भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 832 में से

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पृष्ठ 422

३९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * घूमना *। वह प्राणोंका अधिपति जीवात्मा जबतक मुक्त नहीं हो जाता, तबतक अपने किये हुए कर्मोंसे प्रेरित होकर नाना लोकोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारकी योनियोंको ग्रहण करके इस संसार-चक्रमें घूमता रहता है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-जीवात्माका स्वरूप कैसा है, इस जिज्ञासापर कहते हैं— अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहंकारसमन्वितो यः । बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥ ८॥ यः = जो; अङ्गुष्ठमात्रः = अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; रवितुल्यरूपः = सूर्यके समान प्रकाशस्वरूप, (तथा) संकल्पाहङ्कारसमन्वितः = सङ्कल्प और अहङ्कारसे युक्त है, बुद्धेः = बुद्धिके; गुणेन = गुणोंके कारण; च = और; आत्मगुणेन = अपने गुणोंके कारण; एव = ही; आराग्रमात्रः = आरेकी नोकके जैसे सूक्ष्म आकारवाला है, अपरः = ऐसा अपर (अर्थात् परमात्मासे भिन्न जीवात्मा), अपि = भी; हि = निःसन्देह, दृष्टः = (ज्ञानियोंद्वारा) देखा गया है ॥ ८ ॥ व्याख्या—मनुष्यका हृदय अँगूठेके नापका माना गया है और हृदयमें ही जीवात्माका निवास है। इसलिये उसे अङ्गुष्ठमात्र-अँगूठेके नापका कहा जाता है। उसका वास्तविक स्वरूप सूर्यकी भाँति प्रकाशमय (विज्ञानमय) है। उसे अज्ञानरूपी अन्धकार छूंतक नहीं गया है। वह सङ्कल्प और अहंकार-इन दोनोंसे युक्त हो रहा है, अतः सङ्कल्प आदि बुद्धि- के गुणोंसे अर्थात् अन्तःकरण और इन्द्रियोंके धर्मोंसे तथा अहंता, ममता और आसक्ति आदि अपने गुणोंसे सम्बद्ध होनेके कारण सूजेकी नोकके समान सूक्ष्म आकारवाला है और परमात्मासे भिन्न है। जीवके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुषोंने गुणोंसे युक्त हुए जीवात्माका स्वरूप ऐसा ही देखा है †। तात्पर्य यह कि आत्माका स्वरूप वास्तवमें अत्यन्त सूक्ष्म है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म जड पदार्थ उसकी तुलनामें स्थूल ही ठहरता है। उसकी सूक्ष्मता किसी भी जड पदार्थके परिमाणसे नहीं मापी जा सकती। केवल उसका लक्ष्य करानेके लिये उसे सम्बद्ध वस्तुके आकारका बताया जाता है। हृदय-देशमें स्थित होनेके कारण उसे अङ्गुष्ठपरिमाण कहा जाता है और बुद्धिगुण तथा आत्मगुणोंके सम्बन्धसे उसे सूजेकी नोकके आकारका बताया जाता है। बुद्धि आदिको सूईकी नोकके समान कहा गया है, इसीसे जीवात्माको यहाँ सूजेकी नोकके सदृश बताया गया है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध-पूर्वमन्त्रमें जो जीवात्माका स्वरूप सूजेकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है, उसे पुन स्पष्ट करते हैं— वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९॥ वालाग्रशतभागस्य = बालकी नोकके सौवें भागके, च = पुन, शतधा = सौ भागोंमें, कल्पितस्य = कल्पना किये जानेपर, भागः = जो एक भाग होता है, सः = वही (उसीके बराबर), जीवः = जीवका स्वरूप, विज्ञेयः = समझना चाहिये; च = और, सः = वह, आनन्त्याय = असीम भाववाला होनेमे, कल्पते = समर्थ है ॥ ९ ॥ व्याख्या-पूर्वमन्त्रमें जीवात्माका स्वरूप सूजेकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है, उसको समझनेमें भ्रम हो सकता है, अतः उसे भलीभाँति समझानेके लिये पुनः इस प्रकार कहते हैं। मान लीजिये, एक बालकी नोकके हम सौ टुकड़े कर लें, फिर उसमेंसे एक टुकड़ेके पुनः सौ टुकड़े कर लें। वह जितना सूक्ष्म हो सकता है, अर्थात् बालकी नोकके दस हजार भाग करनेपर उसमेंसे एक भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है, उसके समान जीवात्माका स्वरूप समझना चाहिये। यह कहना

  • छान्दोग्य उपनिषद्में ५। १०। २ से ८ तक और बृहदारण्यक ६। २। १५-१६ में इन तीन मार्गोंका वर्णन आया है। देवयान-मार्गसे जानेवाले ब्रह्मलोकतक जाकर वहाँसे लौटते नहीं, ब्रह्माके साथ ही मुक्त हो जाते हैं, पितृयानसे जानेवाले स्वर्गमें जाकर चिरकालतक वहाँके दिव्य सुखोंका उपभोग करते हैं और पुण्य क्षीण हो जानेपर पुन' मृत्युलोकमें ढकेल दिये जाते हैं, और तीसरे मार्गसे जानेवाले कीट-पतङ्गादि क्षुद्र योनियोंमें भटकते रहते हैं। † गीतामें भी कहा है कि एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवाले, शरीरमें स्थित रहनेवाले अथवा विषयोंको भोगनेवाले इस गुणान्वित जीवात्माको मूर्ख नहीं जानते, ज्ञानरूप नेत्रोंवाले ज्ञानी जानते हैं ( १५। १०)।
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