनोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय किसी भी दूसरे तत्त्वका आश्रय नहीं लिया। सबने एक स्वरसे यही निश्चय किया कि एक परब्रह्म ही इस जगत्के कारण है। वे परमात्मा सब जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इन समस्त लोकोंकी रचना करके उनकी रक्षा करनेवाले परमेश्वर प्रलयकालमें स्वयं ही इन सबको समेट लेते हैं, अर्थात् अपनेमें विलीन कर लेते हैं। उस समय इनकी भिन्न-भिन्न रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं रहती ॥ २ ॥ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ॥ ३ ॥ विश्वतश्चक्षुः=सब जगह आँखवाला, उत=तथा; विश्वतोमुखः=सब जगह मुखवाला; विश्वतोबाहुः=सब जगह हाथवाला, उत=और; विश्वतस्पात्=सब जगह पैरवाला; द्यावाभूमी जनयन्=आकाश और पृथ्वीकी सृष्टि करनेवाला, [ सः=वह, ] एकः=एकमात्र, देवः=देव ( परमात्मा ); बाहुभ्याम्=मनुष्य आदि जीवोंको दो दो बाँहोंसे; संधमति=युक्त करता है, ( तथा ) पतत्रैः=(पक्षी-पतंग आदिको) पाँखोंसे, सं [धमति]=युक्त करता है॥ ३ ॥ व्याख्या—वे परमदेव परमेश्वर एक हैं, फिर भी उनकी सब जगह आँखें हैं, सब जगह मुख हैं, सब जगह हाथ हैं और सब जगह पैर हैं। भाव यह कि वे सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित समस्त जीवोंके कर्म और विचारोंको तथा समस्त घटनाओंको अपनी दिव्य शक्तिद्वारा निरन्तर देखते रहते हैं, कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती। उनका भक्त उनको जहाँ-कहीं भोजनके योग्य वस्तु समर्पित करता है, उसे वे वहीं भोग लगा सकते हैं। वे सब जगह प्रत्येक वस्तुको एक साथ ग्रहण करनेमें और अपने आश्रित जनोंके संकटका नाश करके उनकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, तथा जहाँ-कहीं उनके भक्त उन्हें बुलाना चाहें, वहीं वे एक साथ पहुँच सकते हैं। संसारमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ उनकी ये शक्तियाँ विद्यमान न हों। आकाशसे लेकर पृथ्वीतक समस्त लोकोंकी रचना करनेवाले एक ही परमदेव परमेश्वर मनुष्य आदि प्राणियोंको दो-दो भुजाओंसे और पक्षियोंको पाँखोंसे युक्त करते हैं। भाव यह कि वे समस्त प्राणियोंको आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न शक्तियों एव साधनोंसे सम्पन्न करते हैं। यहाँ भुजा और पाँखोंका कथन उपलक्षणमात्र है। इससे यह समझ लेना चाहिये कि समस्त प्राणियोंमें जो कुछ भी शक्ति है, वह सब परमात्माकी ही दी हुई है ॥ ३ ॥ यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ४ ॥ यः=जो, रुद्रः=रुद्र; देवानाम्=इन्द्रादि देवताओंकी, प्रभवः=उत्पत्तिका हेतु; च=और; उद्भवः= वृद्धिका हेतु है, च=तथा; (जो) विश्वाधिपः=सबका अधिपति; (और) महर्षिः=महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है; पूर्वम्=(जिसने) पहले; हिरण्यगर्भम्=हिरण्यगर्भको; जनयामास=उत्पन्न किया था; सः=वह परमदेव परमेश्वर, नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे; संयुनक्तु=संयुक्त करे ॥ ४ ॥ व्याख्या—सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानी—सर्वज्ञ हैं; जिन्होंने सृष्टिके आदिमें हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया था, वे परमदेव परमात्मा हमलोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें ॥ ४ ॥ या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ ५ ॥ उ० सं० ४८-
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