कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोकर; मा = न तो; नः = हमारे; तोके = पुत्रोंमें; ( ओर ) तनये = पौत्रोंमें, मा = न; नः = हमारी; आयुषि = आयुमें; मा = न; नः = हमारी; गोषु = गौओंमें, ( और ) मा = न; नः = हमारे, अश्वेषु = घोड़ोंमें ही, रीरिषः = किसी प्रकारकी कमी कर; ( तथा ) नः = हमारे, वीरान् मा वधीः = वीर पुरुषोंका भी नाश न कर ॥ २२ ॥ व्याख्या—हे सबका संहार करनेवाले रुद्रदेव ! हमलोग नाना प्रकारकी भेंट समर्पण करते हुए सदा ही आपको बुलाते रहते हैं । आप ही हमारी रक्षा करनेमें सर्वथा समर्थ हैं, अतः हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमपर कभी कुपित न हों तथा कुपित होकर हमारे पुत्र और पौत्रोंको, हमारी आयुको—जीवनको तथा हमारे गौ, घोड़े आदि पशुओंको कभी किसी प्रकारकी क्षति न पहुँचायें । तथा हमारे जो वीर—साहसी पुरुष हैं, उनका भी नाश न करें । अर्थात् सब प्रकारसे हमारी और हमारे धन-जनकी रक्षा करते रहें ॥ २२ ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम अध्याय द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे । क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥ यत्र = जिस; ब्रह्मपरे = ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, गूढे = छिपे हुए, अनन्ते = असीम; तु = और, अक्षरे = परम अक्षर परमात्मा- में; विद्याविद्ये = विद्या और अविद्या, द्वे = दोनों, निहिते = स्थित हैं ( वही ब्रह्म है ), क्षरम् = ( यहाँ ) विनाशशील जडवर्ग, तु = तो; अविद्या = अविद्या नामसे कहा गया है, तु = और, अमृतम् = अविनाशी वर्ग ( जीवसमुदाय ); हि = ही; विद्या = विद्या नामसे कहा गया है, तु = तथा, यः = जो; विद्याविद्ये ईशते = उपर्युक्त विद्या और अविद्यापर शासन करता है; सः = वह, अन्यः = इन दोनोंसे भिन्न—सर्वथा विलक्षण है ॥ १ ॥ व्याख्या—जो परमेश्वर ब्रह्मासे भी अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, अपनी मायाके पर्देमें छिपे हुए हैं, सीमारहित और अविनाशी हैं अर्थात् जो देश-कालसे सर्वथा अतीत हैं तथा जिनका कभी किसी प्रकारसे भी विनाश नहीं हो सकता, तथा जिन परमात्मामें अविद्या और विद्या—दोनों विद्यमान हैं, अर्थात् दोनों ही जिनके आधारपर टिकी हुई हैं, वे पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम हैं । इस मन्त्रमें परिवर्तनशील, घटने-बढ़नेवाले और उत्पत्ति-विनाशशील क्षरतत्त्वको तो अविद्या नामसे कहा गया है, क्योंकि वह जड है, उसमे विद्याका—ज्ञानका सर्वथा अभाव है । उससे भिन्न जो जन्म-मृत्युसे रहित है, जो घटता-बढ़ता नहीं, वह अविनाशी कूटस्थ तत्त्व ( जीव-समुदाय ) विद्याके नामसे कहा गया है, क्योंकि वह चेतन है, विज्ञानमय है । उपनिषदोंमें जगह-जगह उसका विज्ञानात्माके नामसे वर्णन आया है । यहाँ श्रुतिने स्वय ही विद्या और अविद्याकी परिभाषा कर दी है, अतः अर्थान्तर- की कल्पना अनावश्यक है । जो इन विद्या और अविद्या नामसे कहे जानेवाले क्षर और अक्षर दोनोंपर शासन करते हैं, दोनोंके स्वामी हैं, दोनों जिनकी शक्तियाँ अथवा प्रकृतियाँ हैं, वे परमेश्वर इन दोनोंसे अन्य—सर्वथा विलक्षण हैं । श्रीगीता- जीमें भी कहा है—'उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः' इत्यादि ( १५ । १७ ) ॥ १ ॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥ यः = जो, एकः = अकेला ही; योनिम् योनिम् = प्रत्येक योनिपर, विश्वानि रूपाणि = समस्त रूपोंपर, च = और, सर्वाः योनीः = समस्त कारणोंपर, अधितिष्ठति = आधिपत्य रखता है, यः = जो; अग्रे = पहले; प्रसूतम् = उत्पन्न हुए, कपिलम् ऋषिम् = कपिल ऋषिको ( हिरण्यगर्भको ), ज्ञानैः = सब प्रकारके ज्ञानोंसे, बिभर्ति = पुष्ट करता है; च = तथा, ( जिसने ) तम् = उस कपिल ( ब्रह्मा ) को, जायमानम् = ( सबसे पहले ) उत्पन्न होते, पश्येत् = देखा था; ( वे ही परमात्मा हैं ) ॥ २ ॥ —इस जगत्में देव, पितर, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि जितनी भी योनियाँ हैं, तथा प्रत्येक