भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 832 में से

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पृष्ठ 375
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४९

एतꣳह वाव न तपति । किमहꣳसाधु नाकरवम् । किमहं पापमकरवमिति । स य एवं विद्वानेते आत्मानꣳ स्पृणुते । उभे ह्येवैष एते आत्मानꣳ स्पृणुते । य एवं वेद । इत्युपनिषत् । ह वाव = यह प्रसिद्ध ही है कि, एतम् = उस (महापुरुष) को, (यह बात) न तपति = चिन्तित नहीं करती कि; अहम् = मैंने, किम् = क्यों; साधु = श्रेष्ठ कर्म, न = नहीं; अकरवम् = किया, किम् = (अथवा) क्यों, अहम् = मैंने, पापम् = पापाचरण, अकरवम् इति = किया, यः = जो, एते = इन पुण्य-पापकर्मोंको, एवम् = इस प्रकार (संतापका हेतु), विद्वान् = जानने- वाला है, सः = वह; आत्मानम् स्पृणुते = आत्माकी रक्षा करता है, हि = अवश्य ही; यः = जो; एते = इन पुण्य और पाप, उभे एव = दोनों ही कर्मोंको, एवम् = इस प्रकार (संतापका हेतु), वेद = जानता है, [ सः ] एषः = वह यह पुरुष, आत्मानम् स्पृणुते = आत्माकी रक्षा करता है, इति = इस प्रकार; उपनिषत् = उपनिषद् (की ब्रह्मानन्दवल्ली) पूरी हुई। व्याख्या--इस वर्णनमे यह बात कही गयी है कि ज्ञानी महापुरुषको किसी प्रकारका शोक नहीं होता । भाव यह है कि परमात्माको ऊपर बताये अनुसार जाननेवाला विद्वान् कभी इस प्रकार शोक नहीं करता कि 'क्यों मैंने श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण नहीं किया, अथवा क्यों मैने पाप-कर्म किया।' उसके मनमें पुण्य-कर्मोंके फलस्वरूप उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका लोभ नहीं होता और उसे पापजनित नरकादिका भय भी नहीं सताता। लोभ और भयजनित संतापसे वह ऊँचा उठ जाता है। उक्त ज्ञानी महापुरुष आसक्तिपूर्वक किये हुए पुण्य और पाप दोनों प्रकारके कर्मोंको जन्म-मरणरूप संतापका हेतु समझकर उनके प्रति राग-द्वेषसे सर्वथा रहित हो जाता है और परमात्माके चिन्तनमे संलग्न रहकर आत्माकी रक्षा करता है। इस मन्त्रमें कुछ शब्दोंको अक्षरशः अथवा अर्थतः दुहराकर इस वल्लीके उपसहारकी सूचना दी गयी है। ॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ ९॥ ॥ ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्त ॥ २ ॥