भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 415
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८७ समझना चाहिये। उस परमेश्वरकी शक्तिरूपा प्रकृतिके ही अङ्गभूत कारण-कार्यसमुदायसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है ॥ १० ॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥११॥ यः = जो; एकः = अकेला ही; योनिम् योनिम् अधितिष्ठति = प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता हो रहा है, यस्मिन् = जिसमें; इदम् = यह, सर्वम् = समस्त जगत्; समेति = प्रलयकालमें विलीन हो जाता है, च = और, व्येति च = सृष्टिकालमें विविध रूपोंमें प्रकट भी हो जाता है; तम् = उस, ईशानम् = सर्वनियन्ता; वरदम् = वरदायक; ईड्यम् = स्तुति करने योग्य, देवम् = परम देव परमेश्वरको, निचाय्य = तत्त्वसे जानकर, (मनुष्य) अत्यन्तम् = निरन्तर बनी रहनेवाली; इमाम् = इस (मुक्तिरूप), शान्तिम् = परम शान्तिको, एति = प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर प्रत्येक योनिके एकमात्र अध्यक्ष हैं—जगत्‌मे जितने प्रकारके कारण माने जाते हैं, उन सबके अधिष्ठाता हैं। उनमें किसी कार्यको उत्पन्न करनेकी शक्ति उन्हीं सर्वकारण परमात्माकी है और उन्हींकी अध्यक्षतामें वे उन-उन कार्योंको उत्पन्न करते हैं। वे ही उन सबपर शासन करते हैं—उनकी यथायोग्य व्यवस्था करते हैं। यह समस्त जगत् प्रलयके समय उनमें विलीन हो जाता है तथा पुनः सृष्टि-कालमें उन्हींमे विविध रूपोंमें उत्पन्न हो जाता है। उन सर्वनियन्ता, वरदायक, एकमात्र स्तुति करनेयोग्य, परमदेव, सर्वसुहृद्, सर्वेश्वर परमात्माको जानकर यह जीव निरन्तर बनी रहनेवाली परमनिर्वाणरूप शान्तिको प्राप्त हो जाता है। गीतामें इसका शाश्वती शान्ति (गीता ९। ३१), परा शान्ति (गीता १८ । ६२) आदि नामोंसे भी वर्णन आता है ॥ ११ ॥ यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥१२॥ यः = जो, रुद्रः = रुद्र, देवानाम् = इन्द्रादि देवताओंको, प्रभवः = उत्पन्न करनेवाला, च = और; उद्भवः = बढ़ाने- वाला है; च = तथा; (जो) विश्वाधिपः = सबका अधिपति, महर्षिः = (और) महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है, (जिसने सबसे पहले) जायमानम् = उत्पन्न हुए, हिरण्यगर्भम् = हिरण्यगर्भको, पश्यत = देखा था, सः = वह परमदेव परमेश्वर; नः = हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या = शुभ बुद्धिसे; संयुनक्तु = संयुक्त करे ॥ १२ ॥ व्याख्या—सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानसम्पन्न (सर्वज्ञ) हैं, जिन्होंने सृष्टिके आदिमें सबसे पहले उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको देखा था, अर्थात् जो ब्रह्माके भी पूर्ववर्ती हैं, वे परमदेव परमात्मा हमलोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें, जिससे हम उनकी ओर बढ़कर उन्हें प्राप्त कर सकें। शुभ बुद्धि वही है, जो जीवको परम कल्याणरूप परमात्माकी ओर लगाये । गायत्री-मन्त्रमें भी इसी बुद्धिके लिये प्रार्थना की गयी है ॥ १२ ॥ यो देवानामधिपो यस्मिँल्लोका अधिश्रिताः । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ १३ ॥ यः = जो, देवानाम् = समस्त देवोंका, अधिपः = अधिपति है, यस्मिन् = जिसमें, लोकाः = समस्त लोक; अधिश्रिताः = सब प्रकारसे आश्रित हैं, यः = जो; अस्य = इस, द्विपदः = दो पैरवाले, (और) चतुष्पदः = चार पैरवाले समस्त जीवसमुदायका, ईशे = शासन करता है, (उस) कस्मै देवाय = आनन्दस्वरूप परमदेव परमेश्वरकी; (हम) हविषा = हविष्य अर्थात् श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भेंट समर्पण करके, विधेम = पूजा करें ॥ १३ ॥ व्याख्या—जो सर्वनियन्ता परमेश्वर समस्त देवोंके अधिपति हैं, जिनमें समस्त लोक सब प्रकारसे आश्रित हैं अर्थात् जो स्थूल, सूक्ष्म और अव्यक्त अवस्थाओंमें सदा ही सब प्रकारसे सबके आश्रय हैं, जो दो पैरवाले और चार पैरवाले अर्थात्