भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 416

३८८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्पूर्ण जीव-समुदायका अपनी अचिन्त्य शक्तियोंके द्वारा शासन करते हैं, उन आनन्दस्वरूप परमदेव सर्वाधार सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी हम श्रद्धा भक्तिपूर्वक हविःस्वरूप भेंट समर्पण करके पूजा करें। अर्थात् सब कुछ उन्हें समर्पण करके उन्हींके हो जायँ। यही उनकी प्राप्तिका सहज उपाय है ॥ १३ ॥ सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥१४॥ सूक्ष्मातिसूक्ष्मम् = (जो) सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म; कलिलस्य मध्ये = हृदय-गुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित; विश्वस्य = अखिल विश्वकी; स्रष्टारम् = रचना करनेवाला; अनेकरूपम् = अनेक रूप धारण करनेवाला; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम् = समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे रखनेवाला है, (उस) एकम् = एक (अद्वितीय); शिवम् = कल्याणस्वरूप महेश्वरको; ज्ञात्वा = जानकर, (मनुष्य) अत्यन्तम् = सदा रहनेवाली; शान्तिम् = शान्तिको; एति = प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ व्याख्या-जो परब्रह्म परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं-अर्थात् जो बिना उनकी कृपाके जाने नहीं जाते, जो सबकी हृदय-गुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित हैं अर्थात् जो हमारे अत्यन्त समीप हैं, जो अखिल विश्वकी रचना करते हैं, तथा स्वयं विश्वरूप होकर अनेक रूप धारण किये हुए हैं-यही नहीं, जो निराकाररूपसे समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरे रहते हैं, उन सर्वोपरि एक-अद्वितीय कल्याणस्वरूप महेश्वरको जानकर मनुष्य सदा रहनेवाली असीम, अविनाशी और अतिशय शान्तिको प्राप्त कर लेता है; क्योंकि वह महापुरुष इस अशान्त जगत्-प्रपञ्चसे सर्वथा सम्बन्धरहित एवं उपरत हो जाता है ॥ १४ ॥ स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥१५॥ सः एव = वही; काले = समयपर; भुवनस्य गोप्ता = समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करनेवाला; विश्वाधिपः = समस्त जगत्का अधिपति; (और) सर्वभूतेषु = समस्त प्राणियोंमें; गूढः = छिपा हुआ है; यस्मिन् = जिसमें; ब्रह्मर्षयः = वेदज्ञ महर्षिगण; च = और; देवताः = देवता लोग भी; युक्ताः = ध्यानद्वारा संलग्न हैं; तम् = उस (परमदेव परमेश्वर) को; एवम् = इस प्रकार; ज्ञात्वा = जानकर; (मनुष्य) मृत्युपाशान् = मृत्युके बन्धनोंको; छिनत्ति = काट डालता है ॥ १५ ॥ व्याख्या-जिनका बार-बार वर्णन किया गया है, वे परमदेव परमेश्वर ही समयपर अर्थात् स्थिति-कालमें समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करते हैं, तथा वे ही सम्पूर्ण जगत्‌के अधिपति और समस्त प्राणियोंमे अन्तर्यामीरूपसे छिपे हुए हैं। उन्हींमें वेदके रहस्यको समझनेवाले महर्षिगण और समस्त देवता लोग भी ध्यानके द्वारा संलग्न रहते हैं। सब उन्हींका स्मरण और चिन्तन करके उन्हींमें जुड़े रहते हैं। इस प्रकार उन परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य यमराजके समस्त पाशोंको अर्थात् जन्म-मृत्युके कारणभूत समस्त बन्धनोंको काट डालता है। फिर वह कभी प्रकृतिके बन्धनमें नहीं आता, सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥ घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१६॥ शिवम् = कल्याणस्वरूप; एकम् देवम् = एक (अद्वितीय) परमदेवको; घृतात् परम् = मक्खनके ऊपर रहनेवाले; मण्डम् इव = सारभागकी भाँति; अतिसूक्ष्मम् = अत्यन्त सूक्ष्म; (और) सर्वभूतेषु = समस्त प्राणियोंमें; गूढम् = छिपा हुआ; ज्ञात्वा = जानकर; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम् = समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरकर स्थित हुआ; ज्ञात्वा = जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः = समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते = छूट जाता है ॥ १६ ॥ -जो मक्खनके ऊपर रहनेवाले सारभागकी भाँति सबके सार एवं अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन कल्याणस्वरूप