भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 403
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३७५ मधुर और स्पष्ट हो जाता है । शरीरमेंसे बहुत अच्छी गन्ध निकलकर सब ओर फैल जाती है । मल और मूत्र बहुत ही स्वल्प मात्रामें होने लगते हैं । ये सब योगमार्गकी प्रारम्भिक सिद्धियाँ हैं—ऐसा योगीलोग कहते हैं ॥ १३ ॥ यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् । तद्वाऽऽत्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः ॥१४॥ यथा=जिस प्रकार, मृदया=मिट्टीसे, उपलिप्तम्=लिप्त होकर मलिन हुआ, [यत् = जो,] तेजोमयम् = प्रकाशयुक्त, बिम्बम्=रत्न है, तत् एव =वही, सुधान्तम्=भलीभाँति धुल जानेपर, भ्राजते= चमकने लगता है, तत् वा= उसी प्रकार, देही = शरीरधारी (जीवात्मा ), आत्मतत्त्वम् = ( मल आदिसे रहित ) आत्म तत्त्वको, प्रसमीक्ष्य = (योगके द्वारा ) भलीभाँति प्रत्यक्ष करके, एकः =अकेला, कैवल्य अवस्थाको प्राप्त, वीतशोकः = सब प्रकारके दुःखोंसे रहित, (तथा ) कृतार्थः =कृतकृत्य, भवते=हो जाता है ॥ १४ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार कोई तेजोमय रत्न मिट्टीसे लिप्त रहनेके कारण छिपा रहता है, अपने असली रूपमें प्रकट नहीं होता, परंतु वही जब मिट्टी आदिको हटाकर धो पोछकर साफ कर लिया जाता है, तब अपने असली रूपमें चमकने लगता है; उसी प्रकार इस जीवात्माका वास्तविक स्वरूप अत्यन्त स्वच्छ होनेपर भी अनन्त जन्मोंमे किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे मलिन हो जानेके कारण प्रत्यक्ष प्रकट नहीं होता, परन्तु जब मनुष्य ध्यानयोगके साधनद्वारा समस्त मलोंको धोकर आत्माके यथार्थ स्वरूपको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह असङ्ग हो जाता है । अर्थात् उसका जो जड पदार्थोंके साथ संयोग हो रहा था, उसका नाश होकर वह कैवल्य अवस्थाको प्राप्त हो जाता है । तथा उसके सब प्रकारके दुःखोंका अन्त होकर वह सर्वथा कृतकृत्य हो जाता है । उसका मनुष्य-जन्म सार्थक हो जाता है ॥ १४ ॥ यदाऽऽत्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् । अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१५॥ तु= उसके बाद, यदा = जब, युक्तः = वह योगी, इह=यहाँ, दीपोपमेन=दीपकके सदृश ( प्रकाशमय ), आत्म- तत्त्वेन=आत्मतत्त्वके द्वारा; ब्रह्मतत्त्वम्=ब्रह्मतत्त्वको, प्रपश्येत्=भलीभाँति प्रत्यक्ष देख लेता है, [तदा सः = उस समय वह; ] अजम् = ( उस ) अजन्मा, ध्रुवम् = निश्चल, सर्वतत्त्वैः = समस्त तत्त्वोंसे, विशुद्धम् = विशुद्ध, देवम् = परमदेव परमात्माको, ज्ञात्वा= जानकर, सर्वपाशैः = सब बन्धनोंसे, मुच्यते=सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—फिर जब वह योगी इसी स्थितिमें दीपकके सदृश निर्मल प्रकाशमय पूर्वोक्त आत्मतत्त्वके द्वारा ब्रह्मतत्त्वको भलीभाँति देख लेता है—अर्थात् उन परब्रह्म परमात्माको प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उन जन्मादि समस्त विकारोंसे रहित, अचल और निश्चित तथा समस्त तत्त्वोंसे असङ्ग—सर्वथा विशुद्ध परम देव परमात्माको तत्त्वसे जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये छूट जाता है । इस मन्त्रमे आत्मतत्त्वसे ब्रह्मतत्त्वको जाननेकी बात कहकर यह भाव दिखाया गया है कि परमात्माका साक्षात्कार मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा नहीं हो सकता । इन सबकी वहाँ पहुँच नहीं है, वे एकमात्र आत्मतत्त्वके द्वारा ही प्रत्यक्ष होते हैं ॥ १५ ॥ एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥१६॥ ह= निश्चय ही, एषः= यह ( ऊपर बताया हुआ ), देवः = परमदेव परमात्मा, सर्वाः = समस्त, प्रदिशः अनु= दिशाओं और अवान्तर दिशाओंमें अनुगत ( व्याप्त ) है, [ सः ] ह = वही— प्रसिद्ध परमात्मा, पूर्वः = सबसे पहले, जातः = हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था, ( और ) सः उ =वही, गर्भे= समस्त ब्रह्माण्डरूप गर्भमें, अन्तः = अन्तर्यामीरूपसे स्थित है, सः एव=वही; जातः = इस समय जगत्के रूपमे प्रकट है, सः = और वही; जनिष्यमाणः = भविष्यमें भी प्रकट होने-