भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 412

३८४ * विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * आप ही विराट्रूपमें प्रकट होकर सब ओर मुख किये हुए हैं, अर्थात् सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। जगत्‌में जितने भी मुख दिखायी देते हैं, सब आपके ही हैं ॥ ३ ॥ नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्षस्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः । अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥ [ त्वम् एव = तू ही; ] नीलः = नीलवर्ण; पतङ्गः = पतङ्ग है; हरितः = हरे रंगका; (और) लोहिताक्षः = लाल आँखोंवाला (पक्षी है एवं); तडिद्गर्भः = मेघ; ऋतवः = वसन्त आदि ऋतुएँ; (तथा) समुद्राः = सप्त समुद्ररूप है; यतः = क्योंकि; [त्वत्तः एव = तुझसे ही; ] विश्वा = सम्पूर्ण; भुवनानि = लोक; जातानि = उत्पन्न हुए हैं; त्वम् = तू ही; अनादिमत् = अनादि (प्रकृतियों) का स्वामी; (और) विभुत्वेन = व्यापकरूपसे; वर्तसे = सबमें विद्यमान है ॥ ४ ॥ व्याख्या—हे सर्वान्तर्यामिन् ! आप ही नीले रंगके पतङ्ग (भौंरे) तथा हरे रंग और लाल आँखोंवाले पक्षी—तोते हैं; आप ही बिजलीसे युक्त मेघ हैं, वसन्तादि सब ऋतुएँ और सप्त समुद्र भी आपके ही रूप हैं। अर्थात् इन नाना प्रकारके रंग-रूपवाले समस्त जड-चेतन पदार्थोके रूपमें मैं आपको ही देख रहा हूँ; क्योंकि आपसे ही ये समस्त लोक और उनमें निवास करनेवाले सम्पूर्ण जीव-समुदाय प्रकट हुए हैं। व्यापकरूपसे आप ही सबमें विद्यमान हैं तथा अव्यक्त एवं जीवरूप अपनी दो अनादि प्रकृतियोंके (जिन्हें गीतामें अपरा और परा नामोंसे कहा गया है) स्वामी भी आप ही हैं। अतः एकमात्र आपको ही मैं सबके रूपमें देखता हूँ ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—पूर्वमन्त्रमें परब्रह्म परमेश्वरको जिन दो प्रकृतियोंका स्वामी बताया गया है, वे दोनों अनादि प्रकृतियाँ कौन-सी हैं— इसका स्पष्टीकरण किया जाता है— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥ =अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय; बह्वीः = बहुत-से; प्रजाः = भूत-समुदायोंको; सृजमानाम् = रचने- वाली; (तथा) लोहितशुक्लकृष्णाम् = लाल, सफेद और काले रंगकी अर्थात् त्रिगुणमयी; एकाम् = एक; अजाम् = अजा (अजन्मा—अनादि प्रकृति) को, हि = निश्चय ही, एकः = एक; अजः = अज (अज्ञानी जीव); जुषमाणः = आसक्त हुआ; अनुशेते = भोगता है; (और) अन्यः = दूसरा; अजः = अज (ज्ञानी महापुरुष); एनाम् = इस; भुक्तभोगाम् = भोगी हुई प्रकृतिको; जहाति = त्याग देता है ॥ ५ ॥ व्याख्या—पिछले मन्त्रमें जिनका संकेत किया गया है, उन दो प्रकृतियोंमेंसे एक तो वह है, जिसका गीतामें अपरा नामसे उल्लेख हुआ है तथा जिसके आठ भेद किये गये हैं (गीता ७।४)। यह अपने अधिष्ठाता परमदेव परमेश्वरकी अध्यक्षतामें अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय असंख्य जीवदेहोंको उत्पन्न करती है। त्रिगुणमयी अथवा त्रिगुणात्मिका होनेसे इसे तीन रंगवाली कहा गया है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही इसके तीन रंग हैं। सत्त्वगुण निर्मल एवं प्रकाशक होनेसे उसे श्वेत माना गया है। रजोगुण रागात्मक है, अतएव उसका रंग लाल माना गया है तथा तमोगुण अज्ञानरूप एवं आवरक होनेसे उसे कृष्णवर्ण कहा गया है। इन तीन गुणोंको लेकर ही प्रकृतिको सफेद, लाल एवं काले रंगकी कहा गया है। दूसरी जिसका गीतामें जीवरूप परा अथवा चेतन प्रकृतिके नामसे (७।५), क्षेत्रज्ञके नामसे (१३।१) तथा अक्षर पुरुषके नामसे (१५।१६) वर्णन किया गया है, उसके दो भेद हैं। एक तो वे जीव, जो उस अपरा प्रकृतिमें आसक्त होकर—उसके साथ एकरूप होकर उसके विचित्र भोगोंको अपने कर्मानुसार भोगते हैं। दूसरा समुदाय उन ज्ञानी महापुरुषोंका है, जिन्होंने इसके भोगोंको भोगकर इसे निःसार और क्षणभङ्गुर समझकर इसका सर्वथा परित्याग कर दिया है। ये दोनों प्रकारके जीव स्वरूपतः अजन्मा तथा अनादि हैं। इसीलिये इन्हें 'अज' कहा गया है ॥ ५॥

  • सांख्यमतावलम्बियोंने इस मन्त्रको सांख्यशास्त्रका बीज माना है और इसीके आधारपर उक्त दर्शनको श्रुति-सम्मत सिद्ध किया है। सांख्यकारिकाके प्रसिद्ध टीकाकार तथा अन्य दर्शनोंके व्याख्याता सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-स्वामिवन्द्य श्रीवाचस्पति मिश्रने अपनी सांख्यतत्त्व- कौमुदी नामक टीकाके आरम्भमें इसी मन्त्रको कुछ परिवर्तनके साथ मङ्गलाचरणके रूपमें उद्धृत करते हुए इसमें वर्णित प्रकृतिकी वन्दना