कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ भृगुवल्ली * प्रथम अनुवाक भृगुर्वै वारुणिः वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवाच। अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति। तꣳहोवाच। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा। वै = यह प्रसिद्ध है कि; वारुणिः = वरुणका पुत्र, भृगुः = भृगु; पितरम् = अपने पिता, वरुणम् उपससार = वरुणके पास गया (और विनयपूर्वक बोला—); भगवन् = भगवन्; (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका उपदेश कीजिये; इति = इस प्रकार प्रार्थना करनेपर, तस्मै = उससे, (वरुणने) एतत् = यह, प्रोवाच = कहा; अन्नम् = अन्न; प्राणम् = प्राण, चक्षुः = नेत्र; श्रोत्रम् = श्रोत्र, मनः = मन, (और) वाचम् = वाणी, इति = इस प्रकार (ये सब ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं); तम् ह उवाच = पुनः (वरुणने) उससे कहा, वै = निश्चय ही, इमानि = ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले; भूतानि = प्राणी; यतः = जिससे; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, येन = जिसके सहारे, जीवन्ति = जीवित रहते हैं; (तथा) प्रयन्ति = (अन्तमें इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; यत् अभिसंविशन्ति = जिसमें प्रवेश करते हैं, तत् = उसको; विजिज्ञासस्व = तत्त्वसे जाननेकी इच्छा कर, तत् = वही, ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार (पिताकी बात सुनकर), सः = उसने; तपः अतप्यत = तप किया, सः = उसने, तपः तप्त्वा = तप करके— व्याख्या—भृगु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि थे, जो वरुणके पुत्र थे। उनके मनमें परमात्माको जानने और प्राप्त करनेकी उत्कट अभिलाषा हुई, तब वे अपने पिता वरुणके पास गये। उनके पिता वरुण वेदको जाननेवाले, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे, अतः भृगुको किसी दूसरे आचार्यके पास जानेकी आवश्यकता नहीं हुई। अपने पिताके पास जाकर भृगुने इस प्रकार प्रार्थना की—'भगवन् ! मैं ब्रह्मको जानना चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने भृगुसे कहा—'तात ! अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी—ये सभी ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं। इन सबमें ब्रह्मकी सत्ता स्फुरित हो रही है।' साथ ही यह भी कहा—'ये प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले सब प्राणी जिनसे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिनके सहयोगसे, जिनका बल पाकर ये सब जीते हैं—जीवनोपयोगी क्रिया करनेमें समर्थ होते हैं और महाप्रलयके समय जिनमें विलीन हो जाते हैं, उनको वास्तवमें जाननेकी (पानेकी) इच्छा कर। वे ही ब्रह्म हैं।' इस प्रकार पिताका उपदेश पाकर भृगु ऋषिने ब्रह्मचर्य और शम दम आदि नियमोंका पालन करते हुए तथा समस्त भोगोंके त्यागपूर्वक सयमसे रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। यही उनका तप था। इस प्रकार तप करके उन्होने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है। ॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय अनुवाक अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तꣳ होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।
- वरुणने अपने पुत्र भृगु ऋषिको जिस ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था, उसीका इस वल्लीमें वर्णन है, इस कारण इसका नाम भृगुवल्ली है।