कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 417
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८९ एकमात्र परमदेव परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ तथा समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर उसे व्याप्त किये हुए जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सदाके लिये सर्वथा छूट जाता है ॥ १६ ॥ एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१७॥ एषः = यह; विश्वकर्मा = जगत्-कर्ता; महात्मा = महात्मा; देवः = परमदेव परमेश्वर, सदा = सर्वदा; जनानाम् = सब मनुष्योंके; हृदये = हृदयमें, संनिविष्टः = सम्यक् प्रकारसे स्थित है; (तथा) हृदा = हृदयसे, मनीषा = बुद्धिसे; (और) मनसा = मनसे; अभिक्लृप्तः = ध्यानमें लाया हुआ, [ आविर्भवति = प्रत्यक्ष होता है, ] ये = जो साधक; एतत् = इस रहस्यको; विदुः = जान लेते हैं; ते = वे; अमृताः = अमृतरूप, भवन्ति = हो जाते हैं ॥ १७ ॥ व्याख्या—ये जगत्को उत्पन्न करनेवाले, महात्मा अर्थात् सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी परमदेव परमेश्वर सदा ही सभी मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं। उनके गुण-प्रभावको सुनकर द्रवित और विशुद्ध हुए निर्मल हृदयसे, निश्चय- युक्त बुद्धिसे तथा एकाग्र मनके द्वारा निरन्तर ध्यान करनेपर वे परमात्मा प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इस रहस्यको जान लेते हैं, वे उन्हें प्राप्त करके अमृतरूप हो जाते हैं, सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ १७ ॥ यदातमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासञ्छिव एव केवलः। तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥१८॥ यदा = जब, अतमः [ स्यात् ] = अज्ञानमय अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, तत्* = उस समय (अनुभवमें आनेवाला तत्त्व ); न = न; दिवा = दिन है, न = न, रात्रिः = रात है, न = न, सत् = सत् है; च = और, न = न; असत् = असत् है; केवलः = एकमात्र, विशुद्ध; शिवः एव = कल्याणमय शिव ही है, तत् = वह, अक्षरम् = सर्वथा अविनाशी है; तत् = वह; सवितुः = सूर्याभिमानी देवताका भी, वरेण्यम् = उपास्य है, च = तथा, तस्मात् = उसीसे, पुराणी = (यह) पुराना; प्रज्ञा = ज्ञान; प्रसृता = फैला है ॥ १८ ॥ व्याख्या—जिस समय अज्ञानरूप अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, उस समय प्रत्यक्ष होनेवाला तत्त्व न दिन है, न रात है। अर्थात् उसे न तो दिनकी भाँति प्रकाशमय कहा जा सकता है और न रातकी भाँति अन्धकारमय ही; क्योंकि वह इन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है, वहाँ ज्ञान-अज्ञानके भेदकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। वह न सत् है और न असत् है—उसे न तो 'सत्' कहना बनता है, न 'असत्' ही; क्योंकि वह 'सत्' और 'असत्' नामसे समझे जानेवाले पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है। एकमात्र कल्याणस्वरूप शिव ही वह तत्त्व हैं। वे सर्वथा अविनाशी हैं। वे सूर्य आदि समस्त देवताओंके उपास्यदेव हैं। उन्हींसे यह सदासे चला आता हुआ अनादि ज्ञान—परमात्माको जानने और पानेका साधन अधिकारियोंको परम्परासे प्राप्त होता चला आ रहा है ॥ १८ ॥ नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥१९॥ एनम् = इस परमात्माको, (कोई भी) न = न तो; ऊर्ध्वम् = ऊपरसे, न = न; तिर्यञ्चम् = इधर-उधरसे; (और) न = न, मध्ये = बीचमेंसे ही; परिजग्रभत् = भलीभाँति पकड़ सकता है, यस्य = जिसका; महद्यशः = 'महान् यश'; नाम = नाम है, तस्य = उसकी, प्रतिमा = कोई उपमा; न = नहीं, अस्ति = है ॥ १९ ॥ व्याख्या—जिनका पहले कई मन्त्रोंमें वर्णन किया गया है, उन परम प्राप्य परब्रह्मको कोई भी मनुष्य न तो ऊपरसे पकड़ सकता है न नीचेसे पकड़ सकता है, और न बीचमें इधर-उधरसे ही पकड़ सकता है; क्योंकि ये सर्वथा अग्राह्य हैं— ग्रहण करनेमें नहीं आते। इन्हें जानने और ग्रहण करनेकी बात जो शास्त्रोंमें पायी जाती है, उसका रहस्य वही समझ सकता है, जो इन्हें पा लेता है। वह भी वाणीद्वारा व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि मन और वाणीकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे
- 'तत्' अव्यय पद है, यहाँ 'तदा' के अर्थमें इसका प्रयोग हुआ है ।