कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८३ मृत्यु आदि समस्त विकारोंसे सर्वथा रहित हैं और सबके आदि-पुराणपुरुष हैं, उन सबके आत्मा-अन्तर्यामी परब्रह्म परमेश्वरको मैं जानता हूँ ॥ २१ ॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ अध्याय य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद्वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १ ॥ यः=जो; अवर्णः=रंग, रूप आदिसे रहित होकर भी, निहितार्थः=छिपे हुए प्रयोजनवाला होनेके कारण, बहुधा शक्तियोगात्=विविध शक्तियोंके सम्बन्धसे; आदौ=सृष्टिके आदिमें; अनेकान्=अनेक, वर्णान्=रूप रंगः दधाति=धारण कर लेता है, च=तथा; अन्ते=अन्तमें; विश्वम्=यह सम्पूर्ण विश्व; (जिसमें) व्येति (वि+एति) च= विलीन भी हो जाता है, सः=वह, देवः=परमदेव (परमात्मा), एकः=एक (अद्वितीय) है, सः=वह, नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे, संयुनक्तु=संयुक्त करे ॥ १ ॥ व्याख्या-जो परब्रह्म परमात्मा अपने निराकार स्वरूपमें रूप-रंग आदिसे रहित होकर भी सृष्टिके आदिमे किसी अज्ञात प्रयोजनसे अपनी स्वरूपभूत नाना प्रकारकी शक्तियोंके सम्बन्धसे अनेक रूप-रंग आदि धारण करते हैं तथा अन्तमे यह सम्पूर्ण जगत् जिनमें विलीन भी हो जाता है-अर्थात् जो बिना किसी अपने प्रयोजनके जीवोंका कल्याण करनेके लिये ही उनके कर्मानुसार इस नाना रंग-रूपवाले जगत्की रचना, पालन और संहार करते हैं, वे परमदेव परमेश्वर वास्तवमें एक-अद्वितीय हैं। उनके अतिरिक्त कुछ नहीं है। वे हमें शुभ बुद्धिसे युक्त करें ॥ १ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया। अब तीन मन्त्रोंद्वारा परमेश्वरका जगत्के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुति करनेका प्रकार बतलाया जाता है- तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्लं तद्ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः ॥ २ ॥ तत् एव=वही, अग्निः=अग्नि है, तत्=वह, आदित्यः=सूर्य है, तत्=वह, वायुः=वायु है, उ=तथा, तत्=वही, चन्द्रमाः=चन्द्रमा है, तत्=वह, शुक्रम्=अन्यान्य प्रकाशयुक्त नक्षत्र आदि है, तत्=वह, आपः=जल है, तत्=वह, प्रजापतिः=प्रजापति है; (और) तत् एव=वही, ब्रह्म=ब्रह्मा है ॥ २ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म ही अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, अन्यान्य प्रकाशमय नक्षत्र आदि जल, प्रजापति और ब्रह्मा है। ये सब उन एक अद्वितीय परब्रह्म परमेश्वरकी ही विभूतियाँ हैं। इन सबके अन्तर्यामी आत्मा वे ही हैं, अतः ये सब उन्हींके स्वरूप हैं। इस प्रकार इस सम्पूर्ण जगत्के रूपमें उन परमात्माका चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥ त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ३-॥ त्वम्=तू, स्त्री=स्त्री है; त्वम्=तू; पुमान्=पुरुष है, त्वम्=तू ही, कुमारः=कुमार, उत वा=अथवा, कुमारी= कुमारी, असि=है, त्वम्=तू; जीर्णः=बूढ़ा होकर, दण्डेन=लाठीके सहारे, अञ्चसि=चलता है; उ=तथा, त्वम्=तू ही; जातः=विराट्रूपमें प्रकट होकर; विश्वतोमुखः=सब ओर मुखवाला; भवसि=हो जाता है ॥ ३ ॥ व्याख्या-हे सर्वेश्वर ! आप स्त्री, पुरुष, कुमार, कुमारी आदि अनेक रूपोंवाले हैं—अर्थात् इन सबके रूपमें आप ही प्रकट हो रहे हैं। आप ही बूढ़े होकर लाठीके सहारे चलते हैं अर्थात् आप ही वृद्धोंके रूपमें अभिव्यक्त हैं। हे परमात्मन् !