कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 404, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाला है, [ सः = वह, ] जनान् प्रत्यङ् = सब जीवोंके भीतर, ( अन्तर्यामीरूपसे ) तिष्ठति = स्थित है; (और) सर्वतोमुखः = सब ओर मुखवाला है ॥ १६ ॥ व्याख्या - निश्चय ही ये ऊपर बताये हुए परमदेव ब्रह्म समस्त दिशा और अवान्तर दिशाओमे व्याप्त हे अर्थात् सर्वत्र परिपूर्ण हैं। जगत्में कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ वे न हों । वे ही प्रसिद्ध परब्रह्म परमात्मा सबसे पहले हिरण्य- गर्भरूपमें प्रकट हुए थे । वे ही इस ब्रह्माण्डरूप गर्भमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं । वे ही इस समय जगत्के रूपमे प्रकट हैं और भविष्यमें अर्थात् प्रलयके बाद सृष्टिकालमे पुनः प्रकट होनेवाले हैं । वे समस्त जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं, तथा सब ओर मुखवाले अर्थात् सबको सब ओरसे देखनेवाले हैं ॥ १६ ॥ यो देवो अग्नौ यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश । य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥१७॥ यः = जो, देवः = परमदेव परमात्मा; अग्नौ = अग्निमें है; यः = जो, अप्सु = जलमे है, यः = जो; विश्वम् भुवनम् आविवेश = समस्त लोकोमे प्रविष्ट हो रहा है, यः = जो, ओषधीषु = ओषधियोंमे है, ( तथा ) यः = जो; वनस्पतिषु = वनस्पतियोंमें है, तस्मै देवाय = उन परमदेव परमात्माके लिये; नमः = नमस्कार है; नमः = नमस्कार है ॥ १७ ॥ व्याख्या - जो सर्वशक्तिमान् पूर्णब्रह्म परमदेव अग्निमे है, जो जलमे हे, जो समस्त लोकोंमे अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हो रहे हैं, जो ओषधियोंमें हैं और जो वनस्पतियोमे है, अर्थात् जो सर्वत्र परिपूर्ण हैं, जिनका अनेक प्रकारसे पहले वर्णन कर आये हैं, उन परमदेव परमात्माको नमस्कार है ! नमस्कार है । 'नमः' शब्द को दुहरानेका अभिप्राय अध्यायकी समाप्तिको सूचित करना है ॥१७॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अध्याय य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वाँल्लोकानीशत ईशनीभिः । य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥ यः = जो, एकः = एक; जालवान् = जगत्रूप जालका अधिपति, ईशनीभिः = अपनी स्वरूपभूत शासनशक्तियोद्वारा, ईशते = शासन करता है, ईशनीभिः = उन विविध शासन शक्तियोँद्वारा, सर्वान् = सम्पूर्ण, लोकान् ईशते = लोकोपर शासन करता है, यः = ( तथा ) जो; एकः = अकेला, एव = ही, सम्भवे च उद्भवे = सृष्टि और उसके विस्तारमें ( सर्वथा समर्थ है); एतत् = इस ब्रह्मको, ये = जो महापुरुष, विदुः = जान लेते हैं, ते = वे; अमृताः = अमर, भवन्ति = हो जाते हैं ॥ १ ॥ व्याख्या - जो एक-अद्वितीय परमात्मा जगत्-रूप जालकी रचना करके अपनी स्वरूपभूत शासन शक्तियोँद्वारा उसपर शासन कर रहे हैं, तथा उन विविध शासन शक्तियोद्वारा समस्त लोकों और लोकपालोंका यथायोग्य सचालन कर रहे हैं- जिनके शासनमें ये सब अपने-अपने कर्तव्योंका नियमपूर्वक पालन कर रहे है, तथा जो अकेले ही विना किसी दूसरेकी सहायता लिये समस्त जगत्की उत्पत्ति और उसका विस्तार करनेमे सर्वथा समर्थ हैं, उन परब्रह्म परमेश्वरको जो महापुरुष तत्त्वसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं-जन्म-मृत्युके जालसे सदाके लिये छूट जाते हैं ॥ १ ॥ एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः । प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥ २ ॥ यः = जो; ईशनीभिः = अपनी स्वरूपभूत विविध शासन शक्तियोँद्वारा, इमान् = इन सब, लोकान् ईशते = लोकोंपर शासन करता है, [ सः ] रुद्रः = वह रुद्र; एकः हि = एक ही है, (इसीलिये विद्वान् पुरुषोंने जगत्के कारणका निश्चय करते समय ) द्वितीयाय न तस्थुः = दूसरेका आश्रय नही लिया, [ सः = वह परमात्मा, ] जनान् प्रत्यङ् = समस्त