कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 420, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३९२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * योनिमें जो भिन्न-भिन्न रूप—आकृतियाँ हैं, उन सबके और उनके कारणरूप पञ्च सूक्ष्म महाभूत आदि समस्त तत्त्वोंके जो एकमात्र अधिपति हैं, अर्थात् वे सब-के-सब जिनके अधीन हैं, जो सबसे पहले उत्पन्न हुए कपिल ऋषिको* अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माको प्रत्येक सर्गके आदिमें सब प्रकारके ज्ञानोंसे पुष्ट करते हैं—सब प्रकारके ज्ञानोंसे सम्पन्न करके उन्नत करते हैं तथा जिन्होंने सबसे पहले उत्पन्न होते हुए उन हिरण्यगर्भको देखा था, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वाधार सबके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं ॥ २ ॥ एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥ एषः = यह; देवः = परमदेव ( परमेश्वर ); अस्मिन् क्षेत्रे = इस जगत-क्षेत्रमें, ( सृष्टिके समय ) एकैकम् = एक एक; जालम् = जालको (बुद्धि आदि और आकाशादि तत्त्वोंको ), बहुधा = बहुत प्रकारसे; विकुर्वन् = विभक्त करके, ( उनका ) संहरति = ( प्रलयकालमें ) संहार कर देता है; महात्मा = ( वह ) महामना, ईशः = ईश्वर, भूयः = पुनः ( सृष्टिकालमें ), तथा = पहलेकी भाँति, पतयः सृष्ट्वा = ( समस्त लोकपालोंकी ) रचना करके; सर्वाधिपत्यम् कुरुते = ( स्वयं ) सबपर आधिपत्य करता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परमदेव परमेश्वर इस जगत्रूप क्षेत्रमें सृष्टिके समय एक एक जालको अर्थात् बुद्धि आदि और आकाश आदि अपनी प्रकृतियोंको बहुत प्रकारसे विभक्त करके—प्रत्येक प्रकृतिको भिन्न-भिन्न रूप, नाम और शक्तियोंसे युक्त करके उनका विस्तार करते हैं और स्वयं ही प्रलयकालमें उन सबका संहार कर लेते हैं। वे महामना परमेश्वर पुनः सृष्टिकालमें पहलेकी भाँति ही समस्त लोकोंकी और उनके अधिपतियोंकी रचना करके स्वयं उन सबके अधिष्ठाता बनकर उन सबपर शासन करते हैं। उनकी लीला अतर्क्य है, तर्कसे उसका रहस्य समझमें नहीं आ सकता । उनके सेवक ही उनकी लीलाके रहस्यको कुछ समझते हैं ॥ ३ ॥ सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्प्रकाशयन्भ्राजते यद्वनड्वान् । एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिखभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४ ॥ यत् उ = जिस प्रकार; अनड्वान् = सूर्य, ( अकेला ही ) सर्वाः = समस्त; दिशः = दिशाओंको, ऊर्ध्वम् अधः = ऊपर-नीचे, च = और, तिर्यक् = इधर-उधर—सब ओरसे, प्रकाशयन् = प्रकाशित करता हुआ, भ्राजते = देदीप्यमान होता है, एवम् = उसी प्रकार, सः = वह, भगवान् = भगवान्, वरेण्यः = भक्ति करनेयोग्य; देवः = परमदेव परमेश्वर, एकः = अकेला ही, योनिखभावान् अधितिष्ठति = समस्त कारणरूप अपनी शक्तियोंपर आधिपत्य करता है ॥ ४ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार यह सूर्य समस्त दिशाओंको ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर—सब ओरसे प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार वे भगवान्—सर्वविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सबके द्वारा भजनेयोग्य परमदेव परमेश्वर अकेले ही समस्त कारणरूप अपनी भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता होकर उन सबका संचालन करते हैं, सबको अपना-अपना कार्य करनेकी सामर्थ्य देकर यथायोग्य कार्यमे प्रवृत्त करते हैं ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातका इस मन्त्रमें स्पष्टीकरण किया जाता है— यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥ यत् = जो, विश्वयोनिः = सबका परम कारण है, च = और, स्वभावम् = समस्त तत्त्वोंकी शक्तिरूप स्वभावको, पचति = ( अपने सङ्कल्परूप तपसे ) पकाता है, च = तथा, यः = जो, सर्वान् = समस्त, पाच्यान् = पकाये जानेवाले पदार्थोंको, परिणामयेत् = नाना रूपोंमें परिवर्तित करता है, ( और ) यः = जो, एकः = अकेला ही; सर्वान् = समस्त; गुणान्
- कुछ विद्वानोंने 'कपिल' शब्दको सांख्यशास्त्रके आदि वक्ता एवं प्रवर्तक भगवान् कपिलमुनिका वाचक माना है और इस प्रकार उनके द्वारा उपदिष्ट मतकी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता सिद्ध की है ।