भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

३८६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तब यह अपनेसे भिन्न, अपने ही साथ रहनेवाले, परम सुहृद्, परम प्रिय भगवान्‌को पहचान पाता है। जो भक्तजनोंद्वारा निरन्तर सेवित हैं, उन परमेश्वरको तथा उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, जब यह देख लेता है, उस समय तत्काल ही सर्वथा शोकरहित हो जाता है। मुण्डक० ३। १। २ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है ॥ ७ ॥ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८ ॥ यस्मिन्=जिसमें; विश्वे=समस्त; देवाः=देवगण; अधि=भलीभाँति; निषेदुः=स्थित हैं; [तस्मिन्=उस;] अक्षरे=अविनाशी; परमे व्योमन्=परम व्योम (परम धाम) मे; ऋचः=सम्पूर्ण वेद स्थित हैं; यः=जो मनुष्य; तम्=उसको; न=नहीं; वेद=जानता; [सः=वह;] ऋचा=वेदोंके द्वारा; किम्=क्या; करिष्यति=सिद्ध करेगा; इत्= परन्तु; ये=जो; तत्=उसको; विदुः=जानते हैं; ते=वे तो; इमे=ये; समासते=सम्यक् प्रकारसे उसीमें स्थित हैं ॥ ८ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरके जिस अविनाशी दिव्य चेतन परम आकाशस्वरूप परम धाममें समस्त देवगण अर्थात् उन परमात्माके पार्षदगण उन परमेश्वरकी सेवा करते हुए निवास करते हैं, वहीं समस्त वेद भी पार्षदोंके रूपमें मूर्तिमान् होकर भगवान्‌की सेवा करते हैं। जो मनुष्य उस परम धाममें रहनेवाले परब्रह्म पुरुषोत्तमको नहीं जानता और इस रहस्यको भी नहीं जानता कि समस्त वेद उन परमात्माकी सेवा करनेवाले उन्हींके अङ्गभूत पार्षद हे, वह वेदोंके द्वारा अपना क्या प्रयोजन सिद्ध करेगा ? अर्थात् कुछ सिद्ध नहीं कर सकेगा। परन्तु जो उन परमात्माको तत्त्वसे जान लेते हैं, वे तो उस परम धाममें ही सम्यक् प्रकारसे स्थित रहते हैं, अर्थात् वहाँसे कभी नहीं लौटते ॥ ८ ॥ छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति । अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ९ ॥ छन्दांसि=छन्द; यज्ञाः=यज्ञ; क्रतवः=क्रतु (ज्योतिष्टोम आदि विशेष यज्ञ); व्रतानि=नाना प्रकारके व्रत; च=तथा; यत्=और भी जो कुछ; भूतम्=भूत; भव्यम्=भविष्य एव वर्तमानरूपसे; वेदाः=वेद; वदन्ति=वर्णन करते हैं; एतत् विश्वम्=इस सम्पूर्ण जगत्‌को; मायी=प्रकृतिका अधिपति परमेश्वर; अस्मात्=इस (पहले बताये हुए महाभूतादि तत्त्वोंके समुदाय) से; सृजते=रचता है; च=तथा; अन्यः=दूसरा (जीवात्मा);- तस्मिन्=उस प्रपञ्चमें; मायया=मायाके द्वारा; संनिरुद्धः=भलीभाँति बँधा हुआ है ॥ ९ ॥ व्याख्या—जो समस्त वेदमन्त्ररूप छन्द, यज्ञ, क्रतु अर्थात् ज्योतिष्टोमादि विशेष यज्ञ, नाना प्रकारके व्रत अर्थात् शुभ कर्म, सदाचार और उनके नियम हैं तथा और भी जो कुछ भूत, भविष्य, वर्तमान पदार्थ हैं, जिनका वर्णन वेदोंमें पाया जाता है,—इन सबको वे प्रकृतिके अधिष्ठाता परमेश्वर ही अपने अंशभूत इस पहले बताये हुए पञ्चभूत आदि तत्त्व-समुदायसे रचते हैं; इस प्रकार रचे हुए उस जगत्में अन्य अर्थात् पहले बताये हुए ज्ञानी महापुरुषोंसे भिन्न जीवसमुदाय मायाके द्वारा बँधा हुआ है। जबतक वह अपने स्वामी परम देव परमेश्वरको साक्षात् नहीं कर लेता, तबतक उसका इस प्रकृतिसे छुटकारा नहीं हो सकता; अतः मनुष्यको उन परमात्माको जानने और पानेकी उत्कट अभिलाषा रखनी चाहिये ॥ ९ ॥ मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१०॥ मायाम्=माया; तु=तो; प्रकृतिम्=प्रकृतिको; विद्यात्=समझना चाहिये; तु=और; मायिनम्=मायापति; महेश्वरम्=महेश्वरको समझना चाहिये; तस्य तु=उसीके; अवयवभूतैः=अङ्गभूत कारण-कार्य-समुदायसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण; जगत्=जगत्; व्याप्तम्=व्याप्त हो रहा है ॥ १० ॥ व्याख्या—इस प्रकरणमें जिसका मायाके नामसे वर्णन हुआ है, वह तो भगवान्‌की शक्तिरूपा प्रकृति है और उस माया नामसे कही जानेवाली शक्तिरूपा प्रकृतिका अधिपति परब्रह्म परमात्मा महेश्वर है; इस प्रकार इन दोनोंको अलग-अलग