कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 421, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 421
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९३ विनियोजयेत्=गुणोंका जीवोंके साथ यथायोग्य सयोग कराता है; च=तथा, एतत्=इस; सर्वम्=समस्त, विश्वम् अधितिष्ठति=विश्वका शासन करता है, (वह परमात्मा है) ॥ ५ ॥ व्याख्या-जो इस सम्पूर्ण विश्वके परम कारण हैं, अर्थात् जिनका और कोई कारण नहीं है, जगत्के कारणरूपसे कहे जानेवाले समस्त तत्त्वोंकी शक्तिरूप स्वभावको जो अपने संकल्परूप तपसे पकाते हैं-अर्थात् उन आकाशादि तत्त्वोंकी जो भिन्न-भिन्न शक्तियाँ प्रलयकालमें लुप्त हो गयी थीं, उन्हें अपने सङ्कल्पद्वारा पुन प्रकट करते हैं, उन प्रकट की हुई शक्तियोंका नाना रूपोंमें परिवर्तन कर इस विचित्र जगत्की रचना करते हैं, तथा सत्त्व आदि तीनों गुणोंका तथा उनसे उत्पन्न हुए पदार्थोंका जीवोंके साथ उनके कर्मानुसार यथायोग्य सम्बन्ध स्थापित करते हैं-इस प्रकार जो अकेले ही इस सम्पूर्ण जगत्की सारी व्यवस्था करके इसपर शासन करते हैं, वे ही पूर्वमन्त्रमें कहे हुए सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ ५ ॥ तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं तद्ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् । ये पूर्वदेवा ऋषयश्च तद्विदुस्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६ ॥ तत्=वह, वेदगुह्योपनिषत्सु=वेदोंके रहस्यभूत उपनिषदोंमें, गूढम्=छिपा हुआ है; ब्रह्मयोनिम्=वेदोंके प्राकट्य-स्थान; तत्=उस परमात्माको, ब्रह्मा=ब्रह्मा; वेदते=जानता है, ये=जो, पूर्वदेवाः=पुरातन देवता; च=और, ऋषयः=ऋषिलोग, तत्=उसको, विदुः=जानते थे; ते=वे, वै=अवश्य ही, तन्मयाः= (उसमें) तन्मय होकर; अमृताः=अमृतरूप; बभूवुः=हो गये ॥ ६ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म परमात्मा वेदोंकी रहस्यविद्यारूप उपनिषदोंमें छिपे हुए हैं अर्थात् उनके स्वरूपका वर्णन उपनिषदोंमें गुप्तरूपसे किया गया है। वेद निकले भी उन्हींसे हैं-उन्हींके निःश्वास रूप हैं- 'यस्य निःश्वसितं वेदाः'। इस प्रकार वेदोंमें छिपे हुए और वेदोंके प्राकट्य-स्थान उन परमात्माको ब्रह्माजी जानते हैं। उनके सिवा और भी जिन पूर्ववर्ती देवताओं और ऋषियोंने उनको जाना था, वे सब-के-सब उन्हींमें तन्मय होकर आनन्दस्वरूप हो गये। अतः मनुष्यको चाहिये कि उन सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सबके अधीश्वर परमात्माको उक्त प्रकारसे मानकर उन्हें जानने और पानेके लिये तत्पर हो जाय ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-पाँचवें मन्त्रमें यह बात कही गयी थी कि परमेश्वर सब जीवोंका उनके कर्मानुसार गुणोंके साथ संयोग कराते हैं, अतः जीवात्माका स्वरूप और नाना योनियोंमें विचरनेका कारण आदि बतानेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता । स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्मा प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥ यः गुणान्वयः=जो गुणोंसे बँधा हुआ है; सः=वह, ॑ कर्ता=फलके उद्देश्यसे कर्म करनेवाला जीवात्मा; एव=ही; तस्य=उस, कृतस्य=अपने किये हुए कर्मके फलका; उपभोक्ता=उपभोग करनेवाला, विश्वरूपः=विभिन्न रूपोंमें प्रकट होनेवाला; त्रिगुणः=तीन गुणोंसे युक्त; च=और, त्रिवर्त्मा=कर्मानुसार तीन मार्गोंसे गमन करनेवाला है; सः=वह; प्राणाधिपः=प्राणोंका अधिपति (जीवात्मा), स्वकर्मभिः=अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर, संचरति=नाना योनियोंमें विचरता है ॥ ७ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें प्रकरण आरम्भ करते ही जीवात्माके लिये 'गुणान्वयः' विशेषण देकर यह भाव दिखाया गया है कि जो जीव गुणोंसे सम्बद्ध अर्थात् प्रकृतिमें स्थित है, वही इस जन्म-मरणरूप संसार-चक्रमें घूमता है (गीता १३। २१), जो गुणातीत हो गया है, वह नहीं घूमता। मन्त्रका सारांश यह है कि जो जीवात्मा सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणोंसे बँधा हुआ है (गीता १४। ५), वह नाना प्रकारके कर्मफलरूप भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे नाना प्रकारके कर्म करता है और अपने किये हुए उन कर्मोंका फल भोगनेके लिये नाना योनियोंमें जन्म लेकर विभिन्न रूपोंमें प्रकट होता है और जहाँ भी जाता है, तीनों गुणोंसे युक्त रहता है। मृत्युके उपरान्त उसकी कर्मानुसार तीन गतियाँ होती हैं। अर्थात् शरीर छोड़नेपर वह तीन मार्गोंसे जाता है। वे तीन मार्ग हैं-देवयान, पितृयान और तीसरा निरन्तर जन्म-मृत्युके चक्रमें उ० अ० ५०-