भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 413
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८५ सम्बन्ध—वह परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो इस प्रकृतिके भोगोंको भोगता है, कब और कैसे मुक्त हो सकता है— इस जिज्ञासापर दो मन्त्रोंमें कहते हैं— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ६ ॥ सयुजा=सदा साथ रहनेवाले, ( तथा ) सखाया=परस्पर सख्यभाव रखनेवाले, द्वा=दो, सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा एव परमात्मा); समानम् = एक ही, वृक्षम् परिषस्वजाते = वृक्ष ( शरीर ) का आश्रय लेकर रहते हैं, तयोः=उन दोनोंमेंसे, अन्यः=एक (जीवात्मा) तो, पिप्पलम्=उस वृक्षके फलो (कर्मफलों) को, स्वादु=स्वाद ले-लेकर, अत्ति= खाता है, अन्यः= ( किंतु ) दूसरा ( ईश्वर ), अनश्नन् = उनका उपभोग न करता हुआ, अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है ॥ ६ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार गीता आदिमे जगत्‌का अश्वत्थ-वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको अश्वत्थ-वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। इसी प्रकार कठोपनिषद्‌में जीवात्मा और परमात्माको गुहामें प्रविष्ट छाया और धूपके रूपमें बताकर वर्णन किया गया है। दोनों जगहका भाव प्रायः एक ही है। यहाँ मन्त्रका सारांश यह है कि यह मनुष्य-शरीर मानो एक पीपलका वृक्ष है। ईश्वर और जीव—ये दोनों सदा साथ रहनेवाले दो मित्र मानो दो पक्षी हैं। ये दोनों इस शरीररूप वृक्षमें एक साथ एक ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। शरीरमें रहते हुए प्रारब्धानुसार जो सुख-दुःखरूप कर्मफल प्राप्त होते हैं, वे ही मानो इस पीपलके फल हैं। इन फलोंको जीवात्मारूप एक पक्षी तो स्वादपूर्वक खाता है अर्थात् हर्ष-शोकका अनुभव करते हुए कर्मफलको भोगता है। दूसरा ईश्वररूप पक्षी इन फलोंको खाता नहीं, केवल देखता रहता है। अर्थात् इस शरीरमें प्राप्त हुए सुख-दुःखोंको वह भोगता नहीं, केवल उनका साक्षी बना रहता है। परमात्माकी भाँति यदि जीवात्मा भी इनका द्रष्टा बन जाय तो फिर उसका इनसे कोई सम्बन्ध न रह जाय। ऐसे ही जीवात्माके सम्बन्धमें पिछले मन्त्रमें यह कहा गया है कि वह प्रकृतिका उपभोग कर चुकनेके बाद उसे निःसार समझकर उसका परित्याग कर देता है, उससे मुँह मोड़ लेता है। उसके लिये फिर प्रकृति अर्थात् जगत्‌की सत्ता ही नहीं रह जाती। फिर तो वह और उसका मित्र—दो ही रह जाते हैं और परस्पर मित्रताका आनन्द लूटते हैं। यही इस मन्त्रका तात्पर्य मालूम होता है। मुण्डक० ३ । १ । १ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है ॥ ६ ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ ७॥ समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूप एक ही वृक्षपर रहनेवाला; पुरुषः = जीवात्मा; निमग्नः = गहरी आसक्तिमें डूबा हुआ है; ( अतः ) अनीशया = असमर्थ होनेके कारण ( दीनतापूर्वक ), मुह्यमानः=मोहित हुआ, शोचति =शोक करता रहता है; यदा = जब ( यह भगवान्‌की अहैतुकी दयासे ), जुष्टम् = भक्तोंद्वारा नित्यसेवित; अन्यम् = अपनेसे भिन्न, ईशम् = परमेश्वरको; (और) अस्य = उसकी, महिमानम् = आश्चर्यमयी महिमाको, पश्यति = प्रत्यक्ष देख लेता है; इति=तब, वीतशोकः=सर्वथा शोकरहित; [ भवति = हो जाता है ] ॥ ७॥ व्याख्या-पहले बतलाये हुए इस शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमे परमात्माके साथ रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, इस शरीरमे ही आसक्त होकर मोहमे निमग्न रहता है, अर्थात् शरीरमें अत्यन्त ममता करके उसके द्वारा भोगोंका उपभोग करनेमे ही रचा-पचा रहता है, तबतक असमर्थता और दीनतासे मोहित हुआ नाना प्रकारके दुःखोंको भोगता रहता है। जब कभी इसपर भगवान्‌की अहैतुकी दया होती है, की है। यहाँ काव्यमयी भाषामें प्रकृतिको एक तिरंगी बकरीके रूपमें चित्रित किया गया है, जो बद्धजीवरूप बकरेके संयोगसे अपनी ही- जैसी तिरंगी—त्रिगुणमयी सन्तान उत्पन्न करती है। संस्कृतमें 'अजा' बकरीको भी कहते हैं। इसी श्लेषका उपयोग कर प्रकृतिका आलंकारिक रूपमें वर्णन किया गया है। उ० मं० ४९-